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@dawriter

आसान नहीं "माँ" बनना..

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नीतू और रोहित की शादी को डेढ साल हो गया था। नीतू का परिवार संयुक्त था। वो सबका ख्याल रखती पूरे मन से सभी काम करती थी। पर उसका कोई ख्याल नहीं रखता था सबको बस काम से मतलब था। नीतू का पति रोहित उसे बहुत प्यार करता था हर संभव मदद भी करता बस घरवालो से छुपके। घर में कभी कोई बात हो जाती और वो नीतू की साइड लेता तो उसे जोरू का गुलाम या बहुत बदल गया हैं तू शादी के बाद या पहले तो कभी जवाब नहीं देता था आदि बातें कह उसे चुप करा दिया जाता था।

वो सब समझ जानकर भी चुप रहता और नीतू को हर बार एडजस्ट होने को कहता। नीतू भी रोहित के ख्याल और प्यार की वजह से कभी किसी को कुछ नहीं कहती थी। एक दिन नीतू ने अपने माँ बनने की खुश खबरी घर में बताई तो घर में सब खुश थे और रोहित तो खुशी से जैसे पागल ही होगया हो।

नीतू पहली बार माँ बनने जा रही थी तो उसे नहीं पता था कि क्या  खाना चाहिए या क्या नहीं। लेकिन नीतू की सास के लिए ये कोई नई बात नहीं थी क्योंकि जेठानी के दो बेटे थे उनकी खुद की दोनो बेटियों के भी बच्चे थे। नीतू को क्या नहीं खाना उसकी हिदायत दी थी उसकी जेठानी और सास ने के केला,पाइनएपल और काली चीजें मत खाना ,ज्यादा घी अभी तीन महीने मत खाना आदि।  

पर उसे खाने का कोई कुछ नहीं कहता या कहो कोई ख्याल नहीं रखता। नीतू भी पहले की तरह ही सबके खाने के बाद खाती और काम करती रहती। उसको उल्टियां होती तो जेठानी कहती मुझे तो पूरे 9 महीने उल्टियां होती थी। ये सब नार्मल हैं मैं उल्टियां भी करती और काम भी करती रहती।

नीतू को तीसरा महीना लग गया था। अब उसे कुछ नया चटपटा खाने का मन करता और थक भी जाती थी। लेकिन सास ने चटपटा खाने को मना कर दिया था। रोहित जरूर ऑफिस से फोन करके पूछता रहता कि कैसी हो कुछ खाया या नहीं। बाकी घरवालों को तो बस काम से ही मतलब था। नीतू की माँ भी उसे खाने का कहती रहती पर नीतू को रोज का खाना अच्छा नहीं लगता था। तो आधा थोड़ा मन मार कर खाती थी।

कुछ दिनों बाद सास-ससुर की शादी की सालगिरह थी। सब ने इस बार खूब धूमधाम से मनाने का सोचा। सब को न्यौता दिया गया बाहर से भी कुछ रिश्तेदार आये। उस दिन नीतू सुबह से ही सबके आव-भगत में लगी हुई थी । एक पल को भी नहीं बैठी ना ही अच्छे से कुछ खाया। शाम को फंक्शन खूब अच्छे से हुआ। सब मेहमान इधर धीरे-धीरे जा रहे थे वही नीतू की तबियत खराब हो रही थी..

नीतू रोहित को जाकर कहती हैं उसके पेट में हल्का हल्का दर्द हो रहा है। रोहित अपनी माँ को यह बात बताता है तो उसकी मां कहती कोई नहीं होता है। इतनी रात को हॉस्पिटल कहा जाओगे। सुबह दिखा देना। जैसे तैसे नीतू ने रात निकाली। अगले दिन रोहित, उसकी मां और नीतू हॉस्पिटल गए डॉक्टर ने सब चेकअप के बाद उसे गर्भपात करने को कहा क्यूंकि बच्चें में धड़कन नहीं थी।

