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@dawriter

शेषनाग

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sunilakash by  
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"नई रोशनी" दैनिक की प्रेस में अखबार की स्थापना से लेकर आज तक, पचास वर्षों में ऐसा कभी नहीं हुआ था। कभी भी ऐसा नहीं हुआ था! कार्यालय में आकर कोई कम्पोजिटर मैनेजर के सामने खड़ा होकर ऐसी जुर्रत नहीं कर सका था...और वह भी तब जबकि सामने दूसरी टेबल पर अखबार का मालिक और सम्पादक भी बैठा हुआ हो।

सचमुच ऐसा तो कभी हुआ ही नहीं था।

अखबार के कार्यालय में मैनेजर की मेज के सामने, शंकर सिर झुकाए चुपचाप खड़ा था, ठिगने कद का शंकर चेहरे पर कई दिन की बढ़ी हुई हजामत और ठोड़ी पर झांकता हुआ कोई-कोई सफेद बाल ! जवानी में ही सूखकर पिचका हुआ पीला चेहरा और कानों के पास उठती हुई कनपटी की हड्डियाँ, जो भीतर दबे हुए आक्रोश के कारण अब और अधिक भयानक-सी लग रही थीं।

"अखबार वाले हो न तुम ? मंत्री, अफसर और पुलिस का पूरा महकमा तुम्हारी मुट्ठी में रहते हैं न? चढ़वा दो मुझे सूली पर...टेलीफोन करके बुलवा लो पुलिस को। कह देना कि मै कोई बलवाई (दंगाई) हूँ और तुम्हारे आफिस में तोड़-फोड़ करने घुस आया हूँ।" शंकर ने सहसा दाँत भींचकर और मुट्ठियां हवा में लहराते हुए कहा।

कार्यालय के भीतर और बाहर खलबली मच गई थी। बराबर के प्रेस कम्पोजिंग हाल में काम कर रहे सारे कम्पोजीटर काम छोड़ कर आ गए थे और अब कार्यालय का बाहर से द्वार घेरकर खड़े हो गए थे। वे सभी हतप्रभ से सारा माज़रा समझने में लग गए थे।

कुछ लोगों के चेहरे डरे हुए और कुछ चमचा टाइप के कम्पोजीटरों के चेहरे तो जैसे उसी पर (शंकर पर) लानत भेजते हुए। चोरी और सीनाजोरी...? यह सरासर बदतमीजी थी शंकर की...कि उसने पूरे कम्पोजीटर समूह पर आज आफत बुला भेजी थी...जैसे उसने सभी की नाक कटवा दी थी। क्या ऐसा कहना चाहिए था शंकर को? क्या मालिक-सम्पादक के सामने खड़े होकर ऐसी बदसलूकी करनी चाहिए थी? ऐसा दुस्साहस ! मालिक तो मालिक ही है। वही तो सबका आश्रयदाता है। उसकी प्रेस में काम कर रहे हैं सभी। उसी से रोज़ी-रोटी कमा रहे हैं। डी.टी.पी. कंप्यूटर ऑपरेटर हैं कोई इंजिनियर तो नहीं कि बहुत बढ़िया नौकरी मिलजाएगी। अखबार के दफ्तर में कम पढ़े-लिखे लोग, सीधी-साधी टाइपिंग करने वाले लोग ही यहाँ नौकरी पा रहे हैं।

लोग अखबार के सम्पादक से डरते हैं। वह उन्हें रोजगार दे रहा है, इस अहसान में दबे जा रहे हैं। ये लोग शंकर को ही बुरा समझ रहे हैं। मालिक के पक्ष मॆं सोच रहे हैं। मालिक का नमक खाना और उसी को आँखे दिखाने का दोषी समझ रहे हैं शंकर को।

"नई रोशनी" का सम्पादक, एक अखबार का सम्पादक और मालिक ही नहीं, शहर भर की नाक है। उसके सामने यह हिमाकत? कार्यालय में बैठने वाले उप सम्पादक, रिपोर्टर्स और प्रूफ रीडर्स सभी शंकर की इस हरकत पर तिलमिलाए हुए थे।

उधर सम्पादक टेकचंद बोल पड़ा, " देख लिया तुम लोगों ने? इस हरामखोर की इतनी हिम्मत? इस साले को चार-पाँच साल के लिए धरवा दूँगा। मेरे ज़रा से इशारे की देर है। फिर तुम सभी लोग कह दोगे कि गरीब पर जुल्म हुआ है।" सहसा वह गुस्से से चीखने लगा, "बाल-बच्चे भूखे मर जाएँगे। जेल में पड़े-पड़े एडियां रगड़ता रहेगा। शहर मॆं रहना हराम कर दूँगा। इसने मुझे समझ क्या रखा है ?"

