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@dawriter

तू धूप है छम्म से बिखर

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धरा, बेटा दूध पी लो, ठंडा हो रहा है।। नहीं मम्मा मुझे नहीं पीना दूध, अब आप मुझे रोज रोज दूध दिया भी मत करो। डेयरी प्रोडक्ट से फैट बढ़ता है और अब मैं कोई बच्ची नहीं हूँ जो रोज रोज दूध पियूँ। "

१५ साल की ही तो है मेरी धरा, बच्ची ही तो है। ये कैसी बात कर रही है। आजकल उसके स्वभाव में भी बहुत परिवर्तन आ रहे हैं, अपने दोस्तों में ही खोई रहती है। वसुधा अपनी बेटी धरा के बारे मेंं सोचते-सोचते अपने बचपन मे लौट गई। जब वो 15 साल की थी। अपने 4 भाई बहनों में सबसे छोटी वसुधा। दो दीदियों की शादी हो चुकी थी, वसुधा से बड़े विवेक भैया इंटर में थे और वसुधा दसवीं में पढ़ रही थी। दोनों भाई- बहन पढ़ने में बहुत तेज थे। वसुधा के पिता की अपनी एक छोटी सी दुकान थी, जिससे घर का खर्चा निकल जाता था। बड़ी बेटियों की शादी में काफी खर्च हो गया था जिसके लिए उन्हें उधार लेना पड़ा था। विवेक इंजीनियर बनना चाहता था  उसकी कोचिंग ले रहा था। वसुधा के माँ-पापा अपने बच्चों को एक अच्छी जिंदगी देना चाहते थे।

वसुधा की आंखों में हमेशा एक ही सपना था, कि उसे डॉक्टर बनना है। रामपुर जैसी छोटी जगह में तब एक- दो महिला डॉक्टर ही हुआ करती थीं, उन्हें देख कर वसुधा अपने निश्चय को और मजबूत कर लेती थी। इधर विवेक भी बहुत मेहनत कर रहा था। बारहवीं की परीक्षा में बहुत अच्छे अंक आये थे लेकिन इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा में उसके अंक उतने अच्छे नहीं आये थे, जिसके चलते उसे सरकारी कॉलेज नहीं मिल रहा था। वो एक साल और बाहर जाकर तैयारी करना चाहता था। वसुधा बचपन से बहुत संवेदनशील थी वो जानती थी उसके पिता के लिए अतिरिक्त खर्चे उठाना बहुत मुश्किल है, इसीलिये उसने कभी अपने लिए किसी कोचिंग की मांग नहीं की। वसुधा के पिता ने विवेक को बाहर भेजने के लिए  किसी तरह से रुपयों का इंतजाम किया और विवेक चला गया। वसुधा की माँ की तबियत भी बहुत खराब रहती थी इसलिये उसे घर के काम भी करने पड़ते थे लेकिन पढ़ाई में कोई कमी नहीं होने देती थी वसुधा। एक साल के परिश्रम के बाद विवेक को सरकारी कॉलेज मिल गया। बहुत खुश थे सब, विवेक की मेहनत सफल हो गयी थी और विवेक जीवन के नए सफर पे चला गया। इधर वसुधा भी मेडिकल की तैयारी करने चाहती थी एक दिन उसने माँ को पापा से कहते सुना, " हमारी वसुधा डॉक्टर बनना चाहती है, हमें उसके लिए भी कुछ इंतेजाम करना होगा। यहाँ रह कर तैयारी कैसे होगी। तब पापा ने कहा, मैं पहले से उधार के बोझ तले दबा हुआ हूँ, अब वसुधा को बाहर भेजने का सामर्थ्य नहीं है मुझमे। उसको कह दो इतने बड़े सपने मत देखे जिसे पूरा करने की औकात न हो। "

