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@dawriter

“मन के हारे हार है मन के जीते जीत”

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आज मन बड़ा उदास है न जाने क्यूँ ? कुछ समझ नहीं आ रहा है। कभी कभी हम सब की जिंदगी में कुछ ऐसे पल आते हैं जब आप कुछ नहीं समझ पाते। क्या हो रहा है आपके साथ, क्यूँ हो रहा है, क्या चाहते हो आप खुद से? शायद कुछ होता है जो आपको परेशान करता है। मुझे भी आज कुछ ऐसा ही लग रहा है। पर किसी से कुछ कह नहीं सकती, क्यूंकि वही ….. कोई समझेगा नहीं। पहली बार नहीं हो रहा है ऐसा कई बार हुआ है। कभी कभी तो सोच मुझे मेरी हद से पार भी ले गयी है। जहाँ ऐसा लगा जैसे कोई नहीं है मेरा। क्यूँ जी रही हूँ मैं। बेकार है ये दुनिया या फिर मैं ही बेकार हूँ। बहुत बार हुआ है ऐसा और बहुत बार की है खुद से लड़ाई। जिंदगी और मौत की लड़ाई। शायद वो एक पल का किस्सा होता है जिसमे हम बह जाते हैं। जिनको तैरना आता है वो मौत की सोच से जिंदगी की सोच तक की लंबाई को नाप लेते हैं। जिन्हें नहीं आता उनमे से कुछ लोग शायद मौत को सामने देख डर जाते हैं और जीने के लिए हाथ पैर मारने लगते हैं और इस जद्दो जहेद में कब वो भी जिंदगी को चूम लेते हैं उनको भी पता नहीं चलता। लेकिन कुछ सच में हार जाते हैं वो हाथ पैर भी नहीं मारते और फिर मौत का वो कुआँ उन्हें अपने आगोश में भर लेता है।

न तो जीना आसान होता है और न मरना लेकिन जीने के मुकाबले मरना आसान है। आज मुझे कुछ दिन पहले हुए हादसे की याद आ गयी।

एक 24 साल के लड़के ने कैसे मौत को गले लगाया और मरने से पहले उसने कैसे अपना एक वीडियो भी बनाया लोगों को बताने के लिए की वो मर रहा है। जैसे कुछ लोग सुसाइड नोट लिखते हैं। माना कि वो दुखी होगा और कुछ न कुछ तो होगा ही जिसके चलते उसने यह किया पर क्या जो कुछ भी उसकी जिंदगी में चल रहा था क्या उसे बदला नहीं जा सकता था। क्या इस कहानी का अंजाम कुछ और नहीं हो सकता था।

मैंने खुद को उसकी जगह रख कर सोचा और सोचा की शायद यह भी तो हो सकता था उसकी कहानी का अंजाम। सोचा की शायद वो ऐसा सोच लेता तो आज वो जिन्दा होता। एक कविता के जरिये में उसके मौत से पहले के उसके कुछ लम्हो को फिर से उजागर कर रही हूँ ।

