113
Share




@dawriter

चिट्ठी - दादाजी के नाम

3 661       

यह कोई कहानी नहीं है। यह मेरे जज्बात हैं मेरे दादाजी के प्रति। 2016 में उनके जन्मदिवस पर मैंने यह चिट्ठी लिखी थी। एक दिन में लिखने के कारण इसमें वर्तनी सम्बंधित काफी अशुद्धियाँ है। लेकिन उनको सुधारने की जरुरत मैं नहीं समझता। भावनाओं को सुधारा नहीं जाता, उसे केवल महसूस किया जाता है।

स्वर्गीय जीवनंदन दत्त

बाबा ( दादा जी )

पता नहीं बाबा आज मुझे अचानक क्या दिमाग में आया। आज आपके जन्मदिवस पर, आपकी बहुत याद आ रही थी। तो मैंने सोचा क्यों नहीं इस समय को एक कागज़ के टुकड़े पर लिख लूँ। क्या पता कहीं ये पल गुज़र जाये और मैं ना लिख पाऊं। एक किताब में पढ़ा था कि जो बातें हम लोग मुँह से नहीं बोल पाते, उन बातों को लिख के व्यत करना ज्यादा सही होता है। और ये बात तो आप भी मुझसे कहा करते थे। और मैं जितनी बाते आपसे करता था, उतना किसी और से कभी नहीं किया। इसलिए आज आपसे इस चिट्ठी के माध्यम से आपसे दुबारा बात करूँगा। मुझे विशवास है कि आप मेरी इस चिट्ठी को जहाँ भी होंगे पढ़ रहे होंगे…….

आपको पता है बाबा, आपके आदर्श, विचार और आपके सोच को हम लोग भूल चुके है। आप सिर्फ दीवाल पर तंगी एक तस्वीर में ही रह चुके है। शायद समय की तेज़ गति ने लोगो को अपने बुजुर्गों का याद करने का शक्ति छीन ली है।

पता है आपको जिस दिन आप इस दुनिया को त्याग कर के मुक्ति की और प्रस्थान किये थे। तो जिस एम्बुलेंस में आपका पार्थिव शरीर रखा हुआ था, मैं भी उसी एम्बुलेंस में था। शमशान घाट पर आपको आपके बड़े बेटे यानि की मेरे पिता जी ने आपको मुखाग्नि दी थी। कुछ देर लोग वुहां बैठे रहे, फिर वह लोग उठ के इधर उधर चले गये। लेकिन मैं अंतिम तक वुहां बैठा रहा, जब तक आप पंचतत्व में विलीन नहीं हो गये। मैं अंतिम तक वुहां बैठा रो रहा था।

जब मैं कुछ बड़ा हुआ तो मुझे घर के लोगो से पता चला की, आप मेरे हाथों से अपनी चिट्ठी खमाख्या देवी मंदिर भेजते थे। और उस चिट्ठी में यह लिखा रहता था कि “ हे प्रभु, हे देवी अब मुझे इस दुनिया से मुक्ति दे दे। मैंने अपने जीवन में सभी ख़ुशी देख चुका हूं ”।

जब ये बात मुझे पता चला तो मुझे बहुत दुखः हुआ ये सोच कर की मैंने अपने बाबा को सबसे दूर कर दिया। लेकिन अब समझ में आता है कि आपने कितने बड़े काम के लिए मुझे चुना। आपके और भगवान के बातचीत का माध्यम के लिए मुझे चुना।

आपको याद है बाबा, गहमर में आप कैसे मेरे कंधो पर हाथ रख कर बाजार, मंदिर जाया करते थे। दुर्गा पूजा के समय हम, आप और बाकी सब रोज़ रात को ठेला पर बैठ कर रामलीला देखने जाया करते थे। गहमर में दो जगह रामलीला होती थी, पर हम दोनों को पकड़ी तर का रामलीला सबसे अच्छा लगता था। रोज़ रविवार को सुबह 9 बजे सब कोई नहा धो के रामानंद सागर जी वाला रामायण देखते थे। फिर 12 बजे शक्तिमान। रात को जब बिजली नहीं रहती थी, तो आप और दादी हम लोगों को कहानी सुनाया करते थे। ठण्ड के दिनों में हम लोग अलाव में हाथ सेंका करते थे। और आप किचन से आलू माँगा के उस अलाव में डाल देते थे, पकने के लिये। फिर जब वो आलू पूरी तरह पक जाता तो आप उस आलू को निकाल कर हम लोग को दे देते और बोलते थे की इसको नमक के साथ खाना। बाबा उस आलू की सोंधि सी खुसबू आज भी मेरे दिमाग में है।