यह सुन नीतू रोने लगी और कहा 'डॉक्टर एक बार फिर देखो'। लेकिन डॉक्टर ने कहा 'मैंने दो बार चेक किया हैं कुछ नहीं है कोई हलचल नहीं है अबॉर्शन करना ही होगा'। डॉक्टर के रूम से निकलते ही नीतू की सास ने कहा कोई बात नहीं ऐसा होता रहता है। रोहित ने नीतू से कहा 'तुमने कल अपना ध्यान नहीं रखा होगा दिनभर काम कर रही होंगी कुछ खाया भी नहीं होगा'।

नीतू तो बस रो रही थी। रोहित की माँ ने कहा 'घर में इतने मेहमान आये हुए थे तो कहा आराम करती और बच्ची तो है नहीं के बार -बार खाने का कहते रहे। मैने तो कहा था भूखे मत रहना खाती रहना कुछ न कुछ'। 'अब छोड़ हो गया सो हो गया जल्दी से अबोर्शन करवा और एक दो दिन के लिए इसे पीहर भेज दे आराम के लिए'।

नीतू खुद को दोषी मानने लगी और रोहित से माफी मांगते हुवे कहने लगी' मैने ही ध्यान नहीं रखा आप कितने खुश थे बच्चे को लेकर मुझे माफ़ कर दो' और रोने लगी। रोहित ने उसे गले लगाते हुवे कहा 'कोई बात नहीं शायद हमारी किस्मत नहीं था'।  

8 महीने बाद नीतू फिर प्रेग्नेंट होती है। इस बार रोहित और उसके ससुराल वाले उसे अपना ध्यान रखने को कहते है। नीतू भी अब अपना बहुत ध्यान रखती। इस तरह 6 महीने बीत गए। ससुराल का व्यवहार अब भी वैसा ही था कि काम करते रहो आसानी रहेगी। जब भी नीतू फल खाने बैठती सासुमां बच्चों को देने का कहती।

नाम नीतू का होता वो एक सेब खाती हैं पूरा पर उसे मिलते एक या दो टुकड़े सेब के। जब पीहर जाती तब जो मन करता खाती और उसकी माँ भी बहुत ख्याल रखती पर  नीतू पीहर कम ही जा पाती। ससुराल में सबके होते हुवे भी सिर्फ रोहित ही उसका ख्याल रखता समय -समय पर पूछता। सब उसे जोरु का गुलाम कहके मज़ाक भी उड़ाते थे। फिर भी वो यह सब करता कभी छुपकर तो कभी सामने।

लेकिन नियती को कुछ ओर ही मंजूर था। एक दिन दोपहर में नीतू ऊपर अपने कमरे में सो रही थी उसे गहरी नींद आगयी थी शायद। जैसे ही उठी देखा 5 बजे थे उसने कहा "अरे बाप रे! मैं दो घंटे से सो रही हूं सबका चाय का टाइम भी हो गया अब तो रात के खाने की तैयारी का टाइम हो गया है। आज तो सासुमां बहुत नाराज होगी"। कहते कहते वो जल्दी -जल्दी सीढ़ियों से उतरने लगी कि अचानक उसका पैर मुड़ गया और वो सीढ़ियों से नीचे गिर गयी।

उसे जल्दी से हॉस्पिटल ले जाया गया पूरे रास्ते दर्द से कराह रही थी रो रही थी। हॉस्पिटल जाकर जब डॉक्टर ने सब चेकअप किया तो डॉक्टर ने गिरने की वजह से  बच्चे की धड़कन रुक गयी हैं कोई हलचल नहीं हो रही है आम भाषा में बच्चा गिर गया है कि बात बताई। रोहित के तो जैसे पैरों तले जमीन ही खिसक गई हो।

दूसरी बार नीतू का गर्भपात हो गया। इस बार भी नीतू खुद को दोषी मान रही थी टूट सी गयी थी। सासुमां भी कहने से बाज नहीं आयी के 'छोटी बच्ची हो क्या अपना ध्यान नहीं रख सकती ना जाने कब मेरे बेटे को बच्चें का सुख देगी"। 'कितना खुश था मेरा बेटा तेरी वजह से उदास हो गया'।  

नीतू भी तो उतनी ही दुःखी थी जितना रोहित। पर होनी को कौन टाल सकता है। पर वक़्त हर घाव भर देता हैं।  

