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@dawriter

रूहानी मोहब्बत

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हिना बेहद उदास थी..दिसम्बर की सर्द खामोश रात में अपने आप मे खोयी हुई...उसकी आँखों की लाल लकीरें और सूजन बता रही थी..कि दिन भर आँसुओ की बारिश ने भिगोया है उसे ..किसी को जानबूझ कर खो देने की तड़प और मजबूरी क्या होती है ये तो उस पाक मुहब्बत के मयस्सर होने के बाद ही वाकिफ हुआ जा सकता है ...और सोच रही थी कि, आज तो सलमा और मंसूर की दावते वलीमा है ...कल उसका मंसूर हमेशा के लिए सलमा का हो जाएगा..मोहब्बत तो बेशक उसे मंसूर के लिए थी..मगर जिस्मानी ताल्लुक के बाद हो सकता है ये रूह के रिश्ते फीके पड़ जाएं..! सब कुछ जानते हुए भी अपने बचपन के प्यार को हंसी खुशी से लुटाने चली थी ....! आज का दिन भारी पड़ रहा था ..घड़ी की टिक टिक उसके कानों में जैसे हथौड़े की चोट कर रही थी..! आज नमाज-ए-फजर से लेकर नमाज -ए-ईशा तक उसे होश न था ..खुद को कमरे में बंद कर बैठी थी हिना ...! अपने रेशमी बालों को बेतरतीब जूड़े की शक्ल दे दी थी और बेख़याली में बस गज़लों की लाइनों में खोयी थी..सोच रही थी..इन अश्कों में डूबी रात इन गज़लों के साथ किसी तरह बीत जाए और कब सुबह के चिड़ियों के शोर के साथ उसके दिल का सन्नाटा खत्म हो...!  सलमा उसकी बेहद अजीज दोस्त थी..जब सलमा मंसूर के लिए उसे अपने जज्बात बताती तो हिना अपने एहसासों को दबा लेती, अपनी मोहब्बत तो ताकीद कर देती कि, नही मंसूर अली तो सलमा की अमानत हैं..तुझे कोई हक नही..यूँ किसी के ख्वाब देखने का..!!

एक रोज मंसूर ने नाज आपी को पूछने के बहाने फ़ोन किया और हिना को फ़ोन उठाया देखा , तो मंसूर ने मौका देख कर, डरते हुए अपनी मोहब्बत का इज़हार कर दिया, हिना को एक लम्हे को तो दुनिया की सबसे बड़ी खुशी मिल गयी मगर जब मंसूर ने उसकी मंजूरी पूछी तो हिना को सलमा की दोस्ती और उसकी मंसूर के लिए बेइंतेहा मोहब्बत याद आ गयी..! वो मंसूर को ,खुद के लिए आजिज देख सुकून से भर उठी..मगर उसने हामी नही भरी..!

 और होंठ काट कर कहा , "मेरे खुदा आपने क्या कह दिया ..मैं तो किसी और की मोहब्बत में कैद हूं...' आगे वो कहना चाहती थी पर मंसूर ने फ़ोन काट दिया..! 

हिना अपने मकसद में कामयाब हुई पर किस्मत के हाथों हार गयी..। अपनी बेबसी पर फूट फूट कर रो रही थी। उसके तीन महीने के अंदर ही मंसूर और सलमा का निकाह मुकर्रर हो गया..!  ******

.....तभी अजान की आवाज उसके कानों में पड़ी ,और नीचे दालान में कुछ हलचल सी हुई ..हिना उठ खड़ी हुई..! डर कर दरवाजे के नज़दीक पहुची कि, कुंडी देख लूं कहीं खुली तो नही रह गयी...ज्योही आगे बढ़ी एक साया ,लपक कर कमरे में आ गया..और धुंध और कोहरे के कारण बाहर से भीतर दिख नही रहा था..! हिना डर के मारे चीख ही पडती कि, चौंक कर उस साए ने आगे बढ़कर हाथ हिना के मुह पर रख दिया..ताकि चीखने की आवाज़ बाहर न जा सके...! सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि, हिना को समझने का मौका ही न मिला..! तभी वो साया फुसफुसाया, और ये उसे मंसूर की आवाज़ लगी.. " श श्श...चुप.. हिना ! ये मैं हूं ... शोर मत मचाना ..

आपसे मिलने आया हूं...!" और उसके मुंह पर से हाथ हटा लिया। "हिना ने कांप कर कहा..." छोडिये मुझे..', आप यहाँ ? यहां क्यों आए? सलमा कहाँ है ? आपने धोखा दिया उसे ? सलमा तो मोहब्बत करती है आपसे..., आप दोनों का निकाह हो चुका है..!! और अब आप सलमा की अमानत हैं..!! एक सांस में बोलती गयी हिना..। मंसूर ने फिर पागलों की तरह कहा ..." नही हुआ, नही हुआ निकाह ..!!! हिना ने हैरत से देखा ...तो मंसूर ने उसकी आँखों मे आँखें डाल कर कहा..