हर रविवार को बाबा आप शाम में कीर्तन का आयोजन करते थे। मैं सुबह में ही दादी के साथ बाजार जा कर कीर्तन के लिये फूल और प्रसाद के लिये लड्डू और बताशा ले आता था। फिर शाम के समय कीर्तन होता था। हम लोग काफी उल्लाश में जोर जोर से कीर्तन करते थे। आप हारमोनियम बजाया करते थे और हम सब भजन किया करते थे। बाबा आपके जाने के बाद घर के लोगो ने आपके द्वारा शुरू किया गया कीर्तन का आयोजन को हमेशा के खत्म कर दिया।

जब तक आपके साथ मैं रहा, तब तक मैं काफी धार्मिक विचार का था। पर आपके जाने के बाद धीरे धीरे मेरी ईश्वर के प्रति श्रद्धा कम होते गयी। आज के समय में एक पूर्ण नास्तिक हो चूका हूँ बाबा, इसके लिये आप मुझे माफ़ कर देना। या शायद दूसरे शब्दों में कहूँ तो मैंने इतने पाप किये की भगवान के पास जाने से मन डरता है मेरा।

आप हमेशा कहा करते थे, की ज़िंदगी में जब भी कोई दुखः का पल आये तो, या कोई मुसीबत तो उसका डट कर सामना करना चाइये। अगर उस दुखः के समय अगर हमारे आँखों में आँसू आ जाते है तो उसे रोकना नहीं चाइये, उन आँसुओं को निकाल देना ही सही होता है। पर बाबा समय की इस करवट ने मुझे पत्थर दिल इंसान बना दिया। कितनी भी जटिल या मुश्किल परिस्थिति आती है तो मैं चाह कर भी रो नहीं पता हूँ, अंदर ही अंदर घुटते रहता हूँ। आज के इस दौर में किसी के पास समय नहीं बचा है बाबा, की कोई आपकी बात सुने। अगर आप किसी को बताते भी है तो शायद वो आपको पागल समझ ले।

आप हमेशा एक फ़िल्मी गीत सुना करते थे, और हम लोग को बोलते थे की इस गीत से आपको हिम्मत मिलती हैं। क्या बोल थे उसके ?

हाँ याद आया - “राही मनबा दुखः की चिंता क्यों सताती है, दुखः तो अपना साथी है ”

लेकिन बाबा अपनी पूरी ज़िंदगी में मैंने आज तक केवल हार ही देखीं है, इसलिये धीरे धीरे संगीत से भी दूर हो रहा हूँ।

बाबा आपने इस दुनिया से जाने से पहले मुझसे अपनी दो इच्छाये बताये थे। लेकिन मैं आपकी उन दोनों इच्छा को पूरा नहीं कर सका। इस बात के लिये मैं अपने आप को कभी माफ नहीं कर सकूँगा। आपने मुझसे बोला था कि मैं आपकी किताबों, हिन्दी साहित्य और आपने जितने भी डायरी अपनी ज़िन्दगी में लिखे थे, मैं उन सब को हमेशा सँभाल के रखूं। पर बाबा मैं उन सब को सँभाल के नहीं रख सका। आपने ये भी कहा था कि अगर मैं आपके सभी संग्रह को सँभाल नहीं पाया तो केवल आपकी लिखी कीर्तन की कॉपी और आपका हारमोनियम सँभाल के रख लूँ। लेकिन बाबा मैं यहाँ भी असफल रहा। आज के समय में मुझे याद भी नहीं है कि आपकी संग्रह की हुई किताबे, डायरी, हिन्दी साहित्य और आपका हारमोनियम कहाँ गया। बाबा जब आप चले गये थे, मैं उस वक़्त बहुत छोटा था। मैं आपकी बातों को समझ नहीं सका था। आज अगर आपकी सभी संग्रह मैं सम्भाल के रखता तो, शायद आप उन किताबों में मुझे दिखाई देते।

आपके जाने के बाद आपके बेटा और बेटी सब ने मिलकर एक फैसला किया था, की आपके हाथों से लिखी आपकी कीर्तन की कॉपी को छपवा के एक किताब की शक्ल देंगे। पर ये बात भी ढाक के तीन पात साबित हुई। जो लोग आपकी कॉपी सँभाल नहीं सके वो सब क्या उसे किताब की शक्ल देते ?