डेढ़ साल बाद नीतू फिर गर्भवती हुई। लेकिन इस बार वो डर रही हुई थी कि कही फिर से उसके साथ कोई अनहोनी ना हो जाये। रोहित ने उसे बहुत समझाया कि हर बार ऐसा थोड़े न होता हैं। तुम ये सारी नकारात्मक बातें मत सोचो, खुश रहो, अपना ख्याल रखो, खाओ पीओ अच्छे से बस। रोहित की ये सारी बातें उसे हौसला जरूर देती पर अंदर ही अंदर एक डर था उसे।

इस बार डॉ ने नीतू को बेड रेस्ट करने का कहा और कोई तनाव लेने से भी मना किया। और फल, सब्जी जूस वैगरह खाने की सलाह दी। रोहित ने डॉ की कही सारे बाते जब घर पर बताई तो उसकी माँ ने कहा 'ये सब आज कल के डॉक्टरों के चोंचले हैं बस क्या हमने कभी बच्चे नहीं जने" पूरे महीने आराम करती रहेगी तो आगे चल कर बच्चा ऑपरेशन से होगा नॉर्मल नहीं। "

पर रोहित ने अपनी माँ से साफ -साफ कहा कि 'इस बार कोई लापरवाही नहीं जो और जैसा डॉ कहे वैसा ही करना है'। तो रोहित का माँ ने मुँह बनाते हुवे कहा 'ठीक है जो मर्जी कर हम कुछ नहीं बोलेगे भई! तुम ही सब समझदार हो हमारे तो बच्चे हुए ही नहीं जैसे फिर मत आना हमारे पास के आप सही थी"।

रोहित ने कहा "माँ आप भी ना कहाँ की बात कहाँ ले जाती हो मैं तो बस ये चाहता हूं इस बार कुछ भी ऐसा वैसा न हो। " 'हाँ तो मैं भी तो यही चाहती हूं तुम्हारा भला' रोहित की माँ ने कहा। अगले दिन रोहित ने नीतू को सुबह जल्दी उठ कर काम करने के लिए जाने को मना कर दिया और कहा "तुम बस आराम करोगी याद हैं ना डॉ ने क्या कहा है"।

ससुराल में रहते हुवे अपने कमरे में आराम करते रहना नीतू को अच्छा नहीं लगा तो वो बाहर आकर बैठ गयी सासुजी ने हिदायत दी कि" ठीक है ज्यादा काम मत करना पर, दिनभर आराम करोगी, पड़ी रहोगी अपने कमरे में तो मन कैसे लगेगा। एक काम करो 'कपड़े धो नहीँ सकती तो सूखा दिया करो,बैठे- बैठे तह लगा दिया करो'। सब्जी काट दिया करो, घर के बच्चों को पढा दिया करो ,रसोई में कभी बर्तन जमा दो, रोटी कभी सेक दो'। ऐसे में तुम्हारा मन भी लगा रहेगा।

नीतू चुपचाप सब सुन रही थी और हां में सर हिला रही थी। अब वो घर के छोटे मोटे काम करती रहती थी। रोहित जब घर रहता नीतू को कोई काम करने नहीं देता। खाना भी कमरे में लेकर जाता। फल भी खुद काट नीतू को खिलाता। लेकिन उसके आफिस जाने के बाद ये सारे काम नीतू खुद अपने लिए और आने वाले बच्चें के लिये करती।

कोई फल तक भी काट के नहीं देता उसे। लेकिन ठीक तरह से आराम ना करने के कारण नीतू को चक्कर भी आते और थोड़ा पेट भी दुखता। डॉ के पास गई तो डॉ ने अब हर महीने इंजेक्शन लगाने और पूरा आराम करने को कहा। रोहित ने इस बार नीतू को घर के छोटे मोटे काम भी करने को मना कर दिया।

पर नीतू अपनी सास को क्या कहती वो फिर भी काम कर रही थी। एक दिन रोहित किसी काम से दोपहर में घर आता हैं और नीतू को रसोई में बर्तन रखते हुए देखता और गुस्से से कहता है "मैंने मना किया है ना कुछ नहीं करना सुनती क्यों नहीं हो तुम"। चलो जाओ अपने कमरे में आराम करो"।

