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@dawriter

नई पीढ़ी नये रंग

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नई पीढ़ी नए रंग

हमारे ज़माने और आज के ज़माने में ज़मीन -आसमान का अंतर आ चुका है आज की पीढ़ी के युवा पुरानी बातों को, पुराने विचारों को एक अलग दृष्टि से देखते हैं, किन्तु ऐसा नहीं कहा जा सकता की आज की पीढ़ी पूरी तरह से पथभ्रष्ट हो चुकी है या अपने संस्कारों को भूल चुकी है। आज भी बच्चे बड़ों के चरण स्पर्श करते हैं,आज भी अपनी खुशियों में घर के सदस्यों को शामिल करना चाहते हैं आज भी अपने तीज त्योहार उत्साह से मनाते हैं। पिज़्ज़ा खाते हैं, पर होली पर गुझीया की फरमाइश भी करते हैं। नेट पर कितना भी समय बिताएं, लेकिन दीवाली पर रंगोली भी बनाते हैं और घर की सजावट में योगदान भी देते हैं। लड़कियां भले ही जीन्स या स्कर्ट पहने पर साड़ी या लेहंगा पहनने का मोह भी संवरण नहीं कर पातीं। टैटू बनवाती हैं तो मेहंदी लगाने का मोह नहीं छोड़तीं - तो सोचिये सभ्यता और संस्कृति कहाँ पीछे रही वह तो साथ - साथ गलबहियां डाले घूम रही है।

नए पुराने की जंग आज की बात नहीं है, यह तो पीढ़ियों से चला आ रहा वह अंतर है जिसे कुछ ही लोग पाट पाते हैं, इसी को हम और आप जनरेशन गैप के नाम से जानते हैं। हम सब जानते हैं कि समय अपनी गति से चलता रहता है उसे कोई नहीं रोक पाया और आगे बढ़ने वाला हर दिन अपने साथ कई प्रकार के परिवर्तन लेकर आता है .अब कोई चीज़ हमारे ज़माने की तरह छठे चौमासे नहीं होती। अब तो वह समय है कि दुनिया हर पल बदल रही है। पहले यह पीढ़ियों का अंतर माँ - बेटी अथवा पिता - पुत्र में होता था किन्तु आजकल तो आपने ध्यान दिया होगा कि दो बहनो। या भाइयों के बीच यदि तीन- चार वर्ष का अंतर हो तो भी जनरेशन गैप दिखाई देने लगता है उनकी बातों और विचारों में अंतर आ जाता है. इसका कारण है परिवर्तन की अत्यंत तीव्र गति।

आज के युवा का पहनावा, खान- पान,बोलचाल और सोच बहुत कुछ पश्चिम से प्रेरित है कई बार देखने- सुनने में आता है कि समाज के एक वर्ग विशेष के लोग या पोंगापंथी सोच के लोग उनकी पोशाक पर अभद्र टिप्पणी करते हैं। उनके बातचीत करने के अंदाज़ पर भी उन्हें कुछ न कुछ सुनने को मिल ही जाता है यानि कहीं न कहीं समाज उनकी हर बात का ठेकेदार बन जाता है। अब आप ही सोचिये जीवनशैली कैसी हो यह व्यक्तिगत पसंद पर निर्भर करता है। हम क्या पहने, क्या खाएं, कैसे बात करें, कैसे व्यवहार करें, कहाँ जाएँ, कहाँ न जाएँ, किस से मिलें, कब मिलें, कहाँ मिलें यह हमें कोई और बताएगा! कैसा लगता होगा उन्हें हर कदम पर अपनी आलोचना सुन कर। निश्चय ही बुरा लगता है। यदि माता-पिता उन्हें अच्छा- बुरा समझने के बाद चुनाव उन पर छोड़ दें तो मेरी समझ से अस्सी प्रतिशत बच्चे या युवा समझते भी हैं और मानते भी हैं। अधिक रोक- टोक से वे विद्रोह के स्वर में बात करने लगते हैं और जैसे ठान ही लेते हैं कि जो आप कहेंगे उसका विपरीत ही करेंगे। यदि आप विचार करें तो यह सोच का टकराव पुराने समय से ही चला आ रहा है और शायद अनंत कल तक चलने वाला है, क्योंकि हम अपनी सोच उनपर थोपने का प्रयास करते हैं।

