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@dawriter

रेशमा

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रोज रात होते ही सड़क पर वो नजर आती है ........
कसी हुई चमकती चोली ......घुटने तक उठा हुआ लहंगा।

काले लम्बे बिखरे बाल .......

काजल लगी तीर सी आँखें.....

रुप ऐसा कि हिरोइन भी फीकी पड़ जाय।
ग्राहक तलाशती .....पान चबाती .....आँखें चलाती।
पास मे ही उसकी खोली ....
सब सैट था।
देखने से बिल्कुल ............
वो रोज जाता उसके पास...... रेशमा को जाने क्यों उस से चिढ थी ......
ज्यादा देर रहना ना चहाती .....पैसा पूरा देता और बस बातें ही करता .....
उसकी आँखों में शायद कुछ ऐसा था जिससे रेशमा डर जाती.....
वरना सबको डरा देती थी...

आज कुछ सोच कर रेशमा उसके इंतज़ार मे थी।
साला रोज चला आता है ......जब अपून के साथ सोनाईच नहीं तो साला आता काईकू....

खोली की दहलीज पर उसकी शक्ल देख रेशमा फट पड़ी ......
"ऐ साला जब तेरेको अपने साथ बिस्तर पर होना नहीं तो आता क्यों है ....मेरे धंधे को खराब करेगा।"
वो चुप........
उसकी चुप्पी खल रही थीं ....

"देख मेरा माथा गर्म हैं सीधी तरह बोल"

"क्योंकि............प्यार करता हूँ तुझ से......."

"आक धू..........प्यार .....साले ....एक धंधे वाली से प्यार करेगा तू"
"हां करूंगा" आँखें झुकाये बोला।

दिमाग खराब ना कर .....प्यार के नाम से नफरत है मुझको।

मै शादी करना चहाता हुँ तुम से .....घरवाली बनाना चाहता हूँ......
ठठा कर हँस पड़ी वो ...... ..कितनी देर हँसती रही हैं ...
और वो . .....आँखें फाड़े देखता रहा।

घरवाली.. .....फिर हँस पड़ी ।
एक ने बनाया था घरवाली, पता है बहुत प्यार करता था मुझे.....शादी की सुहागरात भी बनवाई गई। पूरे दो लाख मे ....कितनो के बिस्तर पर भेजा साले भडवे ने.....
पुलिस वाले तक के .....
तुम साले मर्द जात ..आक धू......
फिर सोचा जब बिकना ही है तो खुद ही क्यूँ ना बेचूँ अपने जिस्म को .....
अब अपनी मर्जी की मालिक हूँ.....
आदमी सोचता है वो औरत खरीद रहा है पर ये नहीं सोचता माल भी खर्च कर रहा है और खुद को भी............

"देख रेशमा बीती बातें मै नहीं जानता और ये भी नहीं जानने की जरूरत की तु क्या है .....तु पाकीजा हैं मेरी नजर में ......."
कुछ नहीं सुनना मुझे, तु निकल यहाँ से .......और दोबारा नजर आया तो साले मार दूंगी....धक्का दे कर दरवाजा बंद कर दिया।

मैं फिर भी आऊंगा....चाहे कुछ भी कर लेना।
कितनी देर रोती रही .....जिस बिस्तर पर रोज मर रही थी उसको घूरती रही......
पता नहीं। क्या सोचती रही अचानक उठी और कहीं चल पड़ी....
पुल पर कितनी देर खड़ी रही.....
तुम पहले क्यों नहीं आये ........अब कैसे तुमको बर्बाद होने दूं......
...सुबह नदी पर तैरती रेशमा की लाश थी ...
वो उतनी ही शांत थी जैसे वो नदी।

दिव्या राकेश शर्मा
देहरादून
(मौलिक और सर्व अधिकार सुरक्षित)

Image Source: northrup



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