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@dawriter

नालायक बेटा !!

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नालायक बेटा !! जैसे ही कोई इस नाम से राकेश को बुलाता रमा जी का माथा झन्न झन्न करने लगता। पूरा गांव उसे इसी नाम से ही तो जानता है। लेकिन राकेश को ये बिल्कुल भी बुरा नहीं लगता। क्योंकि उसे नालायक बने रहना, लायक बनने से कहीं ज्यादा बेहतर लगता है, लेकिन रमा जी !! कहीं न कहीं वो खुद को इन सबका जिम्मेदार मानती थी, और शायद थी भी.

क्योंकि ..... राकेश, उनका बड़ा बेटा था जब वो एक सवा साल का था तभी रमा जी को एक और बेटा हुआ। जिसके कारण वो अपने बड़े बेटे पर ध्यान ही नहीं दे पाई, कि कब वो autism (आत्मविमोह या स्वलीनता ) जैसी बीमारी का शिकार हो गया। उनका बस सारा दिन बच्चों के खाने पीने सुलाने और घर के कामों में ही निकल जाता। शुरू से ही घर मे कोई सदस्य नहीं था, न सास ससुर, न नन्द देवर, बस कहने के नाम पर एक बूढ़ी मौसी थी जिनके बिनाह पर उनका रिश्ता हुआ था। लेकिन मौसी भी दूसरे गांव में रहती थी कभी कभार आ जाया करती थी इसीलिए रमा जी को पता ही नहीं था कि कितने साल में बच्चे का कितना विकास होना चाहिए।

एक दिन जब राकेश लंगभग 3 साल का हो गया था तो विकास, छोटा बेटा ! जो सिर्फ अभी सवा साल का ही था काफी चंचल सा, जल्दी जल्दी भागने दौडने लगा, खूब बातें बनाने लगा, उन्हें लगा हर बच्चा अलग होता है, कोई सब काम जल्दी जल्दी सीख जाता है, तो कोई बच्चा उसी काम को काफी समय लगा कर करता है। उन्हें गहरा धक्का तब लगा, जब विकास लगभग ढाई साल का था और राकेश चार साल का होने को आया और वो उसका दाखिला कराने पास ही के स्कूल ले गयी..... वहां प्रधानाचार्या जी ने जो भी पूछा, न तो राकेश उनकी बात ठीक से समझ ही पाया, न ही उसने उन्हें कोई खास प्रतिक्रिया दी। इसी वजह से प्रधानाचार्या जी ने राकेश का दाखिला करने से इनकार कर दिया और उसे किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाने की सलाह दी, लेकिन गांव में कहाँ इतने पढ़े लिखे डॉक्टर थे, ज्यादा से ज्यादा वैध जी से दवाई ले ली, बस।

उन्होंने उसे घर पर भी थोड़ा थोड़ा पढ़ाना शुरु किया, पर सब व्यर्थ !!! हारकर उन्होंने अगले साल विकास का दाखिला तो स्कूल में कर दिया लेकिन राकेश को घर पर ही पढ़ाने की कोशिश करती रही, जो भी विकास स्कूल से पढ़कर आता और जो उसे काम मिलता वही सब उन्होंने राकेश को भी घर में पढ़ाना शुरू किया, थोड़ा बहुत उसे पढ़ाने में कामयाब भी रही। पर फिर भी उसका दाखिला किसी भी स्कूल में कराने में नाकाम रही। एक दिन बहुत उम्मीदें, और अपनी जमापूंजी लेकर दोनो माता पिता उसे शहर में बड़े डॉक्टर दिखाने गए लेकिन वहां उस समय पर इस बीमारी का इलाज भी सम्भव नहीं था, इसीलिए डॉक्टर ने इसे लाइलाज बीमारी का नाम दे दिया ।

रमा जी और उनके पति बुझे मन से गांव वापस आ गए। अब दोनो भाई धीरे धीरे बड़े हो रहे थे, जहां विकास पढ़ाई में काफी होशियार था, वहीं राकेश अंदर ही अंदर कुढ़ने लगा, और कहीं न कहीं उसके अंदर ईर्ष्या भाव पैदा हो गया। रमा जी ये सब देख रही थी, साथ ही अपने बेटे के अंदर आये बदलावों को भी महसूस कर रही थी, इसी के चलते दोनो ने निर्णय लिया कि उसे उसके बापू के साथ खेती के काम मे लगा देंगे। जहां एक तरफ उसका दिमाग भी उसी में लगा रहेगा और दूसरी तरफ उसके अंदर से भाई के लिए भी थोड़ी ईर्ष्या कम होगी।

कुछ ही सालों बाद, विकास जहां बारहवीं क्लास पूरी कर चुका था और अब उसे आगे बीएससी करने के लिए गांव में कॉलेज न होने के कारण, गांव से बाहर जाना था वहीं राकेश अभी भी छठी क्लास के बच्चे जितना ही था। इसी तरह समय बीतता जा रहा था विकास ने अब एमएससी भी कर ली और उसके बाद एक फार्मा कम्पनी में नौकरी करनी शुरू कर दी थी और अब उसकी शादी की उम्र हो चली थी, उम्र तो राकेश की भी हो गयी थी लेकिन उसे कौन अपनी बेटी देने को तैयार होता .....??? कई जगह बात भी चलाई गई, लेकिन राकेश से मिलने के बाद कोई भी दोबारा आया ही नहीं। इसीलिए रमा जी और उनके पति ने तय किया कि वो विकास का घर तो बसा ही दे, राकेश की बीमारी की सजा विकास को देना भी सही नहीं था। इसीलिए एक अच्छी सी लड़की देखकर विकास की शादी कर दी गयी.