शंकर ने आज सचमुच 50 वर्षों से चली आ रही इस अखबार और उसकी प्रेस की धाक को ललकारा था। उस परम्परा को ललकारा था, जो इस शहर के दैनिकों और इस शहर के क्या, इस जैसे कई शहरों के दैनिकों की प्रेसों मे जाने कब से चली आ रही है, जिसे कोई कंप्यूटर आपरेटर (कम्पोजीटर भी उसे ही कह देते हैं) तो क्या जिले का डी.एम. भी बदलने की हिम्मत नहीं कर सकता। इस देश में मीडिया की एक समानांतर सत्ता चलती है। पहले से ही चलती आ रही है।

सब कर्मचारी सन्न रह गए थे। यह शंकर ने क्या किया आज? अखबार के दफ्तर में खड़े होकर संपादक की उपस्थिति में मैनेजर के सामने न्यूज का बंडल फाड़कर फैंक देना...और प्रेस में से उस समय छुट्टी करके घर जाने का दावा करना जबकि उस दिन का अखबार पूरा कम्पोज भी न हुआ हो। ऐसा तो कभी उस प्रेस में हुआ नहीं था, ऐसा तो किसी ने भी किया नहीं था।

यहाँ की रीत के हिसाब से यह बहुत बड़ा अपराध होता है जब प्रेस से कोई भी वर्कर अखबार पूरा होने से पहले घर जाने पर अड़ जाए। आप ऐसे घर नहीं जा सकते भई, भले ही आधी रात हो जाए और चाहे दूसरे दिन की भोर भी हो जाए...ना...ना कोई चूं नहीं करेगा। अखबार पहले है भाई, आपकी निजी जिंदगी बाद में।

अखबार पूरा किए बिना जाना अखबार मालिक की सत्ता को चुनौती देना है। भले ही किसी को अपने घर में कितना भी ज़रूरी काम हो। किसी अन्य दैनिक अखबार में यह नियम हो या न हो, पर यहाँ तो यही नियम है कि यहाँ काम करने वाला वर्कर सिर्फ अखबार का वर्कर है। इसके बदले उसे सिर्फ सिंगल ओवरटाइम मिल सकता है और प्रेस के फोरमेन और मेनेजर की गालियाँ मिल सकती हैं...पर ज़रा भी सहानुभूति ही नहीं मिल सकती। आज शंकर ने उस पूरे साम्राज्य को ललकार दिया था। इसीलिए तो सब सकते में आ गए थे। हाय ! अब क्या होगा ?

सम्पादक गुर्रा रहा था, "पचास साल हो गए हैं "नई रोशनी" को चलते हुए। चालीस साल तक तो इसके बाप मुसद्दी ने काम किया। वह हमारे तलुए चाटते-चाटते मरा...और वही इसे इस प्रेस मॆं लाया था...और आज यही हरामखोर...?मैनेजर साहब, शहर कोतवाली के दरोगा राठी को फोन लगवाओ...।"

मैनेजर ने फौरन रिसीवर उठाकर कोई नम्बर डायल किया। वहाँ पर उपस्थित सभी वर्करों के चेहरों पर आतंक पुत गया। शंकर कितनी हिम्मत से तनकर खड़ा था। एक ठंडी फुरहरी उसके शरीर में भी ऊपर से नीचे तक दौड़ गई।

