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@dawriter

वो तेरह दिन

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आज कितना अकेला हूं मैं...कितना शून्य सन्नाटा पसरा है चारों ओर...जैसे चारों तरफ का कोलाहल आज मौन होकर निस्तब्ध मुझे ताक रहा है..! जीवन की प्रसन्न स्मृतियों का दौर रह-रह कर उमड़ रहा है इन आँखों में, और अपने न होने का एहसास करवा रहा है ...!

कल तक तो ये आभास भी न हुआ था कि, कोई इतना भी एकल महसूस करता होगा किसी के ना रहने पर ...! आज भी याद है उसकी निश्छल हंसी और उन्मुक्त व्यवहार.. वह पायल की छम छम और चूड़ियों की खनक... कहां चली गई तुम वसु...! मेरी वसु ! आज तुम मेरे समीप नहीं हो.. तुम्हे ये संसार त्यागे मात्र तेरह दिन ही हुए हैं.. किंतु ऐसा लगता है जैसे तुम्हे गए बरसों हो गए..!

 कल तुम्हारी मृत्युभोज अर्थात तेरहवीं को मैं रो भी न सका..जी चाह रहा था कि, फूट फूट कर रो लूं..!! कैसी अजीब रीत है समाज की.. मृत्यु को भी उत्सव की भांति मनाओ ..! अपनी जीवन संगिनी के असहय विछोह में भी आगंतुक, शोक संबंधियों को भी अभिवादन करो..? क्यों है यह उपक्रम? क्या दुख से व्याकुल इंसान को व्यस्त रखने एवं दुख को भूलने का आयोजन किया जाता है? ..मात्र उस विपदा को भूलने के लिए? 

किंतु इन आयोजनों का क्या फायदा? उस व्यक्ति से पूछिए ..जिसने किसी इंसान को खोया है..! किसी अपने को खोया है...! क्या वह भूल सकता है अपने उन बीते दिनों को? उफ़्फ़ ये समाज और उसके बनाये नियम..! 

जाने कहां चले गए वो दिन ...जो मैंने और वसुधा ने एक साथ, एक दूसरे के प्रेम में डूबकर बिताए थे..दुनिया के सामने एक दूसरे को अपनाने की चुनौती स्वीकारी थी..दो प्यारी परियों के जन्म के बाद के उनकी किलकारियों में जीवन की संपूर्णता का महसूस किया था...! सब कुछ ठीक ही था, पर ईश्वर को ये मंजूर न था और तुम मुझे अपनी दोनो निशानियां सौंप कर चल बसी...! 

तुम्हे उस बीमारी के दंश में तड़पते देखने का साहस भी नही था मुझमे...! जब तुम्हे आई सी यू में उस कष्ट से लड़ते देखता, तो बेबसी का दर्द महसूस होता, जब ये लगता कि, कुछ नही कर सकता मैं तुम्हे बचाने को..! आखिर कैंसर ने तुम्हे मुझसे छीन ही लिया और जिसे दुल्हन बना कर, इतने अरमानों से मैं अपने घर लाया था आज अपने ही हाथों से सजा कर उसे मैंने इस दुनिया से विदा कर दिया...!  हां अंत्येष्टि के उपरांत, 10 दिनों के सूतक-शोक में व्यक्ति चाकू व लोटे के साथ होता है, परलोक वासी आत्मा से शायद भयाकुल होता है ..या फिर उसके छोड़ जाने के दुख में स्वयं से तर्क वितर्क कर रहा होता है, अपने दुख को सहन करने की शक्ति के साथ अपने मन का सामंजस्य करता है ..खुद ही विचार-विमर्श में डूबा होता है, परिस्थितियों से जूझ रहा होता है...!  यूँ तो उसके ना होने का विश्वास नहीं होता, पर वास्तविकता में जब मैं उसे नहीं पाता ..तो हार कर आंसुओं के साथ अपने दुख को मन से बाहर खींचकर निकालने की कोशिश करता हूँ..!  सोचता हूँ कि क्या इन बीते 10 दिनों में, मैं एक पल भी तुम्हें भूल सका हूं? वसु ! इसका उत्तर मैं हर उस क्षण ढूंढता था जब इन तेरह दिनों में मैं तुम्हारे लिए भोजन का अग्रासन निकाला करता था और सोचता था कि, " जीवन भर जिस स्त्री ने मेरे पीछे ही भोजन किया ..सदैव मेरी प्रतीक्षा किए बिना, मेरे मुख में ग्रास रखे बिना, जिसने अपने पेट की सुध नहीं ली.. क्या आज उसे यह अग्रासन स्वीकार्य होगा? क्या आज वह पतिव्रता आत्मा, पति के निर्गत अग्रासन से तृप्त हो जाएगी? क्या मृत्यु के उपरांत विधान परिवर्तित हो जाते हैं? 