"सलमा ने निकाहनामे में , निकाह कुबूल नही किया ..!! आप को पता है क्यों? ... " 

वो जान गई थी कि, मैं आपसे प्यार करता हूं... और निकाह के दिन ही उसे ये भी पता चला कि, सिर्फ मैं ही नही...आप भी मुझसे मोहब्बत करती हैं..!! हिना को काटो तो खून नही..! "ये क्या कह रहा है मंसूर? ये कैसे हो सकता है ? लोग क्या सोचेंगे? सलमा क्या सोचेगी ? उफ़्फ़ मेरे खुदा !! रहम , रहम कर !! "

अभी हिना सोच ही रही थी कि, कमरे में सलमा ने प्रवेश किया...

" वाह हिना वाह !! बहुत दिलेर हो गयी तू तो..!! मुझे अपनी हमराज बोलती थी..और सारे राज छुपा लिए ? महान बनने चली थी ...मंसूर को मुझे दे कर ताउम्र मुझे एहसानों के बोझ से दबाना चाहती थी..! वो तो निकाह के ठीक एक दिन पहले मैं तेरे घर आयी थी..

जब तू बाजार गयी थी..मेरे दुपट्टे के रेशमी लटकन लाने..! तभी तेरी असल हमराज ' तेरी डायरी' मेरे हाथ लगी..और तेरी रूहानी मोहब्बत, सलमा का मसला और इश्क की कुर्बानी तक का सारा राज मेरी समझ में आ गया..! 

" और सुन ..मैं तुझसे बहुत खफा हूँ...तूने मुझे इतना पराया कर दिया..!  हिना ने रोते हुए कहा .." नही सलमु ! तू तो मेरी जान है , तेरी खुशी से बढ़कर मेरे लिए दुनिया मे कोई नही..! 

" अपनी मोहब्बत भी नही ?? .....सलमा ने कहा ।

हिना खामोश ...!  सलमा .."जब मैंने मंसूर को ये बात बताई तो उन्होंने कहा ...तुमने मंसूर को तीन महीने पहले इनकार किया था ये बोलकर कि, तू किसी और से मोहब्बत करती है ...' क्यों ? तब मैंने बताया कि, ये सरासर झूठ है..! हिना तूने मेरे लिए झूठ क्यो बोला ? तुझे क्या लगा ये सुनकर मंसूर तुझसे नफरत करेंगे और सलमा को अपनी शरीके हयात बना लेंगे ..? 

तो सुन ले मंसूर आज भी तुझसे ही मोहब्बत करते हैं ..! सिर्फ तेरे हैं..!  हिना अश्को के समंदर में खुद को डुबो रही थी, और साथ ही खुद को दो ऐसे हमदर्दों के साथ खड़ा देख खुश भी थी..! 

तभी सलमा ने मंसूर का हाथ पकड़ कर हिना के हाथ मे रख दिया..! और कहा " लीजिए जनाब अपनी मोहब्बत को सम्हालिये .."  और मुस्कुराते हुए कमरे से बाहर चली गयी..! उन दोनों को गिले शिकवे मिटाने के लिए तन्हा छोड़ कर।

 

और अब हिना के पास वो मंसूर था..जो सिर्फ उसके लिए था...मंसूर ने हिना को अपनी मोहब्बत के दौर से लेकर इन्कार के बाद तक का मंजर बताने की कोशिश की...पर हिना ने उसे रोक दिया..और कहा " लोग कहते थे कि, किसी को दिल से चाहो तो सारी कायनात आपको उससे मिलाने में लग जाती है...! ' शायद सच ही कहते थे...आज देख लिया कि, रूह को रूह से मुहब्बत हो तो वो रूहानी मोहब्बत कहलाती है। क्यों हुआ ये ? और किस तरह हुआ ...? सलमा को पता चला, और उसने आपसे क्या कहा ? क्यों निकाह के ठीक पहले ही सब कुछ पलट गया..? ये सब कुछ समझना बेहद पेचीदा है..!  मंसूर ने हिना के हाथ को मजबूती से थाम कर कहा ..कुछ मत सोचो हिना..! जो हुआ शायद ऊपर वाले कि मर्जी थी ...! "

और हिना मंसूर के हाथों की मजबूत पकड़ में उस इश्क की गहराई को भांप गयी ..जिसने आज उन दोनों को मिला दिया ..हिना मुस्कुराकर मंसूर के आगोश में समा गई...! और कमरे में ग़ज़ल की दिलकश लाइनें गूंज रही थीं ...

"जो तेरा है तेरे लिए , कयामत से लौट आएगा..

तू देख कैसे वो तेरे प्यार से, खुद तुझे मिलाएगा..! ********



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