अब तो जो भी होगा, भुगतना ही पड़ेगा। सिवाय इसके और चारा भी क्या? क्या किस्मत लिखवाई थी जो इस लाइन में नौकरी करने आ गए। आज यह दिन देखना पड़ रहा है। उसका मन गुस्से और कड़वाहट से भरता चला गया। उसने ग्यारह साल पहले इंटर पास किया था। पढ़ने का बड़ा शौक था उसे। पर घर की हालत शोचनीय थी। कमाने वाले एक पिता मुसद्दीलाल---"नई रोशनी" प्रेस मॆं कम्पोजीटर थे। वे तब से यहाँ कम्पोजिटर थे, जब यह अखबार लेटर प्रेस से फरमा बनाकर छापा जाता था।

वेतन तब मिलता था चार सौ रुपये। पर इसका वितरण माह में दो बार करने की शुरू से परम्परा चली आ रही है अखबारी प्रेस में। पर जिस तरह इस वेतन का वितरण होता था, वही रोने-झीकने के लिए काफी था। वेतन जो सात तारीख में मिलना चाहिए, वह मिलता था जाकर 16-17 तारीखों में और एडवांस जो 22 तारीख में मिलता आया था, वह मिलने लगा आकर 28-29 तारीखों में। उस तरह कभी भुगतान समय पर नहीं होता तो स्थिति यह हो गई थी कि महीने के महीने दूसरे लोगों से ले-देकर खाते।

ऐसी तंगदस्ती में खाने वाले पाँच पेट...उसमें दो बहनें, एक वह और माता-पिता। ऐसे में आगे कैसे पढ़ाया जाता उसे। फिर इंटर के बाद तलाश शुरू हुई उसके लिए नौकरी की, कोई काम-धँधा लगाने की। पर काम मिलना इतना आसान कहाँ? न चाहकर बाप को उसे भी कंप्यूटर सिखाकर इस लाइन में लगा देना पड़ा।

पैसा कमाने के लिए इस घर को एक दूसरे हाथ की बड़ी सख्त ज़रूरत थी। पिता मुसद्दीलाल भी बीमार रहने लगे थे और घर में दो-दो सयानी हो आई बहनें थीं।
तब इस लाइन में पड़ा था तो आज तक गधे की तरह काम करता चला आ रहा है। मशीनी जिंदगी हो गई है। जैसे-तैसे जान पेल-पेलकर इसी प्रेस से उसने पैसा कमाया था। दोनों बहनों के हाथ पीले हुए और फिर उसकी शादी करने के दो साल बाद ही बापू मर गया था। चार सालों में उसके (शंकर के) भी दो बच्चे हो गए हैं और तीसरा अब पेट में है। माँ है, वह खुद है, उसकी बीवी और दो बच्चे, दुख-सुख, तीज-त्योहार; सभी कुछ बोझ-भार अब उस पर उतना ही लद गया था जितना अकेले ढोते-ढोते बापू मर गया था। बल्कि बापू ने इस प्रेस से उस ज़माने में जो चार हजार रुपये एडवांस लिए थे, वह विरासत में मिला कर्ज भी किसी तरह रो-रोकर और थोड़ा-थोड़ा करके चुकाया गया।

अब जाकर उसका वेतन सात हजार रुपये हुआ है। इतनी महँगाई मॆं क्या होता है इतने रुपये में? कुछ ओवरटाइम लगा लेता हैं। पर उसका भी सिंगल ही मिलता है। रोज़ पाँच-छः घंटे लगाओ तो महीने में दो हजार बनते हैं। अब कोई आदमी इस ज़माने मॆं आठ-दस हजार कमाए तो मेरठ या मुजफ्फर-नगर जैसे शहर में रहकर, इस पैसे में क्या-क्या कर ले ?

पर यही सब सहने की आदत सी हो गई है उसे और उस जैसे अन्य वर्करों को। किंतु यही बर्दाश्त नहीं होता कि पैसे का भुगतान निर्धारित तारीख से 8-8, 10-10 दिन बढ़ाकर किया जाए। पैसे का अभाव-दर-अभाव भोगते-भोगते भी आदमी पेट की आग को कब तक नज़रंदाज़ करेगा? एक वक्त न खाए, दूसरे वक्त तो वह खाएगा ही। और साहूकारों और दुकानदारों से उधार लेकर खाने की भी एक सीमा होती है। रोज़-रोज़ यहाँ भुगतान कल पर टाल दिया जाता रहता है, यही सहन नहीँ होता।

