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@dawriter

रीति रिवाज हैं 'दहेज' का दूसरा नाम

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पहले जमाने में लड़के वाले अपनी मांग रख देते थे साफ-साफ। जैसे कि हमें दहेज में घर ,गाड़ी, सोना और इतना कैश चाहिए। सबके सामने होता था कि लड़के वालों की यह मांग हैं भई। फिर कानून बना दहेज लेना जुर्म है जो शादी में दहेज़ लेगा या कोई मांग रखेगा उसे सजा होगी। 

तो आजकल लड़के वाले जब लड़की पसंद करने जाते हैं तो बहुत ही मीठे शब्दों में कहते हैं "जी हमें तो बस पढ़ी-लिखी संस्कारी लड़की चाहिए दो कपड़ो में भेज दो और कुछ नहीं चाहिए हमें"।

रिश्ता पक्का होते ही चालू हो जाता है इनका रीति -रिवाज पुराण। जैसे कि "हमारे परिवार की रीत हैं कि सगाई का सब कार्यक्रम लड़की वाले ही करते हैं"। औऱ लड़के के ननिहाल पक्ष को कुछ किलो मिठाई और शगुन भिजवाते हैं आप को जितना सही लगे भेज दे अब रीत हैं निभानी पड़ती हैं"। 

लड़की वाले रीत -रिवाज को तो मना कर नहीं सकते उन्हें सब करना पड़ता है। ये रीत -रिवाज यही खत्म नहीं होते शादी के वक़्त भी कभी ननिहाल के नाम पर, तो कभी ननदो या बाई-बेटी के नाम पर, लड़की वालों से नकद मांग ही लेते हैं। केवल नकद ही नहीं कपड़े और सोने या चांदी की चीज़ भी मांग लेते हैं रिवाज के नाम पर।

और समाज में नाम भी की हमने कोई दहेज नहीं लिया। और जो सामान गहने आये वो सब अपनी बेटी को अपनी खुशी से दिया हैं। अपनी बेटी को कोई कुछ भी दे हम क्यों मना करें। अपनी बेटी और अपने जवाई को दे रहें हैं हमें नहीं। हमने तो बस रीत का लिया है। 

अब शादी के बाद की मांग! माफ करना रीत-रिवाज की बात करते हैं। पहली होली हो या दीवाली या कोई ओर त्यौहार पीहर से कुछ किलो मिठाई और कुछ कपड़े आते रिवाज के नाम पर। पहला सावन या तीज तो पीहर से कुछ फल मिठाइयां और नकद आते हैं रीत के नाम पर। पहला बच्चा हैं तो पीहर में ही डिलेवरी होगी और जब ससुराल आती है तो रीति -रिवाज के नाम पर खुद के, बच्चें के, उसके पिता के ,और सासुजी के, ननद के, सबके लिए कपड़े और नेक लाती है।

लड़की वाले पहले डिलेवरी का खर्च, फिर जापे का और फिर ये रीत -रिवाज के नाम का दहेज़ देते रहते हैं। और अगर पहला बच्चा लड़की हैं तो पहले बच्चे के नाम पर पीहर वाले सब करे और दूसरा बच्चा अगर लड़का हुआ है तो 'लड़का' हुआ है उसके नाम पर रिवाज बता पीहर वालों पर सब खर्च सौप दिए जाते हैं। फिर आती हैं मुंडन की बारी उसमे भी सब पीहर वाले करते है।

सोचने वाली बात यह हैं कि सारे रीति-रिवाज पीहर से लेने के वक़्त ही याद आते हैं ससुराल से देने के कोई रिवाज नहीं होते हैं क्या। और कही हो भी तो रिवाज है कह के 11 या 21 रुपये थमा दिए जाते हैं। ऐसा सिर्फ लड़के वाले कर सकते हैं लड़की वाले नहीं। उन्हें तो सब एक से एक बढ़कर देना होता हैं। बेचारे लड़की वाले रीति -रिवाज के नाम पर ताउम्र लड़के वालों की मांगे पूरी करते रहते है।

कौन कहता हैं दहेज़ लेना -देना खत्म हो गया है। अगर ऐसा है तो रीति -रिवाज के नाम पर जो मांगा जाता है उसे क्या कहेंगे आप। आज के दौर में जो रीति-रिवाज के नाम पर जो मांगा जाता है वो और कुछ नहीं दहेज का ही दूसरा नाम हैं। आपकी क्या राय हैं जरूर बताये।



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