कभी कभी यूँ ही जब

मन कुछ भारी होता है

तब कोई नहीं मेरे आस पास होता है

कभी लगता है कह डालूं में हाल ए दिल

कभी लगता है बड़ा नाजुक है ये दिल

कहीं किसी ने न समझी मेरी बात

तो टूट जाऊंगा मैं ले-के ख़्वाबों की सौगात

कभी लगता है कोई नहीं है मेरा

कभी लगता है व्यर्थ है जीना मेरा

कभी लगता है हार गया हूँ

कभी लगता है जी ही क्यूँ रहा हूँ

फिर लगता है ऐसा तो नहीं हूँ मैं

बाकि बातों में भी तो लड़ता हूँ मैं

फिर आज कैसे उनसे हार में मानू

चल दिल के सारे राज़ कह डालूं

पर नहीं ,नहीं करता मैं अब किसी पर विश्वास

खुद से भी हार रहा हूँ आज

कह दी कही गर ये किसी से बात

हो जायेंगे मेरे जज़्बात ज़ार ज़ार

उनकी हँसी मेरा मजाक उड़ाएगी

मेरी रुयासी आवाज़ उनको न समझ आएगी

कुछ सोचा फिर अपनी अलमारी छानी

वो पुरानी डायरी फिर से बाहर निकाली

माना कि थी वो कुछ साल पुरानी

पर तब भी तो बनी थी मेरी यही कहानी

तब भी मैंने खुद दर्द और दुःख को ऐसे ही हराया था

तब भी तो मुझको लगा हर कोई पराया था

तब भी मैंने की थी उन जज़्बातों पर जीत हासिल

तब भी तो किया था मौत की सोच पर जीने का वार

तब भी तो मेरे दूर होते अपने फिर आये थे पास

तब भी तो आँसुओं से भीगा थे ये पन्ने

वो लड़कपन का पहला प्यार

तब भी तो दिल टूटा था यार

तब किस से कहा था मैंने, तब नहीं थे ये पन्ने

तब वो रेडियो साथ देता था

हर गाना मेरे दिल का हाल कहता था

तब वो दोस्त सच्चा लगता था

मेरे दिल का हर हाल वो सुनता था

वो ‘ पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा’ कहना

तब भी तो यह कह कर जीता था ना

जब भाई या बहिन भी कभी यूँ ही रोते थे

बस परेशान हूँ ,यही कहते थे

तब मैं उनको समझता था

कैसे जीना है ये बतलाता था

कभी कभी माँ पापा को भी हारा हुआ देखा है

पर फिर भी उनको हँस कर जीते हुए देखा है

तुम हो हमारे जीने की आशा

बस यही थी उनकी भाषा

इतना कुछ इतना सब जब देखा सुना है

तो फिर आज मन कैसे हारा है

मैं मर जाऊंगा लोग दुःख मनाएंगे

बस कुछ ही दिन वो दुःख जताएंगे

दो तीन दिन फेसबुक वॉट्सएप्प पर घूमेगा मेरा वीडियो

न्यूज़ चैनल अपनी टी र पी बढ़ाएंगे

लोग आते और जाते हैं

बस फिर पूर्णतिथि मनाते हैं

कुछ नहीं किसी का जायेगा

बस माँ बाप को मेरा दुःख सतायेगा

क्यूँ हार मानू बस पल भर का ये दर्द है

हर जीवन का यही अर्थ है

लिख डाली आज मैंने फिर वही कहानी

कह डाली आज अपनी आप बीती सारी

इन पन्नो में कर दिए फिर से बंद वो दुःख भरे लम्हे

कर दूँ अब बंद खिड़की के भी पल्ले

मार दी ठोकर आज फिर उस हारे विचार को

जा रहा हूँ में कमरे से बाहर को

ली कुछ लंबी सांस, भर लिया मन में आत्म विश्वास

ले दुनिया मैं फिर से तैयार हूँ

लगा तू गले या मार ठोकर में बिंदास हूँ

जिंदगी तेरा शुक्रिया की तू पास मेरे आ गयी

मुझको लगाया गले तू मुझे समझ आ गयी

ए खुदा तेरा शुक्रिया जो तूने समझदार बना दिया

जिंदगी खोल दरवाज़ा, मैंने तेरा नाम लिया

जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर मैं और आप हम सब जिंदगी की कड़वी सच्ची से दो चार होते हैं तब मन टूटता है। जिस्म हारता है, आत्मा थक जाती है और तब होती है एक मनोरोग की उत्तपति जिसे आजकल हम डिप्रेशन कहते हैं। मनो-रोग मतलब मन का रोग जो विचारों से उत्पन्न होता है।

डिप्रेशन चुप चाप दबे पाँव आकर कब हमारे दिल और दिमाग को अपने काबू में कर लेता है हमे पता ही नहीं चलता। जब पता चलता है तब तक हम हार चुके होते हैं। अपने अपनों से, दोस्तों से समाज से दूर हो चुके होते हैं। हँसते हैं पर मन से नहीं। किसी से कुछ कहना चाहते हैं पर कहते नहीं। लगता है जैसे आँखों में आँसुओं ने हमेशा के लिए घर बना लिया है। खुद पर दूसरों से ज्यादा गुस्सा आता है। और ये गुस्सा कब हमे तोड़ कर मजबूर कर देता है कुछ ऐसा करने के लिए जो हम करना चाहते हुए भी करना नहीं चाहते। आईये मिल कर इस मनोरोग का सामना करें । हमे इससे हार नहीं माननी है। अगर किसी को आप कभी भी टूटा हुआ , दर्द से ग्रस्त, हारा हुआ देखे तो उसे अकेला न छोड़ें। उससे पूछे क्या हुआ है। दुबारा पूछिये, फिर पूछिये। गले लगाइये। तसल्ली दीजिये और बोलिये मैं हूँ तुम्हारे साथ , तुम अकेले नहीं हो।

और कहते हैं

“ मन के हारे हार है मन के जीते जीत ”

तो हमे भी वही करना है अपने मन पर जीत हासिल करनी है मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं।

Image Source: careerride



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