घण्टों रोती रही थी वसुधा, सब कहते थे वसुधा तेरे अंदर एक आग है, तू जो चाहे वो कर सकती है, तुझे आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता लेकिन आज वसुधा ने परिस्थितियों के आगे हार मान ली थी। इंटर के बाद वसुधा ने ग्रेजुएशन फिर पोस्ट ग्रेजुएशन में प्रवेश ले लिया अब वो फिर से नाम के आगे डॉक्टर लगाने का सपना देखने लगी थी। तभी मधुर का रिश्ता वसुधा के लिए आया, वो शादी नहीं करना चाहती थी पर माँ ने जिद पकड़ ली कि उनकी तबियत ठीक नहीं रहती, अपने रहते वो अपनी वसु को दुल्हन बने देखना चाहती थीं। विवेक की नौकरी लग गयी थी वसुधा के माँ पापा को लगता था कि जब तक विवेक की शादी नहीं होगी तभी तक वो उन लोगों पर पैसे खर्च कर पायेगा तो विवेेेक  से पहले वसुधा की शादी हो जाये।

वसुधा, वसुधा मिश्रा से मिसेज पाठक बन गयी। उसने मधुर से आगे की पढ़ाई के बारे में बात की तो उन्होंने मना कर दिया और फिर एक बार वसुधा ने परिस्थितियों से समझौता कर लिया पर जब धरा पैदा हुई तो उसे लगा उसने एक नया जीवन पा लिया, अपनी धरा के रूप में। वो फिर से उड़ने लगी, फिर से चहकने लगी और उसने फिर से सपने देखना शुरू कर दिया। धरा भी बहुत प्यारी बच्ची थी। एकदम उसी की तरह बहुत मेहनती, बहुत तेज, बहुत संवेदनशील । उसको देख वसुधा के भइया कहते थे, "वसु तुमने धरा को सिर्फ अपना नाम और रूप ही नहीं गुण भी दे दिए हैं, मैं तेरे सपने तो पूरे नहीं कर पाया लेकिन इसको खूब पढ़ाऊंगा"। वसुधा कहती मेरा सपना तो 'धरा' है भइया अब मुझे इसके सपने पूरे करने हैं। वसुधा ने दूसरी सन्तान पैदा न करने का संकल्प ले लिया था वो धरा के सपनो के रास्ते में कोई भी रुकावट नहीं लाना चाहती थी।

लेकिन ये धरा को क्या हो रहा है, पिछले कुछ महीनों से बदल गयी है उसकी धरा। एकलौती संतान होने के चलते वो मधुर की भी लाडली है। इसीलिए वो धरा को कुछ करने से मना नहीं करते थे अगर वसुधा कुछ कहना चाहे तो उसे टोक देते थे और कहते जमाना बहुत बदल गया है वसुधा, तुम उसे अपनी तरह पुरातनपंथी मत बनाओ। धरा दिन प्रति दिन जिद्दी हो रही थी, जिस धरा को किताबों से बाहर कुछ समझ नहीं आता था उसे सिर्फ बाहर घूमने और शॉपिंग करने में ही मन लगता था। इसका असर उसकी बोर्ड की परीक्षा पर भी पड़ा। जो लड़की पूरे स्कूल में टॉप करती थी आज महज 88 प्रतिशत अंकों पर सिमट गई। कुछ दिन तक धरा को बहुत खराब लगा लेकिन फिर वो अपनी दोस्तों में व्यस्त हो गयी। मोबाइल पर घण्टों समय बिताने लगी । वसुधा कुछ कहती तो वो कह देती पढ़ लूँगी मम्मा आप मेरे पीछे मत पड़ा करिये। कपड़े, मेक अप और मोबाइल यही उसकी दुनिया बनते जा रहे थे। बहुत परेशान थी वसुधा, एक बार फिर उसके सारे सपने टूट रहे थे उसके आँसू उसकी तड़प कोई नहीं देख पा रहा था।