रोज़ सुबह-शाम घर से आते और जाते हुए बीवी से जो चिख-चिख होती है वह तो होती ही है लेकिन अन्य कितने लोगों की भी खरी-खोटी सुननी पड़ती है। फिर कब तक कोई आए उसके घिस्से में? और वह खुद इन लोगों से घिस्सा खाता आ रहा है।

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"मैनेजर साहब, मुझे मेरा इस महीने का पेमेंट दिला दीजिए। मेरी बीवी की तबियत अचानक बिगड़ गई है। घर से फोन आया है। देखना है कि उसे अस्पताल ले जाना पड़ेगा या..." पत्नी की तबियत को लेकर वह आज बड़ी भारी टेंशन मॆं आ गया था।

"हूँ !" मैनेजर ने सिर्फ "हूँ" की और न्यूज का बंडल उठाकर उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा, "लो ये न्यूज तुम्हें ही आकर करनी है। घंटे-दो घंटे में पैसे का बंदोबस्त करके लौट आओ।"

"घंटे-दो घंटे ?" वह चौंक पड़ा, "नहीं मैनेजर साहब, नहीं। कैसे आ सकूँगा।"

थोड़ी दूर एक टेबल पर बैठे सम्पादक महोदय बोले, "मैनेजर साहब, इस वक्त इसे पाँच सौ रुपये दे दो। बाकी पेमेंट हम कल करेंगे सभी वर्करों का।"
तनबदन में आग लग गई थी शंकर के उस क्षण, "पाँच सौ रुपये ? पाँच सौ रुपये मॆं क्या होगा साहब ?"

"तो अब कहाँ से तुम्हारे लिए हुन्डी लाकर दें। लो पकड़ो यह न्यूज का बंडल और काम करो।" मैनेजर ने वितृष्णा से मुँह बनाकर कहा और न्यूज का बंडल उसके हाथों में ठूंस दिया।

यह सुनना था कि शंकर की शिराओं में रक्त झनझना उठा। बर्दाश्त करने की और जुल्म करने की भी एक हद होती है। पलक झपकते ही उसने निर्णय कर लिया। बगावत? जो होगा, आज उसे ही भुगत कर जाएगा। उसने हाथ में पकड़ा हुआ न्यूज का बंडल खोला और सारी न्यूज झीर-झीर करके फाड़ डाली।
फटे हुए कागज के टुकडों को मैनेजर की मेज पर रखते हुए वह पूरी ताकत से चीखा, "नहीं करूँगा, नहीं करूँगा अब मै काम। जो कुछ करना चाहो, कर लो।

मैं खड़ा हूँ यहीं, तुम्हारे सामने। तुम लोग वर्कर को वर्कर नहीं, गुलाम समझते हो, कीड़ा-मकोड़ समझते हो। मेरी ज़रूरत है और तुम्हारे पास पैसा नहीं है। पाँच सौ रुपये ? मै कोई भीख माँग रहा हूँ।" वह गुस्से से कांप उठा था।

सारा का सारा स्टाफ और कार्यालय में आकर बैठे बाहर के लोग, स्तब्ध रह गए थे। आश्चर्य? इतनी हिम्मत "नई रोशनी" के सम्पादक के सामने, उसकी प्रेस में काम करने वाले किसी वर्कर ने कभी नहीं की थी। और यदि किसी ने पहले यह हिम्मत की होती तो ये दिन देखने ही न पड़ते जो आज वर्करों को देखने पड़ रहे थे।

"अखबार वाले हो न तुम ? पुलिस और सरकार में सब जगह तुम्हारी चलती है। अब कर लो जो करना है मेरा ?"

काफी समय बीत चुका है। मैनेजर दो बार फोन लगा चुका था कोतवाली के दरोगा को। पर किसको फोन लगाना था? सब नाटकबाजी थी। झूठमूठ फोन का डायल घुमाया गया था, रौब मारने के लिए। माऊथपीस में चाहे जो अपनी ओर से बक दो। ज़रूरी थोड़े ही है कि वह सब कोतवाली में ही जाकर गिरे। यह मात्र गीदड़भभकी थी -- आज शंकर को यह भी समझ में आ गया। और इसी के साथ उसके भीतर का डर भी दूर होता जा रहा था।

