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@dawriter

सुकून की तलाश

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आज फिर पंकज के कदम उस पुराने रास्ते पर चल पड़े है, जहाँ वो बरगद अपनी स्नेहिल छांव बिखेरने को हमेशा तत्पर रहता है, गली में मुड़ते ही हवा ऐसे छू गई, जैसे सारी थकान छूमंतर हो गई..ये जीजी जीजा का घर ही था, जहाँ से वह पढ़ा लिखा, और शादी भी इनकी ही वजह से हुई थी..दीपा रिश्ते में जीजी की दूर की ननद थी। जीजी ने ही बात चलाई थी, उन्हें अपने मायके के लिए घरेलू लड़की चाहिए थी, और दीपा की भी कोई शर्त नहीं थी, क्योंकि वो महज दसवी पास थी, पढ़ाई से उसे मतलब ना था।

जीजी दरवाजे पर ही खड़ी थी, देखते ही कितनी खुश हो गई थी, एक ही शहर में। रहते हुए दोनों भाई बहन अजनबी थे, कारण पकंज की पत्नी दीपा, जो पहले दिन से ही परिवार में सहज नहीं थी, पहले गांव से नाता छूटा, परिवार छूटा और जीजी को तो न जाने क्या क्या इल्जाम लगाकर दीपा ने भाई बहन का रिश्ता तोड़ दिया। जीजी ने बस एकबार बस समझाने को उसे कुछ कठोर बाते कह दी थी, उसने बदला ले लिया। उसके बाद ऐसी बातें हुईं, कि रक्षाबंधन भी भूल जाता। जब बच्चा था, तो जीजी जीजा जी ने हरसंभव सहायता की। अब लायक हुआ तो जीजी उसके पैसों की एक साड़ी भी ना पहन पाई। इस बीच माँ चल बसी, वही मिले दोनो, पर वही पंकज का अड़ियल रवैया।

मां के जाने के आज दीपा गर्भवती थी, गर्भावस्था बड़ी मुश्किल भरी थी, डाक्टर ने आराम का कहा था। औलाद के आते ही उसका दर्द भी समझ आ गया और मन भी भारी हो गया.. चल पड़ा जीजी की गली की ओर। जैसे ही यहां बात की, जीजा जी डपट दिए, अरे ओ भलेमानस ज्यादा बड़ा मत बन, सब जानता हूंँ, मेरे बच्चे की तरह रखा है, तुम्हें.. साले नहीं हो तुम।
जाओं इतना बड़ा घर है, यही ले आओ उसे, सब इंतजाम कर लेंगे।

आज पकंज को एहसास हुआ, इस पेड़ से कटकर वह कितना निर्जीव था,आज उसे बड़ी शांति महसूस हो रही थी, उधर ऐसी बाते सुन दीपा अपने किए पर पछता रही थी। सोच रही थी, अलग रहने के लिए कितने कुटिल कर्म किए उसने, फिर भी ये लोग कितने भले हैं, ऐसे भले लोगों से अलग होकर भी कोई जीवन था। वह उत्साहित होकर तुरंत अपना सामान पैक करवाने को कमली को कहा और मन में माफी के लिए शब्द खोज रही थी..सोच रही थी..जाते ही दोनो के पैरों पर गिर पड़ेगी। आखिर घर के लोग घर के ही होते हैं।


कविता नागर..



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