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@dawriter

मानव श्रेष्ठ

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एक बार एक पड़ोसी के घर उनके गुरु जी आए हुए थे। शाम को प्रवचन था। संगत में आने का न्योता हमें भी दिया गया था। अब पड़ोसी होने के नाते मना नहीं कर सकते थे इसलिए जाना भी ज़रूरी था। मैंने पत्नी से कहा, "चलो, थोड़ी देर बैठ आते हैं।"
"मेरे सिर में चक्कर सा आ रहा है, आप अकेले हो आओ।" उसने कहा और धम्म से बिस्तर पर लेट कर चादर से मुंह ढक लिया।

कोई चारा न देख मैं अकेला ही उनके घर पहुंच गया।

गुरुजी ने प्रवचन शुरू किया, "देवियों और सज्जनों, पृथ्वी पर लाखों करोड़ों योनियों में भटकने के बाद अंत में बड़े भाग्य से मानव योनि में जन्म लेने का सौभाग्य प्राप्त होता है। इसलिए सभी प्राणियों में मानव श्रेष्ठ है।"

सुनकर बहुत अच्छा लगा। अपने ऊपर मानव होने का गर्व महसूस हुआ और प्रवचन सुनकर प्रसन्नता पूर्वक घर आ गया।

घर आकर देखा तो पत्नी अपनी किसी सहेली से फ़ोन पर बात कर रही थी और ज़ोर ज़ोर से हंस रही थी। 

"कितनी मूर्ख है। आज प्रवचन सुन लेती तो इसको भी ज्ञान हो जाता कि वो भी 'मानव श्रेष्ठ' है। चक्कर जैसे बहाने बना कर कुछ नहीं होने वाला।" मैंने अपने दिल में कहा। सीधे उसे कहना मतलब बर्रे के छत्ते में हाथ डालना था !

सुबह अगले दिन...
"सुनो, रात वो चूहा फंस गया, जाओ उसे बाहर छोड़ आओ।" पत्नी ने सुबह सुबह ही फ़रमान सुनाया।
और मैं पिंजरे को लेकर बाहर की तरफ़ चलने लगा तो पीछे से पत्नी की कर्कश आवाज़ सुनाई दी, "देखो, इसे कहीं दूर छोड़ कर आना। नज़दीक से तो फिर आ जायेगा।"
मैं कुछ नहीं बोला और सड़क के पार झाड़ियों की तरफ़ चलने लगा। अभी मैं चल ही रहा था मैंने देखा कि एक कौवा मेरे सिर के ऊपर से उड़ा और कांव कांव करने लगा। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, क़रीब दस बारह कौवे पेड़ों से उड़े और मुझे चारों ओर से घेर लिया। अब मैं समझ गया था। उनका स्वादिष्ट भोजन मेरे पिंजरे में बंद था। और वो चाहते थे कि झाड़ियों में छोड़ने की बजाय मैं उसे वहीं छोड़ दूं क्योंकि एक बार झाड़ियों में घुस गया तो फिर वो उनके हाथ नहीं लगेगा। मैंने एक नज़र चूहे की तरफ़ डाली। बहुत प्यारा सा छोटा सा चूहा था। उसे आभास हो गया था कि मौत उसके ऊपर मंडरा रही है। उसकी आंखों में मौत का ख़ौफ स्पष्ट नज़र आ रहा था। हांलांकि पिंजरे में वो सुरक्षित था लेकिन फिर भी बहुत घबराया हुआ था और बदहवास इधर उधर भाग रहा था। मुझे उस पर दया आई और मैंने निर्णय लिया कि मैं उसकी जान बचाने की पूरी कोशिश करूंगा और झाड़ियों में ही छोड़कर दम लूंगा। मैं 'मानव श्रेष्ठ' हूं, ये कौवे हैं मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। और मैंने झाड़ियों की तरफ़ चलना जारी रखा। कौवे मेरे मनोभाव पढ़ चुके थे। चार पांच ठीक मेरे सिर पर मंडराने लगे। चार पांच मेरे साथ साथ सड़क पर मेरी तरफ़ कठोर दृष्टि से देखते हुए चलने लगे और दो तीन मेरे उस हाथ पर अपनी चोंच मारने लगे जिससे मैंने चूहेदान पकड़ रखा था। उनके इस आक्रमण से मैं बहुत घबरा गया था और मैंने सोचा कि यदि मैंने उनका शिकार उनके हवाले न किया तो वो मुझे भी लहुलुहान कर देंगे। और मैंने वहीं पिंजरा खोल दिया।

पिंजरा खोलते ही चूहा सहमा हुआ बाहर आया और इससे पहले कि वो इधर उधर भागे, एक कौवे ने बड़ी द्रुत गति और दक्षता से उसकी पूंछ अपनी चोंच में पकड़ी और आसमान में ऐसे तेज़ उड़ा जैसे उसे कोई ख़जाना मिल गया हो। बाकी सब कौवे उसके पीछे ऐसे उड़े जैसे कह रहे हों - देखते हैं बेटा, अकेले कैसे खायेगा!
मैंने अपनी जान बचाने के लिए उस मासूम चूहे की बलि दे दी थी। 

"क्या हुआ? तुम तो मानव श्रेष्ठ हो, और कौवों से डर गये?" मेरे अंदर से किसी ने पूछा।
कोई उत्तर मैं न दे सका और चुपचाप भारी कदमों से ख़ाली पिंजरा हाथ में लिए घर आ गया। लौटते समय मैं सोच रहा था कि अगर वो गुरुजी अब मिल जाएं तो उनका सर फोड़ दूं।

"दूर छोड़ दिया ना, जैसे मैंने कहा था?" घर में घुसते ही पत्नी ने दहाड़ कर पूछा। 
मैं चुप रहा। उसनेे फिर से चीखा, "क्या हुआ? ये मुंह क्यों लटका रखा है?"
"कुछ नहीं। थोड़ा चक्कर सा आ रहा है।" और मैं चादर लपेट कर बिस्तर पर लेट गया।
"कोई काम बताओ तो इनकी नानी मर जाती है।" और बड़बड़ाते हुए पत्नी किचन में घुस गई।
*****
राजीव पुंडीर
17 April 2018



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