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@dawriter

मायका: ‘कुछ अहसास’ ‘कुछ उम्मीदें’... जो हर दिल में जगती है।।।

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‘मायका’ इस तीन अक्षर के शब्द में वो जादू है जिसको सुनते ही हर उम्र की विवाहित औरत की आँखों में चमक और होठों पर मुस्कराहट आ जाती है।

आज मैं भी आप सबसे ‘मायका’ और इससे जुड़ी हम सबकी उम्मीदों पर कुछ कहना चाहती हूं।

एक लड़की के कुँवारे सपने जब शादी की हकीकत में बदलते है तो उसके जन्म गृह और नए घर के बीच एक सीमारेखा बन जाती है। इस सीमारेखा को पार कर नए घर में प्रवेश करने के लिए उसे अपने जन्म गृह से पराया होना पड़ता है और अब वो घर उसका ‘मायका’ होता है।

‘मायका’ जहाँ हर लड़की ने अपनी उम्र के 22,24,28 आदि उनके वर्षों को गुज़ारा होता है जहाँ पिता का अनुशासन, माँ का लाड़, भाई की नोंक-झोंक सब कुछ देखे और जिए होते है। किसी रिश्ते के लिए अलग से कुछ करने की जरूरत उसे नहीं होती फिर भी सभी उसे प्यार करते है।

शादी के बाद विदाई के वक्त आँचल में चावल, दूब, हल्दी, मिठाई में जैसे सारा अपनापन और अधिकार बाँध के अजनबी हाथों को सौंप दिया जाता है।

बरसती आँखों के साथ नए घर की चौखट पर खड़ा सहमा हुआ मन अजनबी आँखों में प्यार और सम्मान ढूंढता है।

दिन बीतते है नए घर को अपना बनाने की कोशिशे चल रही मगर मायके की याद आते ही आँखे गंगा-जमुना बन जाती है पर ये आँसू भी समझदार हो चुके है अकेले में ही निकलते हैं।

नए घर में हर काम को करने की सजगता और मायके में देर सुबह तक मुँह ढक कर लेटे रहना याद कर मन कैसे होने लगता है।

शादी के बाद पहली बार मायके जाने का अवसर है भाई बुलाने के लिए आता है भारी साड़ी और जेवर गहनों से लदी-फदी चल देती है पर ये क्या जिस भाई के सामने बक-बक कर उसका जीना मुश्किल कर देती आज उसके सामने शब्द ही नहीं निकल रहे। माँ बाहर ही जल का भरा कलश लेकर इंतज़ार करती खड़ी है कार से उतरकर यहाँ भी सारे रीती-रिवाजो को पूरा कर अंदर जाना होता है। मन तो करता है दौड़ कर अपने कमरे में चली जाऊ। माँ से लिपट जाऊ मगर न मालूम ये गहनों और भारी साड़ी का बोझ है या फिर कुछ और घंटे तो सिमट कर कुर्सी पर ही बैठी रह गई।

मायके आने के बाद ही जाने का दिन भी निश्चित हो जाता है और वे दिन बीतते नहीं है जैसे उड़ने लगते है। सुबह उठते ही एक दिन और कम हो गया का अहसास कचोटता है।

तीज त्योहारों में ‘मायके’ से आयी साड़ी सबसे प्रिय और मिठाई सबसे स्वादिष्ट लगती है।

‘ससुराल’ में देवर या ननद की शादी है आँखे सुबह से ही भाई और पिता की राह देख रही है।

दौड़ते भागते पाँव थम से जाते है जब कानों में ‘मायके’ से किसी के आने की आवाज़ सुनाई देती है और फिर तो ख़ुशी चेहरे से छुपाये नहीं छुपती।

समय बीतता है एक बच्चे की माँ बनकर भी ‘मायके’ का उतावलापन खत्म नहीं होता। खुद के माँ बनने से ज़्यादा ख़ुशी मामा और मासी बनाने में होती है। ‘मायके’ से ‘बधावा’ में आयी चीज़े बहुत भाती है।

फिर बच्चे के साथ पहली बार मायके जाना होता है वहाँ माँ,भाभी,बहन के द्वारा की गयी देख-रेख शरीर को बहुत आराम पहुंचती है।

पुरानी लापरवाही वापस आने लगती है। बाद में तो गर्मी की छुट्टियाँ में ही बच्चो के साथ ‘मायके’ जाना होता है।

‘मायके’ में कोई बीमार है पता चलते ही लगता है इसी पल दौड़ कर चली जाऊ मगर यहाँ तो एक-एक सदस्य की दैनिक जरूरतों ने ऐसा बाँध रहखा है कि निकलना ही नहीं हो पा रहा।

विदाई के वक्त आँचल में मिले चावल, हल्दी,दूब से मन इस बाँध दिया जाता है कि इस नए घर का हर काम जरुरी लगता है।

वक्त के पंख लग गए है बच्चे अपने करियर में आगे बढ़ चुके है उनकी शादी की चर्चाएं होती है तो तुस्त याद आते है बच्चो के मामा जिन्होंने बचपन से ही बहुत लाड़ किया है। संदेश जाता है आओ देखलो रिश्ता पक्का करना है।

बढ़ती उम्र के साथ शरीर कमजोर पड़ने लगता है छोटी सी परेशानी भी महीने भर की बेड रेस्ट में बदल जाती है सभी आ रहे है मिलने मगर आँखे तो भाई भांजों को ही तलाशती है मालुम सबकी व्यस्ततये है मगर मन मानने को तैयार नहीं ।

और जिस दिन वे आ जाते है बिस्तर पर रहने की पीड़ा आधी हो जाती है।

ये है ‘मायका’ कुछ मेरा कुछ तुम्हारा कुछ हम सबका जिसकी जरूरत हमे हर ख़ुशी और दुःख में पड़ती है। ‘मायका' सारी उम्र एक औरत के दिल में उम्मीदों को जगाता है। कुछ पूरी होती है कुछ अधूरी रहती है मगर खत्म नहीं होती।

RAGINEE SRIVASTAVA..



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