कार्यालय के द्वार पर बाहर और भीतर प्रेस के सारे वर्कर जमा हो चुके थे। उनमें अब परस्पर कानाफूसी भी होने लगी थी। इनमें से अधिकाँश ऐसे लोग थे जो किसी न किसी रूप में यहाँ कार्यालय मॆं या प्रेस में , मैनेजर और रिपोर्टर्स तक के द्वारा अपमानित हो चुके थे। लेकिन वे आज भी बेबस बने खड़े थे। भाग्य और ईश्वर का खेल मानकर वे इस कुचक्र को वर्षों से नहीं भेद पा रहे थे। किंतु आज तो हद ही हो गई थी।

अब क्या होना है? क्या किया जाए इस शंकर का? यही प्रश्न कार्यालय के एडिटर स्टाफ यानी न्यायपंचों के सामने भी था। इस प्रेस में जहाँ कि वर्कर इस अखबार के रिपोर्टर तथा छोटे से छोटे क्लर्क का आदेश तक नहीं ठुकरा पाते थे, आज अदना से एक कम्पोजीटर ने इतना बड़ा धमाका कर दिया था। उन पलों में सबके सब अवसन्न रह गए थे। किंतु एडिटर सोच रहा था कि वर्षों पुरानी अपनी हस्ती के पाए इतनी आसानी से हिलने नहीँ दूँगा।

"हरामी...बदतमीज...नमकहराम ! मारो इसे, मारो।" तभी चिल्लाता हुआ एडिटर का किशोर उम्र का उग्रवादी टाइप बेटा कहीं से आ निकला। सम्पादक का घर भी तो एकदम पास ही था। किसी ने उसे बताया होगा कि कार्यालय में क्या हंगामा हो गया है। तो वह दादा टाइप छोकरा अपने सम्पादक पिता की धाक और उच्च अधिकारियों से मित्रता की धौंस पर लोगों पर दादागिरी गाँठता चला आ रहा था।

वह अपने कार्यालय में, द्वार पर जुट आई भीड़ को चीरता हुआ आगे आया और शंकर की ओर इशारा करके गुर्राया, "साले की खोपड़ी में पिस्तौल की गोलियाँ उतार दूँगा।" यह कहकर वह पलटकर फिर भीड़ को चीरता हुआ वापिस चला गया। वह तीर की तरह अपने घर की ओर चला गया, जैसे वहाँ से कोई पिस्तौल लाने गया हो। मगर बहुत देर तक ना वह लौटा और न ही पुलिस के दर्शन हुए।

अब धीरे-धीरे प्रेस के वर्करों का रुझान बदलने लगा था। सभी डरपोक किस्म के और बोदे वर्कर भी शंकर की ओर प्रशंसा की दृष्टि से देखने लगे थे। लेकिन किसी में इतनी हिम्मत अब भी न थी कि दिल की बात को होठों पर ला सके।

शंकर ने गरदन घुमाकर एक ताड़ती हुई नज़र चारों ओर डाली। कार्यालय के लोगों में घिरा इस समय वह स्वयं को बेहद निरुपाय और अकेला पा रहा था। उस पर सम्पादक के गुंडा बेटे के किसी भी पल पिस्तौल लेकर आ धमकने की आशंका ! पल-पल बुझते जा रहे उसके चेहरे से साफ परिलक्षित हो रहा था कि उसका मनोबल क्षीण होता जा रहा था।

कार्यालय में कार्य करने वाले सारे सम्पादकीय स्टाफ के कर्मचारी भी इस समय एक तरफ़ थे। शंकर अकेला, कमजोर वर्कर, मारपीट हुई भी तो अपनी देह के बूते पर अकेले सारी स्थिति को झेलने के अलावा दूसरा कोई चारा न था। उसके पूरे शरीर मॆं भय की एक ठंडी लहर दौड़ गई। अगले ही पल शरीर के सारे रोमछिद्रों ने ढेर सारा पसीना उगल दिया था।

