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@dawriter

दो बेज़ुबान - चीकू और मैं।

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कुछ दिन पहले अचानक एक सहेली से मिलने का प्रोग्राम बना था, सहेली की एक और सहेली और उसकी बेटी भी मिलने वाले थे…

दोपहर के लगभग 3 बजे मैं घर से निकली थी और अपनी सहेली से मिली वहां से हम दोनों साथ में उसकी सहेली से मिलने गए जो कार में हमारा इंतज़ार कर रही थी… मैं पहली बार मिल रही थी तो थोड़ी असहज थी...हम कार के पास पहुंचे.. मेरी सहेली आगे की सीट की तरफ बढ़ी और मैंने बीच की सीट वाला गेट खोला।।

सीट पर लगभग 5-6 साल की प्यारी सी बच्ची बैठी थी..रंग सफेद..गाल कश्मीरी सेब की तरह लाल..बिलकुल छोटी सी परी लग रही थी..उसे देखते ही मेरी असहजता छूमंतर हो गयी….हम दोनों ने एक दूसरे को
देखकर स्माइल दी और सहेली की सहेली को औपचारिकता का hii बोलकर मैं सीट पर बैठ गयी।।

बैठते ही पीछे की सीट से कूदता हुआ एक खरगोश आ गया...समझने में देर नहीं लगी की ये नन्ही परी का दोस्त है...मैंने पूछा इसका नाम क्या है?

चीकू..परी ने अपनी शहद सी मीठी आवाज़ में जवाब दिया...हम लोग पास के ही पार्क तक जा रहे थे..fm पर आज के समय के रॉक सांग चल रहे थे.. दोनों सहेलियाँ अपनी बातों में लग गयी और मैं परी और चीकू को देख देख कर खुश हो रही थी।।

पर ये ख़ुशी जल्द ही दर्द में बदल गयी।। चीकू की लाल बड़ी बड़ी आँखें चीख चीख कर मुझसे कुछ कह रही थी..चीकू बार बार परी की पकड़ से बचकर इधर उधर भाग रहा था कभी पीछे की सीट पर तो कभी सीट के नीचे लेकिन परी….उसे वापिस पकड़ कर अपने पास बैठा लेती...उसे सहलाती..उसके कान खींचती..जोर से पकड़ती.. और हंसने लगती।। इस पूरे रास्ते एक अजीब सी घुटन और ख़ामोशी मुझे जकड़ रही थी..अब समझ आ रहा था चीकू की आँखें मुझसे आज़ादी मांग रही थी ..वो खरगोश परी का दोस्त कम “खिलौना” ज्यादा लग रहा था..मुझे परी से ज्यादा उस खरगोश से लगाव महसूस हो रहा था...कैसी “इंसान” हूँ मैं..एक इंसानी बच्चे को छोड़कर उस खरगोश के प्रति मेरी संवेदनाये जाग रही थी… रास्ते में कई बार.. चीकू ने मुझ तक आने की नाकाम कोशिशें की पर परी उसपर झपट कर उसे वापिस अपने पास बैठा लेती… मैं दबी जुबान में बस यही कह पाती….परी! जरा आराम से……..।।

हम पार्क पहुँच चुके थे...। परी ने चीकू को कसकर पकड़ा और कार से उतरी..मैं भी पीछे पीछे चल दी..देखा तो चीकू बुरी तरह से काँप रहा था...मैंने परी की मम्मी से पूछा तो उसने बताया शायद डर की वजह से… हाँ हम इंसानो से कौन नहीं डरेगा।।

मेरे अंदर की रूह मुझे लताड़ने में लगी थी..कैसे इंसान हो तुम..एक जीती -जागती रचना को खिलौना बनाकर इस्तेमाल करते हो..मुझे नहीं पता उस खरगोश में ऐसा क्या था...उसकी आँखें क्या कह रही थी...बस मेरा दिल कर रहा था की उसे सीने से चिपका कर उस अपनेपन का एहसास दे पाऊँ जो वो हम “इंसानो” के बीच कभी नहीं पा सकता...मन कर रहा था पूंछू उससे की तुम यहां

कैसे आ गए? तुम्हारा भी तो परिवार होगा ना..तुम्हारे भाई- बहिन, दोस्त, माँ … मन कर रहा मैं छोड़ आऊं उसे उसके अपनों के बीच...मुझे तो ये नहीं समझ आ रहा था की जब हम इंसान अपने परिवार से अलग नहीं रह सकते..तो इन बेजुबां पशु - पक्षियों को क्यों उनके परिवार से अलग कर देते हैं?

मैं इंसान होकर इस इंसानियत से लड़ रही थी...तभी पार्क में बनी छोटी सी बेंच के नीचे जाकर चीकू छिप गया...वो बाहर नहीं आना चाहता था...बिलकुल भी नहीं..पर परी..वो नहीं मानी बेंच के नीचे से खींचकर उस खरगोश को निकाल लिया।।

हम वापिस कार में आकर बैठ गए..परी चीकू को जकड़ कर बैठ गयी और कुछ ही मिनिट में उसकी आँख लग गयी।। मैं दोनों बच्चों को चुपचाप देख रही थी…

मौका पाते ही चीकू फुदक कर मेरे पास आ गया..मैंने धीरे से उसके सर पर हाँथ फेरा और वो किसी छोटे से बच्चे की तरह मेरी गोद में चिपक कर बैठ गया...वो बेज़ुबान था..और मैं “बेजुबान” हो गयी थी...पर हम दोनों एक दूसरे को समझ रहे थे..तभी तो इंसानो से डरने वाला चीकू खुद-ब-खुद मेरे पास आ गया था।।

परी का घर आ गया था...उसकी माँ ने उसे गोद में उठाया और मैंने चीकू को...उसकी माँ ने उसे नर्म बिस्तर पर लिटाया...और मैंने चीकू को लोहे के छोटे से पिंजरे में।।।

मुलाकात खत्म हुई...मैं वापिस घर आ गयी...पर कुछ छूट गया था...चीकू के साथ...।।
मुझे रोज़ चीकू याद आता है..उसकी बड़ी बड़ी लाल आँखें याद आती हैं जो चीख चीख कर मुझसे पूछ रही हैं तुमने मुझे आज़ाद क्यों नहीं कराया??
ऐसा लगता है जैसे चीकू बोल रहा हो...मैं “ खिलौना” नहीं हूँ...जान है मुझमें भी...मुझे तुम इंसानों के बीच अच्छा नहीं लगता...।।

मैं अपनेआप से सवाल कर रही हूँ...क्या हम इंसान अपने बच्चे को किसी का खिलौना बनने दे सकते हैं??..... नहीं।। फिर उस बेज़ुबान को क्यों खिलौना बनाकर अपने बच्चों को पकड़ा देते हैं?

मुझे हमेशा अफ़सोस रहेगा कि मैं चीकू को आज़ादी नहीं दिला पायी… मैं तो कमज़ोर निकली पर आपको कोई चीकू मिले तो उसे आज़ाद कर देना… चीकू खिलौना नहीं है..पढ़कर देखना किसी भी जानवर, पंछी की बड़ी बड़ी आँखों को..उनमे इंसानो से ज्यादा प्यार, दर्द, संवेदनाये झलकती हैं।।

I MISS YOU CHEEKU ...I AM SORRY…

#निधिखरे #खामोश #लफ्ज़ों #का #शोर



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