एक दिन धरा फोन पर किसी सेे बात कर रही थी, कहीं जाने की बात हो रही थी, वो कह रही थी "अनन्या मैं क्या पहनूँ यार, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है। वो ऋषि तो मेरी तरफ देखता भी नहीं यार तू पहले मेरे घर आकर मेरी ड्रेस फाइनल कर जिससे ऋषि की नजर मुझसे हटे ही ना और सुन आज ऋषि को ड्रिंक करा देते हैं तब शायद उसकी नजर भटके" धरा को नहीं पता था उसकी बातें उसके पीछे खड़ी वसुधा सुन रही है और वसुधा तो अवाक हो गयी थी धरा की बातें सुनकर। वो गुस्से से चीख पड़ी, कौन है ये ऋषि? ये तुम क्या कर रही हो धरा? तुम  खुद को, किसी और को दिखाने के लिए परेशान हो? ये क्या कर रही हो तुम?तुम ड्रिंक भी करती हो? धरा भी बोलने लगी आप छिप कर मेरी बातें सुन रही थीं। सही कहते हैं पापा आपकी सोच ही छोटी है, और आप अपनी ही तरह मुझे भी बोरिंग बनाना चाहती हैं, आप चाहती हैं कि मैं आपके द्वारा बनाया हुआ रोबोट बन जाऊं जिसे आप दुनिया को दिखाएँ कि आपने क्या चीज बनाई है, बस पढ़ती रहूँ, आप डॉक्टर नहीं बन पायीं तो मैं डॉक्टर बनूँ और लोग आपकी तरीफ करें देखो वसुधा ने अपनी बेटी को डॉक्टर बना दिया। लेकिन मम्मा ये मेरी जिंदगी है इसे मैं अपनी तरह जीना चाहती हूँ। ये सब कह कर धरा कमरे से निकल गयी।

घण्टों रोती रही वसुधा, आज उसकी हालत उस कुम्हार की तरह थी जिसने अपने जिंदगी के अनुभव और मेहनत के बाद बहुत जतन से एक घड़ा बनाया और वो भी खराब निकल गया। उसका हर सपना बिखर गया था, उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि धरा इस तरह की बातें कर सकती है। फिर कभी सोचती ये उम्र है इस उम्र में विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण होता है। कभी सोचती शायद वो ही बहुत पुराने ख्यालों की है ये दुनिया बहुत बदल गयी है लेकिन फिर उसे धरा का बचपन याद आ जाता है जब वो अपनी नन्हीं अंगुलियों से उसका हाथ पकड़ कर कहती थी, "मम्मा आप मुझे कभी छोड़कर मत जाना, आपके बिना तो मैं सड़क भी पार नहीं कर पाऊँगी। "अपने आँसू पोछते हुए वसुधा मन ही मन निश्चय करती है, "मेरी बच्ची तू उम्र के जिस नाजुक दौर से गुजर रही है उसमें मैं तेरा साथ नहीं छोडूँगी। आधुनिकता और आस-पास के माहौल ने तेरा रास्ता भटका  दिया है लेकिन ये तेरी माँ का वचन है तुझे तेरी मंजिल की सड़क तक जरूर पहुँचाऊंगी।

इधर धरा को भी बहुत अफसोस हो रहा था, उसे अपनी मम्मा की हर बात याद आ रही थी। जब वो छोटी थी तब वो अक्सर वसुधा से कहती थी, "आप दुनिया की सबसे प्यारी मम्मा हो"उसे याद आ रहा था कि मम्मा उसके साथ खेलने के लिए कॉलोनी की किसी भी आंटी के साथ दोस्ती नहीं करती थी। कुछ आंटी धरा से मजाक करती थीं तेरी मम्मा को उनकी बेटी के सिवा कोई अच्छा नहीं लगता इसीलिए वो हमारे साथ अपना समय बर्बाद नहीं करती और आज उसने अपनी मम्मा से इस तरह बात की!!