उधर सम्पादक और मैनेजर की आँख का इशारा पाकर दो रिपोर्टर और कार्यालय का एक चपरासी शंकर पर टूट पड़ने के लिए उठ खड़े हुए। तीसरा एक रिपोर्टर जो केवल दो-एक माह से ही कार्य कर रहा था, वह अभी यहाँ की सामंतशाही से पूरी तरह वाकिफ नहीं था, उसीने यह दृश्य देखा कि वे तीन लोग अभी शंकर पर टूट पड़ना चाहते हैं और शंकर को अभी कुछ भनक भी नहीं है, तो वह तुरंत कूदकर उठा।

"ख़बरदार ! अगर किसी ने एक क़दम भी आगे निकाला।" वह तुरंत कूदकर कार्यालय के द्वार पर पहुँच गया और वहीं खड़े तमाशा देख रहे वर्करों को ललकार कर बोला, "रास्ते से हट जाओ।"

उसकी चीते जैसी फुर्ती और शेर जैसी दहाड़ देखकर, सभी खड़े हुए वर्कर हकबकाकर पीछे हट गए।

"तुम सब डूब मरो चुल्लू भर पानी में, बुझदिल-गुलामों ! तुम सबको तलूए चाटने की आदत हो गई है। तुम्हारे एक साथी को अकेला करके उस पर जुल्म ढाने की तैयारी हो रही है और तुम सब तमाशबीन बने तमाशा देख रहे हो।"

कोई नहीं बोला। सबको जैसे साँप सूंघ गया था।

सभी लोगों पर हिकारत की एक दृष्टि डालकर वह रिपोर्टर शंकर की ओर मुड़ते हुए बोला, "बाहर निकल आओ शंकर। यहाँ अखबारों की पवित्र मर्यादा दफन कर दी गई है और अखबार की आड़ में गुंडागर्दी का खेल चलाया जा रहा है। मै ऐसे सारे अखबारों की, इस तरह के वर्करों के उत्पीड़न और शोषण की कहानी लिखकर इस सच्चाई को उजागर करूँगा। राजधानी के सारे अखबारों को रिपोर्ट लिखकर भेजूंगा। अपने प्रदेश के मुख्यमंत्री और श्रममंत्री को लिखूंगा। तुम बेफिक्र निकल आओ बाहर। मै सबको भुगत लूँगा। देखता हूँ, कौन रोकता है तुम्हें ?"

उपस्थित सारा जन समुदाय और कर्मचारी स्तब्ध ! यह छोटी सी घटना थी और बढ़ते-बढ़ते इतना गम्भीर रूप ले लेगी, किसी को भी तो ऐसी आशा न थी।

मैनेजर और सम्पादक को भी नहीं। और अब स्थिति इस तरह उलटी पड़ गई थी कि उस सिंहनाद करते रिपोर्टर को रोका भी नहीं जा सकता था। कार्यालय में उपस्थित किसी भी स्टाफ कर्मचारी की जुबान तक न हिल सकी थी।

उस रिपोर्टर की खुली ललकार सुनकर प्रेस वर्करों और कार्यालय के स्टाफ के लोगों के बीच घिरे शंकर का दिल भी एक क्षण के लिए काँप उठा था। वह क्या करे अब? पहले ही न्यूज का बंडल फाड़कर और उलटा-सीधा बककर वह सारा माहौल अपने खिलाफ कर चुका था। सब दूसरी यह गलती भी वह कर डाले कि इस रिपोर्टर के कहने पर बाहर निकल कर मुकाबले पर भी आ जाए ?

इस ऊहापोह से उबरने में उसने अधिक समय नहीं लिया। अगले ही पल वह कार्यालय के मुख्य द्वार को पार करके बेखौफ बाहर कूद आया।
सामने ही सम्पादक का वह किशोर आयु का उग्रवादी बेटा दो-तीन युवकों के साथ हॉकियां लिए आता हुआ दिखाई दिया। उसके होठों से झाग निकल रहे थे।
शंकर ने एक नज़र उस रिपोर्टर की आँखों में देखा और अगले ही पल वह गहरी साँस छोड़कर अपनी बाँहें हवा में उठाता हुआ अपने स्थान पर डटकर खड़ा हो गया। उस क्षण जाने कैसे उसे यह अनुभव हो रहा था कि वह शेषनाग का अवतार है। अगले ही क्षण वह गुस्से से फुफकार उठा, "आ जाओ कुत्तों !"

(समाप्त)

---सुनील आकाश



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