नई पीढ़ी के युवक- युवतियां खुले विचार रखते हैं आजकल लड़के- लड़कियां आपस में दोस्ती करते हैं और हर प्रकार की बातें साझा करते हैं, यह बात हमें और आपको अक्सर हज़म नहीं होती। समझा यही जाता है कि विपरीत लिंग के प्रति जो आकर्षण होता है वह केवल एक ही प्रकार का हो सकता है और एक लड़का तथा एक लड़की कभी सिर्फ दोस्त हो ही नहीं सकते। परंतु ऐसा मैं नहीं मानती आज के परिवेश में कुछ उथली मानसिकता वाले लोग ही ऐसा सोचते हैं।

माता- पिता को अपने बच्चों को सीमाओं से परिचित अवश्य करना चाहिए किन्तु उन पर अति अनुशासन का शिकंजा नहीं कसना चाहिए अन्यथा परिणाम कभी -कभी अच्छे नहीं होते इससे पहले कि हम अपने ही बच्चों को दोष देने लगें सिर्फ इस बात के लिए उन्हें कोसते रहें कि वे नए तौर तरीके अपना रहे हैं ज़रा खुले दिल और दिमाग से उन्हें समझने का प्रयास करना चाहिए। सोचिये क्या हमारे ज़माने में अच्छे अंक लेन या अच्छे पैकेज वाली नौकरी पाने का या फिर समाज की अन्य चुनौतियों का सामना करने का इतना भारी दबाव था? कितने बच्चे होते थे जो नब्बे प्रतिशत या इस से अधिक अंक ला पाते थे ?कितने युवा होते थे जिन्हें दस लाख या इस से भी अधिक का पैकेज मिलता था तनख्वाह का शायद इक्का- दुक्का ही, लेकिन आज प्रतियोगिता के ज़माने में छोटे -छोटे बच्चे भी अपने भविष्य को लेकर चिंतित रहने लगे हैं। ऐसे में उन्हें हर बात पर ख़ुशी मनाने का अधिकार मिलना चाहिए और इसमें माता -पिता को विरोध भी नहीं करना चाहिए . इसका यह अर्थ बिलकुल नहीं है की तनाव की आड़ में उन्हें मनमानी करने के लिए उन्मुक्त छोड़ दिया जाये किन्तु उन्हें छोटी छोटी खुशियां मनाने से वंचित रखना उन्हें भीतर कहीं कुंठाग्रस्त कर सकता है इस प्रकार की छोटी-छोटी खुशियां ही इस तनाव से कुछ पल के लिए निजात दिला सकती हैं उन्हें .फिर क्यों नाहक खुद भी परेशान हों और उनको भी करें।

