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@dawriter

खत: अजन्मे बच्चे के नाम

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मेरे प्रिय,.............,

क्या नाम दूं तुम्हें ? अभी तक तो तुम्हारा नाम भी नहीं सोचा था मैंने ...तुम तो अपने होने का एहसास दिला कर चले गए ...मेरे पेट के अंदर अपने छोटे से धड़कते दिल के साथ जीवित थे तुम...और मेरे दिल में एक उम्मीद .. खुशी की लहर और आशा के साथ ...कितनी ही सुबह मैने तुम्हारे एहसास के साथ बिताई थी... कितनी रातों तक मैंने तुम्हें अपने भीतर जागते देखा था..! कभी न पसंद आने वाले व्यंजन भी खाए मैने ,जो शायद तुम्हारी ही मांग रही होगी..! और कितनी बार मैंने अपने भीतर हलचल करते हुए महसूस किया था तुम्हे..! सोचा था तुम आओगे तो जीवन थोड़ा व्यस्त हो जाएगा ...कभी रातों को जगूंगी तो कभी तुम्हे सीने से लगा कि थपकियाँ दे के ...सुलाऊंगी ।

 

कभी खुद नींद में झूलती तुम्हे गोद मे लिटा के चुपके से नींद में समा जाउंगी.... किंतु यह क्या? तुम तो मेरे पेट से निकलकर गोद मे आने की बजाय ऑपरेशन थिएटर में ओटी ट्रे पड़े हुए थे ...! निर्जीव मांस के लोथड़े के रूप में..! ध्यान से देखा था तुम्हे मैने...! तुम्हारे छोटे छोटे हाथ -पैर..नाक आंखे..और चेहरा तो बिल्कुल पापा का मिला था तुम्हे...! मैने सोचा कि अगर तुम समय से आते और जीवित होते तो कितना खुश होते तुम्हारे पापा..! कि, चलो दूसरा बच्चा तो मुझे पड़ा..! तुम्हारी बहन तो मुझे पड़ी थी नैन नक्श में..! उनकी तमन्ना शायद पूरी भी हुई और नही भी...! ऑपरेशन थिएटर के बाहर तुम्हारे पापा, दादी, तुम्हारे बाबा और तुम्हारी बड़ी बहन सब तुम्हारा इंतजार करते रहे थे ..! सोचो अगर तुम समय से आते तब क्या मंजर होता ..तुम्हारी बहन तो खुशी से पागल ही हो जाती ! उसने कितने विश्वास से कहा था भाई ही आएगा..इस बार रक्षा बंधन में मैं अपने भाई को राखी बांधूंगी..! उसके विश्वास पर तो मैं भी आश्चर्य चकित हूं !! अगर तुम सही सलामत आते तो उन के चेहरों पर खुशी की लहर होती! चारों तरफ जश्न मनाया जाता ..! पर तुम तो समय से पहले ही आ गए और आए भी तो किस तरह ? एक निर्जीव आकृति के रूप में ! क्या हालत होगी सबकी ..खुद मैं भी दुखी हूं बेहद..! क्या कमी रह गयी मुझसे ? जो तुम रूठ गए ..! काश तुम चार महीने बाद आते तो सकुशल होते ...रोते, हंसते खिलखिलाते ...! ईश्वर की क्या मर्जी थी....! कल तक जिन पंडित जी से तुम्हारे जन्म की पूजा करवानी थी ...आज उनसे ही पूछना होगा कि तुम्हारी अंतिम क्रिया की विधि कैसे होगी..!! पर ऊपरवाले से क्या शिकायत ! उसके खेल तो वो ही जानता है। अभी तो मैं खुद बेसुध हूँ, शायद इस बेहोशी की दवा के कारण या फिर तुम्हारे असमय चले जाने की वजह से ...! चाह तो रही हूं कि उस ट्रे से उठा कर सीने से चिपका लूं तुम्हे! मगर नींद के आगोश में पलकें भीग कर चिपक सी गयी हैं..! और हाथ में लगी ड्रिप की सुइयां सीधे मेरे दिल को चीरती हुई नश्तर सी चुभ रही हैं..!

तुम्हारी अभागी....- माँ

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कविता जयन्त श्रीवास्तव



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