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@dawriter

अब तो धरा बचाने को हम एक हो जायें

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ना बगिया होगीं,ना कलियाँ होगीं
ना भंवरे होगें,ना तितलियाँ होगीं
सूना आंगन होगा बस,ना महकती गलियाँ होगीं
ना होगें पेड़ धरा पर तो कहां चिड़ियों का बसेरा होगा
बिन चहचहाती चिड़ियों के सूना सा सवेरा होगा
हरा रंग धरती की चूनर से धूल जायेगा
तो सोचो रंग उदासी का चेहरे पर घुल जायेगा
झरने की कल कल, बहती नदी चंचल
रंग दिखाती पल पल ,ये सृष्टि कैसे मुस्कुरायेगी
गर हम ना समझे तो धरती माता की खुशियाँ सब छिन जायेगी
वो बारिश मे नहाना,सरदी में धूप का खिल जाना
क्या हमें बसंत मे फूलो का खजाना मिल पायेगा
ना संभले हम गर तो खुशबू का बिखरना कब हो पायेगा
बस कुछ लफ्ज नहीं ये,एक आरजू मेरी है
मां धरा से उसकी सुन्दरता दूर ना करें
बरबाद करके पर्यावरण,ना उसे रोने पर मजबूर करें
जब कल हमारे बच्चे कोई चित्र सुन्दर बनायेगें
सफेद काले रंग के सिवा,रंग कौनसा भर पायेगें
ना खिलेगा इन्द्रधनुष,ना रंग फूलों के मिल पायेगें
क्या वो महत्त्व रंगों का जीवन मे समझ पायेगें
विनती है सबसे,आगे कदम बढ़ायें
अब तो धरा बचाने को हम एक हो जायें

 



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