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@dawriter

खून का रंग लाल होता है, नीला नही.

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बचपन में सुना था टीबी छूत की बीमारी है। फिर एड्स के बारे में भी यही सुना। लेकिन course book में पढ़ा, दूरदर्शन में आने वाले विज्ञापनों ने भी अहम भूमिका निभाई ये समझाने में कि ये बीमारी हाथ मिलाने से नहीं होती और उसके बाद कुछ पिक्चर्स ने सोच को सही दिशा दी।

ऐसी ही कुछ परिवर्तन पिरीयडस को लेकर समाज में होने वाला है बस विज्ञापन और फिल्मों का आधार सही होना चाहिए। सैनिटरी नैपकिन्स के विज्ञापनों का प्रसारण एक लंबे समय से टीवी पर हो रहा है टीवी पे आते विज्ञापन को देख, और यदि घर पे वही चीज वो देख ले तो कभी कभी बच्चे अजीब सावाल पूछते भी है जैसे

ममा आप भी डायपर यूज़ करते हो?

इसलिए इन विज्ञापनों का टाईम और चैनल निश्चित होने चाहिए

अंधिकाशतय विज्ञापन में पैड की गुणवत्ता और क्षमता के प्रदर्शन के लिए नीले रंग के लिक्विड का इस्तेमाल किया गया। कई सवाल दिमाग में एक साथ आये कि नीले रंग का क्या मतलब है? खून दिखाने के लिए नीला रंग क्यों? खून का रंग लाल होता है, नीला नहीं।

फिर कुछ दिन पहले यू.के. की बॉडीफार्म नाम की कंपनी ने इस धारणा को तोड़ने का काम किया है। यकीन मानिए इस विज्ञापन को कई बार देखा। दिल को अजीब सा सुकून मिला। चलो कम से कम किसी को तो समझ आया कि पीरियड के खून का रंग लाल होता है।

सैनिटरी नैपकिन्स के और कुछ विज्ञापनों में देखा एक रिपोर्टर रेलिंग फांद कर इंटरव्यू लेना चाहती है, दूसरा विज्ञापन फ़ुटबॉल खेलते हुये दिखा कर बताता है कि "ये चार दिन" तो हर महीने आते हैं, लेकिन मौके ज़िंदगी में एक बार आते हैं। इन विज्ञापनों में लगातार ये बताया जाता है कि किस तरह फ़ला ब्रांड का नैपकिन दाग़ धब्बों से निजात दिलाता है, किस तरह कोई महिला इन नैपकिन्स का इस्तेमाल कर के "उन दिनों" में भी आम दिनों की तरह जीवनचर्या निभा सकती है। सोचिए पिरीयडस के गीलेपन से पैदा हुये संक्रमण से बचाने के लिये बनी नैपकिन्स के विज्ञापन में ही पिरीयडस को "उन दिनों" कह कर संबोधित किया जाता है।

जो सबसे तकलीफदायक होता है, "उन दिनों" में वो है मूूूड स्विंग, संक्रमण और शारीरिक दिक्कतें, दर्द जिनकी वजह से ये चार-पाँच दिन खास बन जाते हैं। सैनिटरी नैपकिन का विज्ञापन बनाने वाले तकलीफ की अपेक्षा नारी सशक्तिकरण का अधिक प्रचार करते हैं, मानों सैनिटरी नैपकिन का नहीं महिला आयोग का विज्ञापन हो। पिरीयडस की मूल समस्या उस समय होने वाली शारीरिक समस्यायें हैं, न कि दाग़ धब्बे। लेकिन इन विज्ञापनों के ज़रिये तो यही बात निकल कर आती है कि पिरीयडस बुरी चीज़ है और उससे भी बुरे हैं उससे लगने वाले धब्बे जो कि आपकी सामाजिक छवि के लिये ख़राब हैं इसलिये दर्द और संक्रमण को भूल जाईये, भूल जाइये अपने स्वास्थ और सलामती को.. बस चार लोग क्या सोचेंगे, इसकी परवाह कीजिये। कुल मिला कर ये सभी विज्ञापन ये साबित करने की कोशिश करते हैं कि मासिक धर्म में होने वाली सबसे बड़ी दिक्कत है आपका अपनी पसंद के तेज़ तर्रार "पुरूष तुल्य" काम न कर पाना क्योंकि दाग़-धब्बे आपकी बेईज़्ज़ती करवा देंगे। विज्ञापन बनने वाले, थोड़ा सा सोच का आधार बदलिए।

आज भी समाज में पिरीयडस, में महिलाओं को अछूत ही माना जाता है, नेपाल के बेहद ठंडा इलाका सिमिकोट हमेशा बर्फ से ढका रहता है। यहां भी पीरियड्स में महिलाओं को अपवित्र माना जाता है, लेकिन इस कदर कि इन दिनों में उनका बहिष्कार ही कर दिया जाता है, उन्हें घर में रहने ही नहीं दिया जाता। लोगों का कहना है कि वो ऐसा नहीं करेंगे तो तो उनके देवी-देवता नाराज हो जाएंगे।

पिरीयडस की समस्या और उसके हल पैड पे आधारित पहली फिल्म ‘PadMan’ आ रही है फिल्म रियल लाइफ स्टोरी पर बेस्ड है। यह अरुणाचलम मुरुगानाथम नाम के एक छोटे से बिजनेसमैन की कहानी है जिसमें गांव-देहात की महिलाओं के लिए कम बजट में सैनेटरी नैपकिन बनाकर जागरूकता फैलाई। भारत में रहने वाली हर पांच में से एक लड़की को महावारी के चलते स्कूल छोड़ना पड़ता है। गांव और पिछड़े तबके में रहने वाली महिलाएं बाजार में मिलने वाले सैनिटरी पैड्स नहीं खरीद सकतीं. ऐसे में मुरुगा की एक जिद ने इन सभी महिलाओं की जिंदगी बदल दी।

अक्षय ने अरुणाचलम की भूमिका निभाई है फिल्म अरुणाचलम के संघर्ष को दिखाएगी। दरअसल अरुणाचलम नहीं चाहते थे कि गांव की बाकी महिलाएं सैनेटरी नैपकिन से वंचित रहें जैसे कि कभी उनकी पत्नी रहती थीं। अपनी पत्नी की परेशानी को समझते हुए ही अरुणाचलम ने कम दाम में पैड्स बनाए और उन्हें गरीब और जरूरतमंद औरतों को दिया।

आईए एक रीयल विडियो देखते है।

 

यही उम्मीद है कि समाज भी शायद इतनी कोशिश के बाद एक दिन अपनी हिचकिचाहट तोडेगा।



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