कुछ ही महीनों तक गांव में रहने के बाद विकास अपनी पत्नी को अपने साथ शहर ले गया, एक दिन अचानक राकेश के पिताजी की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गयी और पूरा घर बिखर गया, विकास आया संस्कार और तेरहवीं की विधि सम्पन्न करके विकास वापस शहर चला गया, कुछ महीनों बाद गांव जाता, माँ से मिलता और वापस आ जाता। रमा जी हर बार इसी उम्मीद में रहती .... कि एक दिन तो विकास कहेगा, कि माँ अब आप दोनों भी मेरे साथ चलो सब एक साथ वहीं रहेंगे, पर ये सब बातें उनके मन की मन में ही रह गयी। इस बार विकास पिताजी की बरसी पर घर आया लेकिन अगले दिन ही जाने की तैयारी करने लगा अपनी पत्नी को भी वो गांव कम ही लाता, रमा जी को लगा इस बार तो हम सब शायद साथ ही जायेंगे पर विकास बिना कुछ कहे अपना सामान बांधकर जल्दी मिलने आने का वादा करके चला गया.

रमा जी समझ चुकी थी कि उनका बेटा कुछ ज्यादा ही लायक हो गया, उनके पास रह गया, एक नालायक बेटा ! जो उनके लिए लायक था, जिसे परवाह थी उनकी ! दिन रात, अब बस दोनों साथ रहते, खेती से इतना तो मिल ही जाता था कि दोनों अपना पेट भर सके, और हिसाब किताब की जिम्मेदारी रमा जी खुद उठाती थी। कभी-कभी उनकी तबियत काफी खराब भी रहने लगी थी, उस समय भी वे पूरी कोशिश करती थी कि राकेश पर बोझ न बने, कभी कभी सोचती कि मेरे जाने के बाद राकेश का क्या होगा ....?? विकास, ने तो जीते जी ही हम सबसे सारे रिश्ते खत्म कर लिए न माँ की फिक्र न बड़े भाई की ! इसी चिंता में वो रात दिन घुटी जा रही थी, लेकिन उन्हें कोई उपाय नज़र नहीं आ रहा था।

एक दिन स्कूल के एक मास्टर साहब उनके पड़ोस में ही रहने आये, रमा बहन के मन ने कई बार प्रश्न उठा कि उनसे बात करे। फिर एक दिन रमा बहन की तबियत ठीक नहीं थी, शाम के समय पड़ोस में रहने वाले मास्टर जी अपनी पत्नी के साथ उनका हाल चाल जानने आये। जाते जाते कहने लगे, अच्छा ! रमा बहन, अब चलते हैं कोई काम हो तो बताइयेगा, रमा जी पहले तो झिझक के मारे कुछ बोल ही नहीं पायी। आखिर में मास्टर जी की पत्नी ने भांप लिया और कहने लगी, आपने राकेश के बारे में क्या सोचा है, बहन जी ! अभी तो जैसे तैसे उसकी देख भाल कर रही हैं। लेकिन, रमा जी ने उन्हें बीच में ही रोकते हुए कहा, " यही तो चिंता मुझे रात दिन खाये जा रही है, कि मेरे जाने के बाद इसका क्या होगा, घर का काम तो थोड़ा बहुत सीख गया है, थोड़ा और करते करते सीख जाएगा। लेकिन कमाएगा कैसे ....??? औऱ कमा भी लिया तो उसे जोड़ेगा, हिसाब कैसे रखेगा " .....???

तभी मास्टर जी बोल पड़े, अगर आपको संकोच न हो तो आप कुछ दिन शाम के समय राकेश को घर भेज दिया कीजिये। मैं कोशिश करूंगा कि उसे कुछ आसान तरीके से समझा सकूं, देखता हूँ अगर मुझसे कुछ हो पाया तो, अच्छा, अब चलते हैं।

रुकिए !! मास्टर जी, पीछे से टोकने के लिए माफी चाहूंगी। लेकिन आप उसकी फीस भी बता देते, तो..... फीस, वो तो बहुत ज्यादा है, आपका स्वास्थ्य !! और तीनों ही हँस पड़े। कैसी बात करती हैं... रमा बहन ! आपको बहन कहता हूँ, आप ही से फीस लूंगा। बस आप भेज दीजिये, एक दो दिन देखता हूँ कुछ कर पाया तो. आपकी बड़ी मेहरबानी कहकर, रमा जी ने हाथ जोड़ लिए और किसी तरह अपने आँसुओं को रोककर मास्टर जी को विदा किया। कुछ ही दिनों में धीरे धीरे राकेश थोड़ा थोड़ा हिसाब करने लगा, अब रमा जी की तबियत भी सुधरने लगी थी । शायद, अपने नालायक बेटे को थोड़ा लायक बनता देख कर।।

©नेहाभारद्वाज



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