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@dawriter

मुक्ति

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मुक्ति

"ये पिल्ला कुछ देखा देखा सा लगता है बे डेविड" बनवारी ढाबे वाला उस 10-11 साल के दुबले पतले से लड़के को गौर से देखता हुआ बोला। वो जग्गू था जो तीन दिन की भूख से बिलबिलाते हुए उस रात वहाँ नौकरी मांगने आया था।

"ये तो परचे वाला छोकरा है बाप ..अभी तीन चार दिन पैले इसकु मोर्चा वालों ने जूता फैक्ट्री से मुक्त करायेला है ..बोले तो बाल सिरमिक करके ..इसका फोटू परचे में आयेला है .."

"अरे हाँ ..अबे निकाल बाहर इसको ..उस जूता फैक्ट्री की तरह मेरा ढाबा भी बंद करवायेगा क्या बे ? डेविड देखता क्या है .. .बाहर फैंक इसको .."

डेविड उसे एक मरे हुए जानवर की तरह घसीटता हुआ ढाबे से बाहर कर गया। जब से जूता फैक्ट्री से मोर्चे वालों ने उसे एक बाल श्रमिक के रूप में "मुक्त" करवाया था, तब से कोई काम पर नहीं रख रहा था। अख़बार में तीन नम्बर पेज पर उसका फोटो जो छपा था। भूख के मारे चलना मुश्किल हो रहा था। सामने पूर्णमासी का चाँद निकला हुआ था। उसे देखकर उसकी भूख और भड़क गई थी। माँ जब जिन्दा थी तब ऐसी ही तो रोटी बनाती थी। गोल मटोल और बीच बीच में कुछ सिकने के काले भूरे से दाग।

फुटपाथ पर घिसटते हुए कदमों से चलते चलते उसकी नज़र एक बेसुध शराबी पर पड़ी। वो उलटा पड़ा था। उसकी पीछे की जेब से हृस्टपुष्ट पर्स नुमाया हो रहा था। मंत्रमुग्ध सा वो उसकी तरफ बढ़ चला। फिर कुछ सोच कर ठिठक गया। माँ कहती थी चोरी करना पाप होता है। वापिस घूमा तो सामने वही पूर्णमासी का चाँद चमक रहा था। काले आकाश में कई छोटे छोटे तारों के बीच। माँ के आंचल की तरह। जब माँ उसे अपनी गोद में आँचल ओढ़ाए चूल्हे पर रोटियां बनाती थी तो उसके फ़टे आँचल के छोटे छोटे छेदों के बीच एक बड़े से गोल छेद से चूल्हे की लौ ऐसे ही तो लपलपाती नजर आती थी। दूर कहीं रेडियो बज रहा था और गाने की आवाज आ रही थी, उसे लगा जैसे माँ लोरी सुना रही थी, कह रही थी तुझे किसी भी हाल में जीना है। अब जीने के लिए एक ही रास्ता सामने था। उसने निर्णय ले लिया। अब वो मजबूत कदमों से वापिस बनवारी के ढाबे की तरफ बढ़ रहा था लेकिन इस बार एक ग्राहक की तरह, अब वो वास्तव में मुक्त था। सभी नैतिकताओं से मुक्त। जेब में मोटा सा पर्स था। जिंदगी ने रास्ता ढूंढ लिया था। शायद यही समानता है जिंदगी में और बहते पानी में।



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