संस्कार बच्चों को घर से ही प्राप्त होते हैं अपने बच्चों पर भरोसा करना चाहिए। आज भी हम देखते हैं की पश्चिमी लिबास और सभ्यता को अपनाने वाले बच्चे घर के बड़ों का सम्मान करते हैं। भले ही वो वैलेंटाइन डे मनाते हों किन्तु नवरात्रों में व्रत उपवास रखने और पूजा -पाठ करने में भी कसर नहीं छोड़ते। आज का युवा हर बात को सेलिब्रेट करना चाहता है और इस बात पर शायद किसी को कोई ऐतराज़ नहीं होना चाहिए वे अगर प्यार के रिश्ते को वेलेंटाइन डे के रूप में मानते हैं तो मदर्स डे, फादर्स डे भी उसी शिद्दत के साथ मानते दिख जाते हैं. समय के साथ तेज़ी से बदलने वाली यह पीढ़ी आजकल मिलने का ही नहीं, बिछड़ने का भी जश्न मनाना सीख रही है- ‘ मेरे सैयां जी से आज मैंने ब्रेक अप कर लिया ’ - गाना इसी भाव को दर्शाता है और क्यों न हो,जब सामने वाले को आपकी भावनाओं की कोई चिंता न हो और आपसे कोई लगाव न हो तो उसके दुःख में रोते बैठना कहाँ की समझदारी है ! मेरी बात को हल्का न समझें परंतु अब वह ज़माना नहीं रहा जब सब कुछ सह कर भी रिश्तों की लाज बचायी जाती थी अब तो बस नहीं बनती,तो बढ़ो आगे का ज़माना है. मेरी बात को समझने का प्रयास अवश्य करें,कृपया यह सोचने की भूल न करें की मैं किसी प्रकार के अनैतिक या समाज में अनुचित समझे जाने वाले किसी भी प्रकार के गलत व्यवहार की वकालत कर रही हूँ सही - गलत पर नज़र हमेशा बनाये रखें और अपने बच्चों को भटकने न दें। आपका सकारात्मक रवैय्या और थोड़ी सपोर्ट काफी है उनके लिए यकीन जानिए वे आपका विश्वास कभी नहीं तोड़ेंगे।

इतनी तेज़ी से बदलती दुनिया के साथ जो न बदलने कि कसम खाकर बैठ जाते हैं उनका जीवन समस्याओं का घर बन जाता है। आये दिन पिता- पुत्र अथवा माँ-बेटी में रोज़ की झिक- झिक रोज़ के झगडे और कलह का वातावरण घर की सुख -शांति को भंग कर देता है। यही नहीं कभी-कभी अधिक रोक-टोक के कारण बच्चे चोरी -छुपे मनमानी करने से भी नहीं चूकते ऐसी परिस्थिति से बचने के लिए सबसे बढ़िया उपाय यही है कि उनकी बातो। में रूचि लें। उन्हें अपनी बात कहने का अवसर दें और उनके दोस्त बन जाएँ।

हाँ यह आवश्यक है कि हम उन्हें उनकी सीमाओं से परिचित करवाएं और यह ध्यान रखे कि वे गलत राह पर तो नहीं जा रहे। मैं तो अपने बच्चों को देखकर एक बात बड़े ही यकीन के साथ कह सकती हूँ कि जितना ध्यान आजकल के बच्चे अपने माता -पिता का रखते हैं और जितना कुछ वे अपने परिवार के लिए करते हैं वह हम कभी नहीं कर पाए। जी हाँ ! चाह कर भी नहीं कर पाए .मेरी तीन बेटियां हैं और तीनो हम पर जान छिड़कती हैं इतना ध्यान रखती हैं हर बात का कि मेरे पास शब्द ही नहीं हैं कुछ कहने के लिए। बेटे हों या बेटियां सब ही अपने परिवार को ख़ुशी देने का प्रयास करते हैं फिर चाहे वह ख़ुशी आपका जन्मदिन मनाने की हो या आप को कहीं घूमने ले जाने की हो। आपको एक दिन रसोई के काम से छुट्टी देने की हो या फिर आपको एक सुन्दर से कार्ड के माध्यम से अपनी अनकही भावनाओं को व्यक्त करने की हो, आपको गले लगा कर यह कहने की हो, “ चिंता मत करो मां,सब ठीक हो जायेगा।” या फिर ऑफिस से फोन कर के आपसे यह पूछने की हो, “ माँ खाना खाया या नहीं ?”

मैं तो यही कहूँगी कि कभी युवा पीढ़ी को कम न आंकें वे आपसे और हमसे अधिक भावुक और संवेदनशील हैं, कितना भी पश्चिमी कपड़ों, खाने और त्योहारों से प्रभावित क्यों न हों अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा है उन्होंने। आवश्यकता है तो बस अपने को थोड़ा सा उनके अनुसार ढालने की। आज़मा कर देखिये, सच ! आपके बहुत से दुःख,घर में पसरा तनाव और संस्कृति के पीछे छूट जाने की चिंता कहाँ गुम हो जाएगी पता भी न चलेगा।



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