समाज में जिस स्त्री को जीवन भर सम्मान नहीं मिल पाता है ..सुहागन हो मृत्यु को प्राप्त होने वाली सती को " देवी की उपाधि " दे दी जाती है? अचानक मृत्यु होते ही तुरंत समाज के बनाए हुए यह ढकोसले, झूठे रिवाज, पत्नी धर्म, संस्कार वहीं पर समाप्त हो जाते हैं? और तब पत्नी को पति के पूर्व खाने की अनुमति मिल जाती है? क्या वह आत्मा इन तेरह दिनों में एक घंटाकृति में रखे जल व कुश से मोक्ष का सुख प्राप्त कर लेगी? 

पछतावे के आंसू और सब कुछ खो देने के एहसास से मैं भर उठता हूं ..! और आज समझ पाता हूं उस एहसास को, उस श्रद्धा व समर्पण को, जो मेरी वसुधा ने जीवन भर महसूस किया होगा और जिसने मुझे मात्र तेरह दिनों में उसके अमूल्य वर्षों के उस एहसास का भान करवा दिया कि " बिना भोजन कराए स्वयं तृप्ति का अहसास नहीं होता" और अब मैं उसके इन शब्दों का मर्म समझ सकता हूं जो अक्सर वह मुझे कह देती थी ...जब मैं उसे डांट दिया करता था 'उसके भूखे रहने पर ...!! याद है मुझे ...मैं कहता था "क्यों इंतजार करती हो भूखी रहकर मेरा? क्या मिलता है तुम्हें? अरे कुछ तो खा लिया करो..!! "

 तो वह मेरी मुखाकृति को मुस्कुराती आंखों से देख कर कहती कि, : " सुख मिलता है अनुराग! तुम अभी नहीं समझोगे ..!! "

और अब मैं सोचता हूं कि सच कहती थी वो.. वास्तव में बिना पूर्व में अपने प्रिय को खिलाए, सुख का एहसास नहीं होता है ...उसे भी इस असीम सुख का एहसास होता रहा होगा.. उन बीते 21 वर्षों में जिसे मैं विगत तेरह दिनों में आंकने की कोशिश मात्र कर रहा हूं !   और पता है ! जब उसके लिए भोजन निकाल कर रखता हूं ना ! तो ऐसा लगता है कि वह सामने बैठी हुई है ..और बोलती है कि : "बताओ कैसे खाऊं तुम्हारे पहले? "

और मैं आंखों में झिलमिलाते आंसू लेकर तुरंत ही अपने मुख में ग्रास रख लेता हूं, जल्दी-जल्दी खाता हूं कि :'' सच ही तो है कैसे खाएगी मेरे पहले? ठीक कहती थी वह कि "तुम अभी नहीं समझोगे"   और आज उसके जाने के बाद सिर्फ तेरह दिनों में मैं उसके 21 वर्षो के त्याग व प्रेम का मर्म समझ गया हूं...! और बस ही सोचता हूं कि 

खत्म हुए सब दृश्य सलोने, सपने बन गए राख 

अब तो इस जीवन मे बची है बस तेरी इक याद

दोस्तों आपको ये कहानी कैसी लगी, मुझे बताना न भूलियेगा ..आपके कमेंट्स के इंतज़ार में ...

-कविता जयन्त श्रीवास्तव



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