दूसरे दिन धरा वसुधा के कमरे में जाती है तब वसुधा उसे देख कर, धीरे से मुस्कुराती है और अपनी दोनों बाहें फैला कर कहती है, "आ गया मेरा बच्चा अपनी बोरिंग मम्मा के पास"  धरा दौड़ती हुई वसुधा के गले लग जाती है और रोते हुए कहती है मुझे माफ कर दीजिए मम्मा प्लीज मुझे माफ़ कर दीजिए। बहुत देर तक वसुधा उसे अपने सीने से चिपकाए रहती है, फिर उसके आंसू पोंछते हुए कहती है, क्या हुआ कल पार्टी में ? ऋषि ने देखा तुम्हे? धरा शरमा जाती है और कहती है नहीं और अब मैं भी उसे नहीं देखूंगी। फिर वसुधा उसका माथा चूमते हुए कहती है, "बेटा इस उम्र में विपरीत सेक्स की तरफ आकर्षण होता ही है, बच्चों को ये सब कुछ बहुत अच्छा लगता है लेकिन ........अच्छा ये बताओ तुम्हारी पसंदीदा एक्ट्रेस कौन है? और क्यों? तो धरा ने कहा, प्रियंका चोपड़ा, , वो बेस्ट है मम्मा सबसे अच्छी एक्टिंग करती है। तब वसुधा ने कहा उससे भी सुंदर उससे भी बोल्ड एक्ट्रेस हैं बॉलीवुड में फिर वो तुम्हे इसलिए अच्छी लगती है क्योंकि तुम्हे उसका अभिनय पसंद है। अच्छा ये बताओ मामी और बुआ में तुम्हे कौन ज्यादा पसन्द है ? तो उसने तुरंत बोला, बुआ क्योंकि वो मुझे बहुत प्यार करती हैं। तब वसुधा कहती है लेकिन स्मार्ट और सुंदर तो तुम्हारी मामी हैं फिर भी तुम्हें बूआ पसन्द आती हैं। क्योंकि तुम्हें उनका स्वभाव पसन्द है। उसी तरह सब लोग आपको आपके गुणों की वजह  से प्यार करते हैं, पसंद करते हैं, आपके कपड़े आपकी स्मार्टनेस से कुछ दिन तक तो आप दूसरों को प्रभावित कर सकते हैं लेकिन आपके गुणों की सुंदरता का असर हमेशा के लिए होता है। धरा चुपचाप सब सुन रही थी, फिर वसुधा ने कहा बेटा, जब मैं छोटी थी तो मेरे सब दोस्त कहते थे, वसु तुझमें एक आग है जो तुझे बहुत आगे ले जाएगी।

लेकिन परिस्थितियों ने मेरा साथ नहीं दिया पर जब तुम पैदा हुई और पहली बार मेरी गोद में आई तब मुझे लगा मेरे अंदर की आग तुम्हारे रूप में परिवर्तित होकर हल्की हल्की किरणें बिखेर रही है। मैं तुम्हें अपना रोबोट नहीं बनाना चाहती बेटा, मुझे किसी को नहीं दिखाना कि तुम क्या हो, तुम तो वो धूप हो जिसकी रोशनी खुद बखुद लोगों तक पहुंच जाएगी। तुम वो हवा हो जिसको अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए किसी माध्यम की जरूरत नहीं पड़ती उसे तो महसूस किया जाता है। बस तुम्हें खुद को पहचानना है, अपने स्वरूप को जानना है।।

आज फिर धरा ने माँ का हाथ पकड़ भटकाव का रास्ता पार कर लिया था और अपने अंदर की रोशनी को पहचान लिया था।

दोस्तों आपको मेरी कहानी कैसी लगी जरूर बताइयेगा और इस सम्बंध में अपने विचारों से जरूर अवगत कराइयेगा।

धन्यवाद 

Image Source: youtube



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