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@dawriter

पालक का पकोड़ा

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सर्दी अपने चरम पर है और मेरी मांग भी....!! क्या करूँ...? मैं हूँ ही इतना लचीला...! नाम है मेरा पालक ! इतना गुणी....चाहे तो पनीर के साथ मिल जाऊं...स्वादिष्ट पालक पनीर बन जाऊं ! चने और सरसों के साग में भी , बिना किसी झिझक के मिल जाता हूँ , जहां मेरा कोई वजूद भी नही है पर बड़ों का सम्मान मेरे संस्कारों में है ! बस एक ही रूप है मेरा , जो मुझे बहुत परेशान करता है...जब भी मुझे कोई काटछांट कर बेसन के घोल में डुबाता है और तेल में तलता है न , उस वक़्त मैं अपनी असली पहचान भूल जाता हूँ । चलो ! कल फिर सुबह जल्दी उठना है आज तो टोकरी में अपने परिवार गाजर , मूली , शलगम (साथ ही कुछ बुजुर्ग भी , जिनका नाम भी मैं जुबान पर नही ला सकता) सबके बीच सो जाता हूँ , कल वैसे भी मेरे साथ फिर से वही होगा जो सालों से होता आया है !!शुभरात्रि !!
मैं पालक ! आज सुबह से ही बहुत उत्साहित हूँ , सुबह ही हलवाई के द्वारा ठंडे पानी में डुबकी लगवा दिया गया हूँ । हालांकि ! अभी भी मेरी जड़ों से सर्दी का पानी टपक रहा है.. फिर भी बहुत खुश हूं , शादी में मेरे पकोड़े जो तले जाने वाले है । लेकिन ये उत्साह अभी थोड़ी देर मेरे अकड़े हुए रूप में रहेगा । जिसके कारण लोग मुझे गर्म गर्म खा भी नही पाएंगें... बच्चे और नौजवान एक बार को खा भी लें ! पर बेचारे बूढ़े इतनी अकड़ को सहन करना उनके लिए मुश्किल होता है । उस समय मेरा स्थान हथियाने ये आलू , ब्रेड, गोभी और पनीर के पकोड़े आ जाते है... पनीर की तो बात ऐसी कि.. इसे तो बच्चे , बूढ़े , किसी को भी खिला दो , बस नाम ही काफी है । आलू के पकोड़े , तो पूरी बरसात में लोग हर दूसरे दिन खाते ही है..सर्वसुलभ जो है । ब्रेड जब तक है... तब तक पकोड़े है , पैकेट खत्म...पकोड़े खत्म ! और गोभी के पकोड़े में दिलचस्पी लोग तभी ले पाते है जब या तो पनीर की उपलब्धता कम हो या फिर उसे सही से बनाया गया हो..अरे ! मेरा मतलब... आधा पका और आधा कच्चा न हो ।
और ये लीजिये... मैं भी एक ट्रे में डाल दिया गया, जितना कहा था..उतना ही अकड़ कर रहता हूँ , आखिर सबसे पुश्तैनी जो हूँ... ये कल के आये... गोभी , ब्रेड और पनीर के पकोड़े ! क्या जाने...? मैं कितने ही शादी , ब्याह की शान हुआ करता था । तब तो लोग , ये पनीर , ब्रेड को जानते भी नही थे , पकोड़ो में इनका इस्तेमाल तो छोड़ो ! हाँ...गोभी की बात अलग है , उसका प्रयास भी प्रशंसनीय है , एक सब्जी होकर पकोड़े के रूप में ढल जाना कोई आसान काम तो नही ! कड़े संघर्ष की आवश्यकता होती है । अब हर कोई आलू भी तो नही हो सकता न , जिससे जो मर्ज़ी बना लो ! चिप्स ,सब्जी , परांठे , पूरी , और भी न जाने क्या क्या...? जहां कोई नही वहां तो आलू होता ही है । इन्ही बातों बातों में...