नीतू ने कहा 'ऐसे अच्छा नहीं लगता मैं दिन भर आराम करती रहूं'। रोहित ने कहा" अभी क्या जरूरी है हमारा बच्चा या घर के काम बोलो"। नीतू ने कहा " बच्चा" पर क्या करूँ मैं मुझे दिनभर कमरे में रहना भी तो अच्छा नही लगता और अपना काम ही तो कर रही हूं। " रोहित ने कहा "तुम मायके चली जाओ वहाँ आराम भी हो जाएगा और तुम्हारी मम्मी और बहन दोनो ख्याल भी रखेगे"। 'लेकिन सासु माँ को कैसे बोलेगे आप' नीतू  ने सवाल किया।  

रोहित ने कहा वो तुम मुझ पर छोड़ दो।  

रोहित अपनी माँ के पास जाकर नीतू के मायके जाने की बात करता है तो उसकी माँ थोड़ी नाराज होते हुवे कहती है " क्यों यहाँ क्या हम उसका ख्याल नहीं रखते हैं, अब तो दिन भर आराम ही करती हैं तेरी बीवी" लोग क्या कहेंगे ससुराल वाले अपने बहु का ध्यान भी नही रख सकते क्या'।

रोहित ने कहा "ऐसी बात नही है माँ! डॉ ने उसे पूरा आराम करने को कहा हैं। नीतू को यहां दिन भर कमरे में पड़े रहना और आपसे काम करवाना अच्छा नहीं लगता"और आप भी तो क्या क्या करगें"। ये सुन रोहित की माँ ने नीतू को मायके जाने की इजाज़त दे दी।

अब नीतू अपनी माँ के घर रह रही थी। उसकी माँ और बहन उसका पूरा ख्याल रखते। सासुमां भी फोन पर हिदायतें देती रहती के कुछ काम मत करना अच्छे से खाना,आराम करना। एक दो दिन के लिये यहाँ भी आ जाना। नीतू हफ्ते में एक दिन जाती थी ससुराल। रोहित ही मना कर देता आने से।  

इस तरह 6 महीने अच्छे से निकल गए सारी रिपोर्ट्स भी सही आयी। एक दिन रोहित की माँ ने कहा "अब तो बहू को यहाँ आ जाना चाहिए। " डिलेवरी के समय चली जाए"। रोहित ने इस बार मना कर दिया क्योंकि वो जानता था यहाँ अगर नीतू आएगी तो वो फिर से काम करेगी खाना-पीना भी अच्छे से नहीं करेगी। अभी सब सही भी हैं और नीतू खुश भी है वहाँ।

देखते ही देखते डिलेवरी का दिन नजदीक आगया। 9 महीने होने को आये इस बार नीतू जब डॉ को चेकअप कराने गयी तो डॉ ने कहा" बच्चे के गले के पास ही गर्भनाल हैं तो ऑपरेशन करना होगा। बच्चे को खतरा हो सकता हैं"। ये बात सुन नीतू और रोहित दोनों ही घबरा गए।

रोहित ने अपनी माँ को जल्दी से हॉस्पिटल बुलाया तो उसकी माँ ने कहा "मैने तो पहले ही कहा था काम करती रहेगी तो सब अच्छे से होगा पर मेरी सुनता कौन है"। डॉ को तो बस पैसे एठने से मतलब है सब डराते है। "कुछ नहीं होगा अब 9 महीने पूरे निकल जाने दे अपने आप हो जाएगा। बहु को घर ले चल।

इस बार नीतू ने कहा "नहीं मां जी इस बार मैं अपने बच्चें को नहीं खोना चाहती। बहुत मुश्किल से ये 9 महीने निकले हैं एक -एक दिन गिन के"। रोहित ने भी नीतू का साथ दिया और ऑपरेशन के लिए हाँ कर दी।

अगले दिन सुबह नीतू को ऑपरेशन से एक प्यारी सी बेटी हुई। रोहित और नीतू बहुत खुश थे। नीतू की सास ने ये ताना जरूर मारा के "मेरे बेटे का बेटा हो जाता तो अच्छा होता"। लेकिन नीतू को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा कि बेटा हैं या बेटी। वो आज एक "माँ" है।

कहानी कैसी लगी जरूर बतायेगा।

Image Source: indiblogger



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