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@dawriter

वो चेहरा कहीं खो गया।

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जीवनदायी ‘माँ’ की हमारे जीवन में क्या अहमियत है, ये पिछले 19 वर्षों में पल पल मैंने महसूस किया है। पढ़ाई पूरी होते ही एक सुयोग्य व् प्रतिष्ठित परिवार में मेरा रिश्ता जुड़ते ही माँ की खुशियों के पंख लग गये। सगाई की रस्म के बाद के छह महीने शादी की तैयारियों में कैसे निकल गए पता ही नही चला। अपनी ख़राब तबियत की परवाह किए बिना सभी जिम्मेदारियों को वे बखूबी निभा रही थीं। विदा बेला में माँ ने अपना ध्यान देने को कहा व् सहज बनी रही।शहर के कुछ दूर स्थित गांव में ससुराल के पैतृक निवास में पहुंचकर रस्मों रिवाज़ों का सिलसिला दोपहर तक चला। बाद में थोड़ी देर एकांत में अचानक आँखों से आँसू बहने लगे और शरीर में कुछ टूटा सा लगने लगा। अगले दिन प्रातः लगभग चार सवा चार बजे सासू माँ ने मुझे जगाया। मैं घबरा गई बाहर आई तो सभी जाग चुके थे। मुझे बताया गया कि तुम्हारे पापा की तबीयत खराब है और तुम्हें तुरंत निकलना है। मैं कुछ समझ पाती इससे पहले गाड़ी चल दी। रास्ते भर मैंने पापा के लिए प्रार्थना की। घर के मोड़ पर पहुँचते ही खड़ा ट्रक और अर्थी निकलने की तैयारी देख मैं बदहवास हो गई। उस समय कुछ घंटों के लिए दिल और दिमाग शून्य हो गया था।

शादी के गहनों से लेकर साड़ी की तहों में माँ के हाथ का स्पर्श व ख़ुशबू महसूस होती। बेटी के एक एक सामान को बड़े शौक से जुटाया था माँ ने। उन्हें पहनते उतारते उनकी कही एक एक बात कानों में गूँजती मगर दिल में माँ के चले जाने का शूल गड़ चूका था। जो न भीतर जाता न बाहर आता। मन की पीडाओं पर नय रिश्तों के स्नेह और कर्तव्यबोध दस्तक दे रहे थे। मगर अचानक जब कभी विदाई के दिन हुई दो अनुभूतियों को याद करती हूं तो लगता है माँ ने मुझे भी तो बुलाया था जब दोपहर में बुख़ार से तपी और फिर जब रात में आत्मा मुक्त हुई। मैं समझ न पाई। बाद में जब कभी मायके जाना होता एक व्यग्रता, एक अपूर्णता का बोध साथ होता।

सभी के स्नेहाभिवादन व् शुभाशीष के बीच माँ का मंद मंद मुस्कुराता चेहरा कहीं खो सा गया था। वर्षों बीत जाने के बावजूद आज भी सुख दुख के हर आँसू में ‘माँ’ साथ बहती है। 



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