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@dawriter

कर्तव्य और अधिकार

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आज समाज में व्यक्ति अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को भूल कर केवल अपने हक और अधिकारों की बात  करता है। वह यह भूलता जा रहा है कि समाज के प्रति उसके क्या कर्तव्य है, ठीक इसके विपरीत वह समाज में अपने हक और अधिकारों को ढूंढता दिखाई देता है। समाज में कई इस प्रकार के भी व्यक्ति हैं जो अपने कर्तव्यों का निर्वाह तो करते दिखाई देते हैं किंतु उसके पीछे की सच्चाई कुछ और है। वो या तो किसी लोभ या किसी लाभ की भावना से ग्रस्त हो कर अपने कार्य को करते हैं। अपने कर्तव्यों का बखान इस प्रकार करते हैं कि मानों इस कार्य को करके उसने समाज पर उपकार किया हो। यदि घर का प्रधान अपने कार्यों को परिवार के प्रति उपकार मानता है और उन कार्यों का बार-बार स्मरण कराता है तो  वह अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करता है, ठीक इसी प्रकार यदि कोई नेता देशहित में किये गये अपने कार्यों की बार-बार समीक्षा करता है तो यह भी उचित नहीं है, और ऐसे अनेक उदाहरण समाज में विद्यमान हैं। व्यक्ति का स्वार्थ केवल इस बात में है कि वह अतिशीघ्र समाज से अधिक से अधिक क्या ले सकता है, समाज को कुछ दिया भी जा सकता है इस विषय में उसकी समझ शून्य हो चुकी है। शायद आज समाज में प्रेम और स्नेह कम होने का यही कारण है क्योंकि अब तो हम मुफ्त में किसी को प्रेम भी नहीं देते हैं।

 

उत्कृष्ट शुक्ला 
#utkrisht (copyright)



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