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@dawriter

धारा विरुद्ध

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धारा विरुद्ध

अखबार पढ़ते हुए अचानक कमला ने उसे समेटकर रखा और आवाज लगाई "ए शब्बो..चल ढोलकी उठा, चौधरी के घर चलना है।

"हैं...पर जिज्जी चौधरी के घर तो लड़की हुई है न।" अपने बालों में कंघा फेरती हुई शबनम चौंकते हुए बोली।

"हाँ, मुझे पता है। पर मैं सोच रही थी, कि हम लोगों ने जिस तरह अकारण ही बेटे के जन्म को उत्सव का पर्याय बना दिया है, अब उसे बदलने का वक्त आ गया है।" कमला ने खुद ही खूँटी से टँगी ढोलकी उतारते हुए कहा।

"पर जिज्जी क्या लोग हमें बेटी के जन्म पर बधाई देंगे?" शबनम ने बाल के साथ साथ पहली बात सुलझते ही अगला सवाल किया।

"इस बार हम बधाई लेने नहीं, देने जायेंगे।" कमला ने प्यार से शबनम की ठुड्डी पकड़ते हुए जवाब दिया।

"हाय दइया..बधाई देने जायेगें !! क्या दूसरी टोली वाले हमें ऐसा करने देंगे।" डर से शबनम की आँखों की पुतलियाँ चौड़ी हो गयी।

"क्यों नही करने देंगे? हम कुछ गलत थोड़े ही कर रहे हैं बल्कि हम तो एक सही शुरुआत कर रहे हैं।" कमला ने बेफिक्री से कहा।

और नियत समय पर कमला अपनी टोली के साथ चौधरी जी के घर पहुँच गयी। उसे देखकर चौधरी जी ने पूछा "तो क्या अब लड़की के जन्म पर भी बधाई लोगी?"

कमला ने मुस्कुरा कर साथ आयी मंडली को नाचने गाने के लिए कहा और खुद बहू के कमरे के दरवाजे पर पोती को गोद में लिए खड़ी चौधराइन के पास पहुँच गयी।

ब्लाउज में रखे सौ रूपये निकालकर उसने लड़की के हाथ में रखते हुए चौधरी जी से कहा "घर में लक्ष्मी आयी है चौधरी साब, इस बार बधाई लेने नहीं बल्कि देने आयी हूँ।"

आश्चर्य से भरे चौधरी साहब जब कमला की तरफ देखने लगे तो उसने अपनी नजर चौधरी से हटाकर लड़की के चेहरे पर टिका दी। धन्यवाद स्वरूप लड़की ने अपनी हथेली में नोट फँसाने के लिए डाली कमला की अँगुली को कसकर पकड़ लिया।

"जीती रह मेरी बच्ची।" कमला ने प्यार से अपना दूसरा हाथ बच्ची के सिर पर फेरते हुए कहा और नाच रही मंडली में शामिल हो गयी।



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