आप चाहते थे की मैं हारमोनियम सीखूं, क्योंकि आपके बेटे सब में केवल आपके एक ही बेटे ने यह कला सिख सके थे। लेकिन उन्होंने भी इस कला को कभी उपयोग नहीं किये। आपके 11 पोता, पोतियों में से केवल आप मुझे ही हारमोनियम सीखना चाहते थे। शायद आपको मेरे पर विशवास था कि मैं आपका आदर्श, विचार को आने वाली पीढ़ी में ले जाऊंगा। आप मुझमे शायद अपना अक्स देखा करते थे। लेकिन बाबा दुनिया में हर इंसान दूसरे इंसान से विपरीत होता है। बचपन में किसी ने सिखाया नहीं, और जवानी में जीवन के भाग दौड़ में उलझ के रह गया। और इस तरह आपके और मेरे मन की वो इच्छा कहीं दब के रह गयी।

आपकी तरह मैंने भी डायरी लिखने की बहुत बार नाकाम कोशिश की। पर मुझमे आपकी तरह स्थिरता, एकाग्रचित मन, और अपने पर विश्वास नहीं था। तो इस कारण मैं कभी डायरी रेगुलर नहीं लिख सका। आपके डायरी लिखने के कारण ही आज हम लोग का अपना जन्मतिथि और जन्मसमय पता है। क्योंकि आप रोज़ डायरी लिखते थे।

बाबा आपके जाने के बाद जो चीज़ बदली अब वो बताता हूं। अब घर में “ठाकुर प्रसाद” वाला कैलेंडर नहीं आता है। लक्स साबुन, कॉलगेट पेस्ट और बोरोलीन क्रीम के जगह दूसरा सामान ने ले लिया।

एक चीज़ जो नहीं बदली वो है parle-G बिस्कुट। आपने अपने सभी पोता पोतियों को रोज़ 3 रुपया वाला बिस्कुट खरीद के देते थे। और हम सभी भाई बहन बिस्कुट खाने में आपकी नक़ल करते थे। आप बिस्कुट एक पैकेट लेकर और एक गिलास पानी लेते थे, फिर बिस्कुट को पानी वाले गिलास में डुबो डुबो कर खाते थे। और हम सब भी ऐसा ही करते थे। आज भी मैं केवल parle-G बिस्कुट ही खाता हूं, ठीक वैसे ही जैसे पहले खता था, मतलब पानी में डुबो डुबो कर। समय के साथ सब चीज़ बदला, लेकिन parle-G बिस्कुट का रैपर नहीं बदला। आज भी उसके रैपर पर उस बच्ची का फोटो दिखाई देता है। लेकिन उसके नये प्रोडक्ट में अब वो छोटी बच्ची नहीं एक कार्टून करैक्टर छोटा भीम दिखाई देता है। उसको parle-G के रैपर पर देखता हूँ, तो गुस्सा आता है। लगता है जैसे कोई मेरे बचपन को रौंद रहा हो।

आप अपने बिस्कुट के पैकेट से 2-3 बिस्कुट अपने कुत्ता भोला को खिला देते थे। मैंने भी एक कुत्ता पाला है बाबा, लेकिन ये मादा है। इसका नाम है brownee, ये बिस्कुट नहीं खाती है। एक साल की थी जब मेरे पास आयी थी। मैंने इसका अपने बच्चे की तरह देखभाल करता हूँ। अब ये 9 साल की हो गयी है। और जैसे जैसे इसका उम्र बढ़ रहा है, मुझे इसको लेकर चिंता बढ़ते ही जा रहा है। औसतन एक कुत्ते का उम्र 9-12 साल के बीच का होता है। अब ये उतनी उछल खूद नहीं करती है। आप कहा करते थे ये दुनिया में सबसे खराब कोई चीज़ है तो वो है अकेलापन। ये सभी जीवों पर लागू होता है। हर जीव को अपने जीवन काल में एक साथी की जरुरत होती है। लेकिन इसने अपने पूरे जीवनकाल में कभी भी मिलन की बेला नहीं देखी। और एक मादा जीव के लिये जो सबसे खुसी की बात होती है ये चीज़ भी उसे नहीं मिला। एक माँ बनने की खुसी। उसके जीवन के अंतिम पड़ाव पर उसका अकेलापन मुझे कचोटता है। पर मुझसे जितना बन पड़ता है मैं उसका ख्याल रखता हूँ।

