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@dawriter

बरगद

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aparajita by  
Aparajita

वर्षों से वीरान जंगल में अकेले जीवन काट रहे, उदास बड़े बरगद को मानो नवजीवन प्राप्त हो गया, जब उसने अपने बीज से अंकुरित उन तीन नन्हे पौधों की कोपलों को जमीन से निकलते देखा था. अपने शरीर पर वक्त के तमाम निशानों को भूल कर वह दिल-ओ-जान से उन पौधों का पालन-पोषण करने लगा. प्रकृति के हर कोप के लिए वह एक अभेद्य कवच बना रहता था, संभव ही नहीं था कि कोई भी आंधी तूफ़ान उन पौधों की एक पत्ती भी तोड़ पाता.

बरगद के इस स्नेहल संरक्षण में बरगद-परिवार प्रसन्नता एवं सौहार्द्य के साथ वृद्धि कर रहा था.

परन्तु बीते कुछ दिनों से बरगद एक चिंताजनक लक्षण देख रहा था अपने परिवार में, उसके बच्चों की वृद्धि रुक गयी थी. उनकी उदासी पत्तियों के पीलेपन में परिलक्षित हो रही थी. कारण बरगद की समझ में नहीं आ रहा था.

पौधों से पूछने पर ज्ञात हुआ कि वे अब उसके संरक्षण से बाहर निकलना चाहते थे, उन्हें अपने हिस्से की धूप चाहिए थी.

बरगद के लिए ये एक झटके जैसा था. वह सोच भी नहीं सकता था कि उसके बच्चे, उसका अपना अंश, उसके सुरक्षित कवच से बाहर निकलना चाहेंगे. उसने विरोध किया इसका, बच्चो को बाहर की दुनिया तमाम जटिलताओं के बारे में बताया. उसने बताया कि कैसे वक्त की धूप उन्हें जला सकती है और कैसे परिस्थितिओं की आंधी उन्हें उखाड़ सकती है.

उसके इस विरोध का तीनों पौधों पर अलग असर हुआ.

पहले वाले ने जहाँ उस बड़े बरगद की सारी चेतावनियों की अवहेलना करते हुए स्वयं की जड़ों को उस बड़े बरगद की जड़ों से अलग कर लिया था. वहीँ सबसे छोटे तीसरे पौधे ने बाहर की दुनिया से डरते हुए बड़े बरगद के ही संरक्षण में रहने का फैसला लिया था. अब तो वो और भी निकट हो गया था बड़े बरगद के, ताकि किसी भी विपरीत परिस्थिति में उन्हें पकड़ सके.

दूसरे पौधे ने अलग ही हल निकाला था इस समस्या का.

उसने बड़े बरगद की जड़ों से अपनी जड़ों का सम्बन्ध बनाये रखा, लेकिन साथ ही अपने तने को बड़े बरगद की छत्रछाया से बाहर निकाल लिया.

वक्त के व्यतीत होने के साथ ही तीनो ने अपनी परिस्थिति के अनुसार वृद्धि भी की. पहला वाला जहां बहुत ही जल्दी आकाश से बातें करने लगा था वहीं तीसरा पौधा अभी भी बड़े बरगद के कंधे तक ही पहुंच पाया था. दूसरा मध्यम गति से वृद्धि कर रहा था.

बरगद अब ‘बड़ा’ से ‘बूढ़ा’ हो चुका था. विभिन्न ऋतुओं की विपरीत परिस्थितिओं से संघर्षशक्ति अब मंद हो चली थी.

ऐसे में एक दिन बहुत जोर से आंधी तूफ़ान आ गया. बूढ़ा पेड़ बहुत देर तक उसमे टिका नहीं रह पाया, जड़ें उसकी जमीन में बहुत गहरी थी इसलिए वो उखड़ा तो नहीं, पर हाँ अपनी डगालों को नहीं बचा पाया. वो घना बरगद का पेड़ आज कुछ टहनिओं का ढांचा हो चुका था.

आंधी तूफ़ान गुजरने के बाद जब सब शांत हुआ तो बरगद ने खुद को सँभालते हुए अपने बच्चों की खोज खबर लेनी शुरू की. उसकी नजर में सबसे पहले दूसरा पेड़ आया जो क्लांत तो था परन्तु अस्तित्वमान था अपने स्थान पर. यही नहीं कुछ और जीवों को भी अपने नीचे संरक्षण देने में वह सफल रहा था.

उसे देख कर बूढ़े बरगद को थोड़ा धैर्य मिला.

अब वह तीसरे पेड़ को खोज रहा था. बहुत जोर लगाने पर उसे ज्ञात हुआ कि तीसरा पेड़ बुरी तरह से झिझोड़ा जा चुका था, एक भी पत्ती शेष नहीं थी उसकी, बड़े बरगद की जड़ को उसने कस के पकड़ा हुआ था, इसलिए उम्मीद शेष थी, परन्तु यह तय था कि यदि वह जिन्दा बचा तो उसे शून्य से ही आरम्भ करना होगा.

बहुत प्रयास करने पर भी बरगद को पहला पेड़ नहीं दिखाई पड़ रहा था. हाँ, उसकी जड़ों के स्थान पर एक बड़ा सा गड्ढा था, जो उसके अंत का प्रमाण दे रहा था.



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