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@dawriter

मनमर्ज़ी

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कभी कभी देखा गया है कि परिवार में सब कुछ अच्छा होते हुए भी कुछ लोग अलग हो जाते है।सब तरह की छूट दी गई हो..फिर भी घुलमिल नहीं पाते है। वे ऐसे हरसंभव प्रयास करते है कि उन्हें अलग कर दिया जाए। कुछ सास-ससुर अपनी बहु पर जान छिड़कते हो.पर बहु को नहीं भाता है। उसे तो अलग रहना ही पसंद है।

रजनीश अपने माँ बाप की छोटी संतान था.बड़े ही ढूंढ ढ़ाढ कर उसकी माँ ने ऐसी लड़की लाई थी कि जो स्वयं ही नौकरी न करना चाहती हो.बस परिवार के साथ रहे। ऐसा वे कामकाज के लिए नहीं वरन् उन्हें तो सबका साथ रहना पसंद था, इसलिए चाहती थी।

उन्होंने घर के भोजन व्यवस्था को छोड़कर सब काम के लिए सहायक लगा रहे थे क्योंकि ज्यादातर वे ही खाना बनाना पसंद करती थी..बहू आने के बाद भी रौब नहीं झाड़ती कि चलो तुम ही खाना बनाओं।बड़े बेटे बहू भी साथ ही रहते थे। चूंकि बड़े भाई की शादी को सात आठ साल हो गए थे..तो भाभी देवर भी काफी घुलमिल गए थे। उन्होंने अपने देवर को किशोर से व्यस्क होते देखा था..वे दोस्त की तरह व्यवहार करते थे।

इधर छोटी बहू को कुछ ना भाता..घूमने फिरने हर तरह की छूट के बाद भी वह अलग होने का ही सोचती रहती..इसी बीच वह गर्भवती हो गई.. थोड़े दिन शांत रही..क्योंकि उसे मदद की जरूरत थी।काम न के बराबर करती..

एक दिन ऐसे ही बगीचे में टहल रही थी तो उसने देखा कि भाभीजी उसके पति को हल्का सा तमाचा लगाते हुए किसी बात पर झिड़क रही थी..सहसा उसके मन में कुछ कौंधा।उसका सातवां महीना चल रहा था..उसने सोचा यही सही मौका है।

धीरे से उसने एक दिन अपनी सासु मां को कहा..कि वह गर्भवती है..तो भाभी देवर पर डोरे डाल रही है..एक फोटो भी दिखाया.. जो गलत एंगल से लिया गया था। सास को बड़ा ही झटका लगा..पर वे ना मानी।

इस दिन के बाद से हरदिन वह नया प्रपंच करती..जब भी देवर भाभी बातें करते..उन्होंने आपस में बातें करना भी छोड़ दिया.. पर वह रूठी रहती..कहती मैं इन दोनों को साथ नहीं देख सकती..या मुझे मायके भेज दो.

उसका पति उसे बहुत चाहता था..इधर बच्चा भी होने वाला था..खैर किसी तरह डिलीवरी निपटी..थोड़े दिन मायके भेजकर मां ने अपने बेटे को समझाया कि हमारे पीछे खुद का परिवार ना छोड़े..अपनो पत्नी को लेकर अलग हो जाए और अपने बच्चे का भी ध्यान रखे।

परिवार की सुख-शांति के लिए माता-पिता ने अपनी इच्छाओं की तिलांजलि दे दी.और बेटे को दूसरे शहर भेज दिया। छोटी बहू देवर और भाभी को बातें करते हुए भी देखती तो इल्जाम लगाने लगती। जब भी इच्छा होती थी,वह मां दूसरे शहर जाकर अपने बेटे से मिल आती थी।अपने दिल में पूरे परिवार के एक साथ रहते देखने की इच्छा अधूरी ही रह गई। रजनीश भी नये स्थान पर जाकर, नये सिरे से शुरुआत करना पड़ी।

ऐसे ही अधूरे सपने लिए,कुछ दिनों बाद माँ की मृत्यु हो गई। अगर किसी महिला को संयुक्त परिवार में रहने में समस्या हो तो पहले ही बता देना चाहिए। इस तरह के झूठे प्रंपंचो से क्या हासिल होता है। कितने ही लोग आहत होते है। जीवनसाथी भी दुविधा में पड़ जाते है। ये सरासर अनुचित बात है।

अपनी व्यक्तिगत रुचि की बात पहले ही कह देना चाहिए।

कविता नागर



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