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@dawriter

महिलाओं का पहनावा

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आज घर में पूजा थी, वंदना ने सूट पहना हुआ था हालांकि वह जानती थी कि उसे इस मौके पर केवल साड़ी पहनने की ही अनुमति मिलेगी लेकिन इस समय उसकी गर्भावस्था का नवा महीना चल रहा था इसी कारण से साड़ी पहनने में काफी तकलीफ हो रही थी। सूट उसे पहनने में काफी सुविधा थी जिसमे उसका पेट भी उसे सुरक्षित ढंका हुआ सा महसूस होता था। लेकिन यह क्या जैसे ही उसने कमरे के बाहर कदम रखा, सासु मां ने तुरंत चिल्लाना शुरु किया ...... अरे ..... वंदना..... ! आज तो कम से कम साड़ी पहन लेती तुम नहीं जानती आज घर में पूजा है और साड़ी ही हमारा पारंपरिक परिधान है, लेकिन नहीं आजकल के बच्चे सुनते कहाँ है? किसी की।.

वंदना ने समझाने की कोशिश भी की कि उसे समझ नहीं आता कि साड़ी ऊपर बांधे या नीचे ऊपर बांधने से उसका दम सा घुटने लगता है, और नीचे बांधने से उसे लगता है कि उसमे उलझ कर गिर जाएगी। अरे ऐसे कैसे गिर जाएगी, देख कर चलो ये आज कल की बहुएँ भी न एक हम थे साड़ी में ही हमने सारी जिंदगी निकाल दी, क्या हमारा ये समय नहीं आया, आया था लेकिन फिर भी हमने अपनी मर्यादा में रहकर सिर्फ और सिर्फ साड़ी ही पहनी। पर तुम लोगों को सूट पहनने की आज़ादी क्या दे दी तुमने तो सर पर ही पैर कर लिए कि अब तुम्हे ये भी नही दिखता कि घर में 4 लोग इकठ्ठा होंगे तो कम से कम उनके सामने तो साड़ी पहन लें, लेकिन नही।

उनकी यही बात सुनने के डर से वंदना काफी देर तक इसी कशमकश में थी कि वह सूट में बाहर कैसे जाएं पर जिस समय वह तैयार हो रही थी कमरे में साक्षी दीदी आई जो कि राजीव की बुआ की बेटी थी और वंदना को अच्छे से समझती थी उन्हीं ने वंदना से सूट पहनने को कहा था। साथ ही यह भरोसा भी दिलाया था कि वह मामी जी को इसके लिए मना लेंगे और अगर उन्होंने इसके लिए वंदना को दोषी ठहराया तो पहले वह उनके सवालों जवाब देंगी।

बस जैसे ही सासु मां ने बोलना शुरु किया साक्षी दीदी झट से वहां पहुंच गई और उन्होंने मम्मी जी से पूछा यह बताइए मामी जी साड़ी हमारा पारंपरिक परिधान है पर केवल औरतों के लिए क्यों ????? पुरुषों के लिए पारंपरिक परिधान क्या है ..... ??? धोती और कुर्ता ना. तो क्या उन्हें भी घर की पूजा में उसे नहीं पहनना चाहिए या फिर यह नियम केवल औरतों के लिए लागू है पूजा तो दोनों ही कर रहे हैं साथ-साथ फल भी दोनों को ही मिलेगा फिर यह भेदभाव क्यों .....????

अगर इतने रुढ़िवादी नहीं है तो हमें केवल अपने कपड़ों के तरीके का ध्यान रखना चाहिए ना केवल इस बात का कि पहना क्या गया है क्योंकि मैंने देखा है कि पुराने समय में औरतें साड़ी तो पहनती थी लेकिन उसमें उनकी 1 फुट कमर खुली रहती थी हालांकि वें सिर पर पल्ला करती थी, और कुछ तो घूंघट भी करती थी और उसी घूँघट से ..... घर के बड़ों से बेहद बदतमीजी से भी पेश आती थी पर क्या उनकी बात को इसीलिए अनदेखा कर देना चाहिए क्योंकि वह साड़ी पहनी होती थी।

क्या सिर्फ कपड़े यह तय करते हैं इंसान कैसा है क्या सिर्फ कपड़ों का या पहनावे का तरीके से होना काफी नहीं ...??? क्या सारे गुण साड़ी हीं पहनी कर आ सकते हैं सूट में ऐसी कौनसी परेशानी है ....??? जबकि उसमें तो आपके शरीर का कोई भी हिस्सा बाहर नहीं दिखता, बशर्ते आपने उसे सही तरीके से पहना है। तो फिर क्यों साड़ी पर ही बात आकर टिक जाती है। उसकी परेशानी नहीं देखी जा सकती आप भी तो एक औरत है आप जानती हैं इस समय उनके लिए साड़ी पहनना कितना मुश्किल हो सकता है, उसे पहनकर ऊपर नीचे जाने में भी परेशानी होगी और अगर उनका उसमें पैर अटक जाता है भगवान ना करे कोई अनहोनी हो जाए .....तो क्या ...???? फिर भी आप साड़ी और सूट को ही दोष देंगे। पारंपरिक परिधान हमारी सुविधानुसार नहीं होनी चाहिए, मैं यह नहीं कहती साड़ी पहनने में कोई बुराई है लेकिन अगर इंसान किसी कपड़ों में सुविधाजनक महसूस ना करें तो उसे दूसरे कपड़े चुनने का भी पूरा अधिकार होना चाहिए और अगर पारंपरिक परिधान की बात है ही तो यह दोनों पर ही लागू की जानी चाहिए न केवल महिलाओं पर।

जब महिलाएं साड़ी पहने तब पुरुषों को धोती और कुर्ता पहना चाहिए तभी तो दोनों बराबर हो पाएंगे, तभी तो हम अपने संस्कारों का मान रख पाएंगे। क्योंकि आप आज कहीं भी देख ले आपको और औरतें साड़ी में तो जरूर मिल जाएंगी, लेकिन आपको कोई पुरुष धोती और कुर्ते में नहीं मिलेगा .... क्यों ...???? क्योंकि! उसमें कंफर्टेबल फील नहीं होता उसे पहनकर वो ऑफिस, या अपनी दुकान पर नही जा सकता, उसे पहनकर स्कूटर और बाइक चलाने में भी परेशानी होगी। अगर कोई चीज कंफर्टेबल नहीं है तो उसे अपने हिसाब से ढाल लेने में क्या बुराई है।

यही चीज पुरुष और स्त्री दोनों पर निर्भर होनी चाहिए ना, इतना सुनने के बाद वंदना की सास को कुछ नही सुझा, और कहने लगी चलो चलो अच्छा ठीक है, जो पहना सो पहना पंडित जी आते ही होंगे मैं जरा सारा सामान देख लूं, कहकर वहां से चली गयी। उधर वंदना भी गर्दन नीची कर मंद-मंद मुस्कुरा रही थी, और साक्षी दीदी उन्होंने तो जैसे आज किला जीत लिया था, अपने कॉलर हिलाती हुई घूमने लगी और घर के सब सदस्य हल्की-हल्की तालियां और सीटियां बजाने लगे।

©नेहा भारद्वाज

 



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