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@dawriter

उस गाँव की स्त्रियां

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वैसे तो इक्कीसवीं सदी चल रही है...रहन-सहन, तकनीक, व्यवहार हर चीज़ में बदलाव आया है भारत में पर एक चीज़ है जो नहीं बदली वो है स्त्री की स्थिति... इस मामले में पूरे भारत को शामिल नहीं कर सकती अलग अलग क्षेत्रों में महिलाएं खूब नाम कमा रही है...नारी और भी ज्यादा मजबूत, आत्मनिर्भर और स्वतन्त्र हुई है।। पर कुछ हिस्से ऐसे है जहाँ स्त्रियों की स्थिति अब भी दयनीय है ...ये बात मुझे कुछ दिन पहले ही समझ आई जब बुन्देलखण्ड के कुछ गाँवो में मेरा जाना हुआ।। वहां की औरतों से मिलकर एहसास हुआ की इन गांवो में बिजली, रोड,इंटरनेट सब नए ज़माने का है पर स्त्री के प्रति सोच वही पुरानी।।

इन जगहों का रिवाज़ है कि अच्छे घर की लड़कियां घर से बाहर नहीं निकलती... हाँ स्कूल जा सकती हैं पर.. बाकी कोई भी जरूरत हो ये किसी दूकान नहीं जा सकती... रबर बैंड, पेन, किताब, क्रीम, कपड़े, चप्पल, यानि की कोई भी जरूरी सामान ये ख़रीदकर नहीं ला सकती..इनके भाई या पिता लाकर देते हैं हर सामान..या कभी दया आ गयी तो साथ भी ले जाते हैं।।और अगर गलती से किसी परिवार में बेटी को खुदसे सामान खरीदने की आज़ादी मिल जाए तो समाज के ठेकेदार उस लड़की को चरित्रहीन का सम्बोधन देने में जरा सी देर नहीं लगाते....लड़की 12 साल की हो या 20 साल की दुकानदार 20 साल का हो या 40 साल का ये समाज के तथाकथित हितेशी उस लड़की के दुकानदार से नाज़ायज़ सम्बन्ध के गवाह बनकर खड़े हो जाते हैं।। हैरान मत होइए ये किसी पुराने ज़माने की फ़िल्म की कहानी नही है 2017 की ही बात कर रही हूँ मैं।

अंततः या तो शर्म से लड़कियां घर से बाहर निकलना बन्द कर देती हैं या घरवाले बंदिशें लगा देते हैं.. सबसे हैरान करने वाली बात ये है की ये सब अपनी बेटियों को पढ़ाना चाहते है.. अफसर बनाना चाहते है पर अपने साथ हो रहे समाज के व्यवहार से लड़कियां बहुत कम उम्र में ही अपना आत्मविश्वास खो देती है और ज्यादातर लड़कियां शिक्षा छोड़कर घर बसाना ज्यादा सही समझती हैं।। अजीब सी दोहरी मानसिकता बिखरी होती है जहाँ जीन्स तो पहन सकते है पर दुप्पटे के साथ।।

बचपन से ही लड़के -लड़की का फर्क सिखाया जाता है बच्चों को.. बेटा छोटा हो या बड़ा खुद से एक गिलास पानी भी नहीं पियेगा ये काम उसकी माँ या बहिन करेगी।। ऐसी मानसिकता में पल कर बड़े होने वाले लड़के लड़कियों से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं? सबसे ज्यादा घिन इस बात पर आई मुझे कि ये मानसिकता पुरुषों से ज्यादा महिलाएं विकसित करती हैं...और ये मानसिकता जब परिपक्व हो जाती है तब आती है शादीशुदा जिंदगी की बारी।। शादीशुदा पुरुष खुद के कच्छे बनियान तक नहीं धो पाते और ये पूण्य का काम शादी के पहले उनकी माँ और शादी के बाद उनकी पत्नियां करती है इससे पुरुषो को फक्र महसूस होता है और स्त्रियों को अपना पत्नी धर्म ।। उन जगहों के पुरुषों के लिए पत्नी का अर्थ... झाडू, पोंछा, बर्तन, खाना बनाना, बच्चे पालना, घर की देख रेख करना होता है।। और इन सबके बदले इस स्त्री को सम्मान भी नहीं मिलता एक व्यंग्यात्मक हंसी में गूंजती आवाज़ सुनने मिलती है... आखिर तुम करती ही क्या हो?? वहां की शादीशुदा औरतें एक साड़ी तक खुद की पसन्द की नहीं पहन सकती .. पैर की चप्पल से लेकर माथे की बिंदी तक जो भी चाहिए वो इनके पति लाकर देते हैं..फिर सामान पसन्द हो या ना हो पत्नी की पसन्द का कोई महत्व नहीं होता।। उन क्षेत्रों में एक और चलन है शादी के बाद पत्नी के मायके के तरफ के यानी लड़की के मौसी..मामी..चाची.. वगैरह से धीरे धीरे सारे सम्बन्ध खत्म करवा दिए जाते हैं।। पर पत्नी की जिम्मेदारी होती है कि पति के दूर दूर के रिश्तेदारों से सारे रिश्ते निभाते हुए चले।।

देश, दुनिया में एक तरफ नारी अपना अस्तित्व बचा रही है अपनी पहचान बना रही है और दूसरी तरफ ये स्त्रियां हैं जिन्हें ये भी नहीं पता कI इनका कोई अस्तित्व रह ही नही गया है।।

सुनने और पढ़ने में लगता है की सदियों पुराने किसी क्षेत्र की बात हो रही है पर इन जगहों पर जाने पर बाहरी रूप से ऐसा बिलकुल नहीं लगता.. सारे संसाधनो से भरे पूरे है ये क्षेत्र ।। पर अफ़सोस सोच का विकास होने में यहाँ सालों लग जाएंगे।।

जब इन लड़कियो और औरतों से बात करो तो इन पर दया नहीं गुस्सा आता हैं इनका मानना है कि यहाँ ऐसा ही चलता है हमारी माँ ने भी यही सिखाया है हम इसी में खुश हैं।। और इन मर्दों की तो हंसी छूट जाती है बदलाव की बात सुनकर।। इन क्षेत्रों में कुछ प्रतिशत ही परिवार हैं जो इस मानसिकता से दूररहते हैं।।पर ज्यादातर लोगो में ऐसी छोटी मानसिकता वाले कीड़े ही दिमाग में बिलबिलाते है।।।

एक टीस उठी थी उन लोगो से मिलकर..वही लिख दी।।।

जो पुरुषवादी सोच वाले मेरी पोस्ट से आहत हुए है वो कमेंट में कोई गन्दगी ना फैलाएं।।

#निधिखरे #खामोशलफजोंकाशोर

Image Source: ndtv



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