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@dawriter

उठती उंगलियाँ

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rajesh by  
rajesh

दीपिका की आँखों में एक हाथ उभरा जिसकी तर्जनी उसकी ओर उठी थी ..... एक, दो...... फिर धीरे-धीरे अनेक हाथों की तर्जनियाँ उसकी ओर उठने लगी। वह उनसे खूब परिचित है, हजारों बार उसने उन उठती उंगलियों को देखा है, बचपन से अबतक.....।

डाक्टर दीपिका की आज रात की ड्यूटी थी। संयोग ही कहिये अभी तक उसकी बुलाहट नहीं आई थी, उसने पास रखी पत्रिका के पृष्ठ पलटे ....। रात और स्याह हो गई ,सन्नाटे को तोड़ती कभी -कभी कुत्तों की गुर्राहट....... कुछ जागी-जागी और सोई-सोई सी इक्का -दुक्का नर्सो की भिनभिनाहट उसकी एकरसता को भंग कर देती, वह हलका सा चौकती और फिर पढ़ने लगती। कहानी शायद कुछ अधिक रोचक मोड़ ले रही थी, उसकी तन्मयता और बढ़ गई। पर .........
"डाक्टर साहब ! मरीज को होश आ रहा है.....। "स्टाफ नर्स मिसेज नारडा ने आकर सूचना दी

" चलो, देख लेते हैं।" पत्रिका नीचें रखते हुए कहा दीपिका ने।

"........अरे.., इनकी तो श्वांस गति असामान्य है, नारडा ! ग्लुकोज चढ़ाने का प्रबन्ध करो।"

"कहो, मिसेज सालवान ! कैसी हो ....कल तो शायद तुम्हें छुट्टी मिल जाए।"दूसरी मरीजा से पूछा दीपिका ने।

" जी..ई.." प्रत्युत्तर में एक पुलकभास था, वह भी मुस्कुरा दी औपचारिक मुस्कराहट, और आगे बढ़ गई।

" भई ! अपना ख्याल रखा करो, ...हूँ. ऊँ.....क्या खाया था सुबहा..... जरूर कुपथ्य रहा होगा तभी तो पेट में दर्द है.......यह गोली खा लेना .., नर्स गर्म पानी से सेक भी करनी होगी ......। कहती हुई दीपिका आगे बढ़ गई।.....चार ...पाँच.... छै : .. क्रमानुसार उसने अन्य रोगणियों को देखा और अपने कक्ष की ओर मुड़ गई।

घणटा घड़ी ने ध्वनि की, एक - एक करके बारह बार। " बारह बजे हैं । " वह बड़बड़ाई और एक अंगड़ाई के साथ जम्हाई सी लेते हुये उसने पत्रिका उठाई पर इसबार उसका मन न लगा। कुर्सी के पिछले भाग पर दीपिका ने अपने सिर का पिछला भाग टिका दिया। नींद से बोझिल उसकी बड़ी-बड़ी आँखे झुकने लगी।

मरीज नम्बर एक को दिमागी दौरे पड़ते थे। विचित्र सा रोग था उसका, शारिरिक कम पर मानसिक अधिक। वंशवृद्धि और नाम के चिर-स्थायित्व की भावना ही शायद पुरुष में पुत्रेच्छा को प्रबल करती है अपेक्षाकृत नारी-जाति के यह बात दूसरी है कि वह व्यक्त कम कर पाता है और नारी कुछ अधिक संवेदनशील हो जाती है। इस स्त्री के रोग का मूल कारण भी यही था। पुत्री की काल्पनिक-आशंका से ही उसका मानसिक सन्तुलन बिगड़ने लगता था, श्वासें असन्तुलित और रक्तचाप बढ़ जाता था। ऐसे रोग में हृदय-संस्थान ठप्प होने की भी सम्भावना बनी रहती है।

"डाक्टर साहिब ! नम्बर एक को ग्लूकोज़ देने का प्रबंध कर दिया है" दीपिका की तंन्द्रा टूटी...उसनें नर्स की तरफ देखा थकी-थकी ... शीथिल- शीथिल अलसाई-अलसाई सी......।

आओ, नारडा !......इधर नहीं ..इधर बैठो। स्वर की आत्मीयता से नारडा कृतज्ञ सी हुई, कितनी उदार और मृद्धु -भाषी है डाक्टर दीपिका। इनके साथ रात की ड्यूटी भी भारी नहीं लगती।

