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@dawriter

मै नारी हूं

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भरी भावनाओं के गागर सी
कहीं निश्चल ठहरे सागर सी
ममता दया से ओत प्रोत मै
कभी कठोर हो जाती पत्थर सी
मुझको जिसने रचा धरा पर
मै उसकी आभारी हूं
देव स्वयं मेरी करे वन्दना
हे मानव,मै नारी हूं।
कभी पर्वत सी निश्चल अडिग
कभी बहती निर्मल धारा सी
कभी किसी को देती मरू में
जल की बूंद बन सहारा सी
कभी प्रेम की मेघ सी बरसी
कभी अंधियारे मे तारा सी
मै भावुक हूं,मै नाजुक हूं
मगर नहीं बेचारी हूं
मुझमे हिम्मत सृष्टि रचने की
हे मानव,मै नारी हूं।
नहीं चाहिये चरण वन्दना
ना चाहूं,कोई  गुणगान करें
मै चाहती हूं बस इतना कि
सभी मेरा सम्मान करें
पैरो की जूती ना समझो
ना दया की पात्र बनूं
मै दीन नही हूं ना ही
मै कोई बेचारी हूं
जननी हूं पालन करती हूं
हे मानव, मै नारी हूं
मुझको भीख नही चाहिये
ना मन बहलाने का साधन हूं
पुत्री रूप में जन्म लिया तो
ना मै कोई अभागन हूं
मुझमे कमी नही साहस की
ना निश्चय से डिगू कभी
सब करने की ताकत मुझमें
मै समता की अधिकारी हूं
क्यों मुझसे ये भेदभाव
हे मानव मै नारी हूं
 

 



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