ये लीजिये लोगो का आना भी शुरू हो ही गया... पर ये क्या...? मुझे तो कोई छू भी नही रहा...! ये आयी हैं... शायद ! ये मुझे लें... " कैसे पालक के पकोड़े है..! इतने सख्त..! दांत भी हाथ मे आ जायेंगे " कहकर ये मोहतरमा तो चली गयी और मैं फिर भी वहीं घण्टो किसी के इंतज़ार में ! कोई तो होगा...? जो मुझे भी अपनी प्लेट की शान बनाना चाहेगा ! लोग आये और मुझे छू कर चले भी गये , साथ ही मेरे सिर सख्त होने का इल्जाम भी मंढ गये । शादी का कार्यक्रम कब खत्म हुआ...मुझे तो पता ही न चला , मैं तो बस राह ताकता रह गया कब कोई आये और मुझे खाये ! कुछ पकोड़े जिन्होंने अपनी अकड़ के साथ समझौता कर खुद को नरम कर लिया वो चले गए ,बाकी रह गए है... मेरे ही जैसे , मेरे कुछ भाई बन्धु और उनके नन्हे नन्हे अंश ! जिन्हें सख्त और कूड़ा कहकर सम्बोधित करते है...न , वो हमारे ही नन्हे बच्चे है.. जो पकोड़े बनते समय हलवाई के हाथ से...एक पकोड़े के बाद छूटे हुए घोल से जन्मे है... सफर तो उन्होंने भी पूरा ही तय किया..न , अब उन्हें बनाना नही था फिर भी बन गए , ये गलती उनकी भी तो नही ! इसका अगर दोष देना ही है... तो हलवाई को दीजिये ! क्यो...? उन्होंने अपने हाथ पकोड़े बनने के बाद भी कढ़ाई पर से नही हटाये ! क्यों...? उन्होंने उन बेसन से सने हाथों को अगले बड़े पकोड़े में नही मिला लिया । क्यों ट्रे में से छांटते वक़्त जब हमारे ही कुछ हिस्से टूटकर गिरे उन्हें समय रहते नही समेट लिया गया ! खैर दोष देना बहुत आसान है...मुश्किल है...तो अपनी गलती मानना ! जैसे मैं पालक का पकोड़ा खुद अपने पूरे होशो हवास में ये स्वीकार करता हूँ , "अपनी अकड़ मैंने ढीली नही की... ये मेरा दोष है , जिसका सिला मैं भुगत रहा हूँ "।
ओह्ह !! आज ये कुछ जाना पहचाना सा स्पर्श मालूम हुआ , ये तो घर की बीबीजी है...चलो दो दिन बाद ही सही इन्हें मेरी याद तो आयी । लेकिन ये क्या...? इन्होंने तो मुझे एक थैली में भरकर सक्कू बाई को ये कहते हुए दे दिया..." ले... सक्कू बाई ! इन्हें तेरे घर में कोई खा लेगा " । अब क्या कहूं...? सच मे सक्कू बाई अब तो ले जा... ले जा... मुझे यहां से ! मुझे ले जाकर चाहे कहीं भी डाल दे ! थक गया हूँ...दो दिन से , एक ट्रे से दूसरी ट्रे , क्रोकरी की ट्रे वापस करनी थी तो बड़े से टोकरे में...जहां सर्द हवा के थपेड़ों से मैं चिकना , ठंडा और लिसलिसा सा हो गया । फिर जगह बचाने के चक्कर में बड़े टोकरे से छोटे में... ओह्ह !! इतनी यात्राएं... चल सक्कू बाई !! जहां ईश्वर ले जाये ... पालक के पकोड़े का जीवन ही भ्रम है...! अब तेरे साथ मेरे जीवन की ये आखिरी यात्रा शुभ हो ! अब यही मेरी आखिरी इच्छा है ।।
©नेहाभारद्वाज



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