"सुनो, नारडा ! ... तुम भी मां एक मां हो...एक बात बताओ, क्या बेटियाँ किसी को भी अच्छी नहीं लगती ? दीपिका ने जिज्ञासा से उसकी तरफ देखते हुए पूछा।

नहीं, डॉक्टर साहिबा ! ऐसा तो नहीं कहा जा सकता..... हाँ मगर...पुत्र की आकाँक्षा ...अधिक प्रबल देखी गई हैं। नारडा का स्वर तुलनात्मक था।

"दूसरों की बात जाने दो, तुम अपनी कहो। " दीपिका ने नारडा को कुरेदा।

"जहाँ तक मेरी पसन्द की बात है, तो मुझे तो दोनो ही चाहिये। सामान्यत: ऐसा नैचुरल भी है। आपका विचार क्या है मेरे लिये समझना कठिन और अपनी बात समझाना भी आसान नहीं..... क्योंकि आप .... मिस ... हैं ...... मेरी बात कुछ और है। मेरे पास ...एक बेटा और एक बेटी है। प्रभु ईसा मसीह की कृपा से मै तो सन्तुष्ट हूँ, कहते हुए आस्था से उसने अपने गले में पड़े क्रास-चिन्ह को छुआ।

दीपिका को लगा, नर्स नारडा का हाथ धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा है और उसकी तर्जनी उंगली उठती जा रही है .....सामने....ठीक उसकी ओर....। पूर्व परिचित स्वप्न की भांति.. नारडा के साथ-साथ हाथों की संख्या बढ़ने लगी और उनकी उठती उंगलियों ने उसे अतीत की ओर ढकेल दिया।

दो से पहले और दो के बाद तीसरा नम्बर था, उसका। उससे बड़ी आकांक्षा और कल्पना लम्बी, इकहरी, गौर वर्णीया, दोनों छोटी तृप्ति और अन्तिमा उनसे भी अधिक रूपसी। सबसे छोटाभाई भी कम मोहक नहीं था। वही थी सबसे श्यामल -श्यामल और बुझी -बुझी सी। सैकड़ों बार इस चर्चा का विषय बन चुकी है वह, इससे वह अनिभिज्ञ नहीं थी।

जब कभी भी कोई अपनी तर्जनी उठाकर उसकी मां प्रतिमा से पूछता, "भई तुम दोनों भी गोरे-चिट्टे और यह लड़कियाँ भी........पर.. यह नम्बर ' तीन ' कहाँ से उठा लाई हो, तुम ?" .....तब उसे लगता उठती उंगली का यह परिहास किसी तीक्ष्णता को इंगित कर रहा है, वह उदास हो जाया करती थी ।

अध्ययन के प्रति उसकी बचपन से ही बड़ी रुचि थ। उसके दो ही श़ौक थे एक पस्तके पढ़ना दूसरा मां के साथ इर्दगिर्द लगे रहना। पिताजी से अधिक मां का प्यार उसे मिला था। प्रायः उसकी छोटी-बड़ी बहिने चिढ़कर उसे गार्गी और अपाला का नाम दिया करती थी पर यह नाम उसे कभीबुरे नहीं लगे अपितु यह सम्बोधन उसकी बड़ी-बडी स्वप्निल आँखों मेंं ख्वाब बनकर तैरने लगे।

एक-एक करके सब बहिनें अपने-अपने पतिगृह की शोभा बन गई, आशुतोष विदेश चला गया, और वह बनगई 'राजकीय - औषधालय का एक भाग।

कई वर्षो के अन्तराल पर अक्समात ही कुछ एसा विधान बना कि सारा परिवार एक छत के नीचे इक्कठा हुआ वह, उसकी बहिनें, उनके पति और बच्चें, भाई, पिताजी और माता जी। कुल मिलाकर डेढदर्जन सदस्य। दीपिका को अपनों की भीड़ की एक खूबसूरत-हलचल से घर बदला-बदला सा लगा। प्रत्येक सदस्य आत्मप्रशंसा में जुटा था,और बच्चें अपने-अपने ढंग से खेल रहे थे। वह बारी-बारी सबको बिस्तरों पर चाय दे रही थी, मां रसोईघर में और पिताजी अपने कमरे में थे।