आपको पता है बाबा, जब दादी हम लोग को छोड़ कर के गयी थी। तो brownee ने पूरे तीन दिन तक खाना नहीं खायी थी। उसके आँखों से बहता आँशु सिर्फ मैं देख पा रहा था। हम लोग तो एक दिन बाद ही खाना पीना शुरू कर दिया था। लेकिन इसने पुरे तीन दिन तक खाना त्याग दी थी। कुत्ते वफादार होते है, हम इंसान तो उनके वफादारी के मामले में कुछ भी नहीं है। जानते है ये बिस्कुट क्यों नहीं खाती है, क्योंकि ये बिस्कुट सिर्फ दादी के हाथ से खाती थी। दादी के जाने के बाद उसने बिस्कुट खाना छोड़ दिया …..

बाबा आप चाहते थे ना की आपके पोता पोती सब में से कोई एक अच्छा सा लेख़क बने। क्योंकि आप बोला करते थे “हम कायस्थ है, मतलब कलम के सिपाही। हम लिखेंगे तभी दुनिया हमे पेचानेगी”। तो बाबा शायद मैं आपका यह सपना पूरा कर रहा हूँ। में बहुत बड़ा लेख़क तो नहीं, लेकिन एक लेख़क बन रहा हूँ। अभी तक मैंने कुल 7 कहानी लिख चुका हूँ। और सबसे अच्छी बात लोगो को पसंद भी आई है मेरी लिखी कहानियां। आपको एक खुशखबरी दूँ, मेरी एक कहानी एक प्रतियोगिता में शामिल हुई थी। और उस प्रतियोगिता में मैंने दूसरा स्थान हासिल किया। बाबा मैं अपने पूरे ज़िन्दगी में पहली बार किसी चीज़ में विजेता बना हूँ। नए लोग मुझे राइटर साहब कह कर संबोधन करते है। अच्छा लगता है।

घर के लोगो के बारे में बताऊँ, तो सब अपने अपने जीवन में खुश ही है। दुनिया के सामने मैं भी खुश होने का दिखवा करता हूँ।

आज मैं आपको चिट्ठी लिख रहा हूँ। एक बार आपने भी मुझे चिट्ठी लिखा था। जब आप पटना में थे और मैं गहमर में था। पर आपके चले जाने के बाद दादी और मम्मी ने उस चिट्ठी को गंगा नदी में प्रवाहित करवा दिया था। पता नहीं क्यों ? इस क्यों का जवाब मुझे आज तक नहीं मिला है।

आपने अपने जीवन के अंतिम वर्षो में आप पूर्ण शाकाहारी बन चुके थे। बाबा मैं भी पूर्ण शाकाहारी बनना चाहता हूँ। किसी दूसरे के सामने यह बात बोलता हूँ तो लोग हँसते है। बोलते है मुझसे नहीं हो सकेगा। लेकिन बाबा मैं अपनी तरफ से पूर्ण कोशिश करूँगा आने वाले समय में।

अंत में,

बाबा कोशिश करूँगा आपके अधूरे सपने सब को पूरा करने की। शायद फिर कभी घर में कीर्तन का आयोजन होगा। तब तक मैं हारमोनियम सिख लिया रहूँगा। parle-G बिस्कुट हमेशा मेरे साथ रहेगा आपकी याद बन कर। आपकी तरह मैं भी जानवरों सब से उतना ही प्यार करता हूँ। लेकिन अब आगे से कोई जानवर को पालूंगा तो जोड़े में पालूंगा वरना नहीं। धीरे धीरे अच्छा लेख़क भी बनने की कोशिश जारी रहेगी।

आगे से हर साल अक्टूबर में आपके नाम की एक चिट्ठी लिखा करूँगा। क्योंकि अक्टूबर में आपका भी जन्मदिवस होता है और मेरा भी। आप बस हम लोग पर अपना आशीर्वाद बनाये रखे ……..

आपका पोता,

अभिलाष कुमार दत्त



Vote Add to library

COMMENT