हास- परिहास, उपालंभ-छीटाकसी के रंगारंग वातावरण में उसे भी रस आ रहा था। मधुर-मधुर.... सुखद-सुखद.......।

आकांक्षा दी और कल्पना दी कुछ संयत स्वभाव की तृप्ति उनसे भी शान्त,पर अन्तिमा मुंहफट और वचाल थी अधिक प्रशंसा ने उसमें दर्प व अहं कुछ अधिक ही भर दिया था, सामान्यत: औपचारिक लिहाज को भी ताक पर रख देती थी वह...ठीक उस दिन की तरह.......

"दीप दी ! हमें देखकर भी क्या, आप 'कुछ' नहीं सोचती अपने विषय में....? दीपिका से चाय लेते समय संकोच से पूछा तृप्ति ने।

"कुछ क्या..? विवाह का शब्द प्रयोग करने मे कैसी झिझक है आपको, स्पष्टवादिता से हमेशा क्यों डर लगता है, तृप्ति दी......और हाँ दीपा दी ! आपको भी अब ओर अधिक चूकना नहीं चाहिये ...कहीं फिर ...पछताना न पड़े.... अन्तिमा के साथ एक सम्भिलित ठहका उठा, अपनों की भीड़ के बीच से।....कुछ चुभ सा गया दीपिका के मन में....। वह आहत स्वर में बोली- "आर्थिक कोण को जाने दो, क्या मां और बाबूजी की जीर्ण काया विश्राम नहीं चाहती ?.... तुम सब तो अपने मे मस्त जी रहे हो इनसे उपेक्षित, यदि मैं भी इन्हें छोडदूँ , .....तो........?

छोड़ो-छोड़ो ...बड़ी बनी हो श्रवण कुमार...अपनी असमर्थता को सेवा नाम देकर पुण्य कमाना चाहती हो" एक स्वर उससें भी ऊँचा उभरा, "दीदी ! काली लड़की की डोली दहेज के घोड़े के बिना कैसे उठती। उस दिन आपने ही तो चाबुक मार उसे भगा दिया था।

"मैं आज भी वैसा जीवन साथी नहीं खरीदूँँगी चाहे इसके लिये कितनी बड़ी बलि देनी पड़े...वह ठहरी, देखा सबकी नजर उस पर टिकी थी, उसने आगे बढ़कर कहा - "देखो आशु ! बाबूजी का वह दहेज का रूपया मेरे खाते में लाख से भी ऊपर हो गया ....आज मैं डाक्टर हूँ आत्मनिर्भर ...आर्थिक रुप से भी काफी सुदृढ़... फिर भी लोभी कुत्ते पालने का मुझे कतई शौक नहीं ...। वह रुकी नहीं, सब आश्चर्यचकित थे हमेशा चुप-चुप सी रहने वाली दीपिका इतनी मुखर..वह धाराप्रवाह बोलती गई," बहुत कुछ वृद्धावस्था की अक्षमता की आशंका ही पुत्रेष्णा का कारण है। भावी सम्बल की आकांक्षाऐ जिसमे निहित हैं, तुम ! अपनी घुड़दौड़ में इन बूढों का कितना अवलम्बन बन पाओगे, कौन जाने ....? आशुतोष झेंप सा गया, बच्चें अभी भी तटस्थ भाव से अपने-अपने में व्यस्त थे।

"माता-पिता की सेवा - सुश्रुषा का एकमात्र उत्तरदायी केवल बेटा हो इसका युग भी बीत गया। समानाधिकार पाने वाली बेटी अब इस दुखतर दायित्व से उपेक्षित होने की अधिकारिणी नहीं है। अपने-अपने सोचने का मापदण्ड हो सकता है भिन्न-भिन्न हो, पर मेरे लिये मेरे आदर्शों का औचित्य न्यायसंगत ही है।

" तुम्हारी विवेचना का तो यह अर्थ हुआ कि लड़कियां सुसराल न जाकर पितागृह में ही अपने कर्तव्य को निभाती रहे।" इसबार उसका बहनोई अनिरुद्ध ढाल बनकर आगे आए।

"नहीं, विवाह की अर्हन्ता गौण नहीं, उसकी आवश्यकता को अकारण ही झुठलाया नहीं जा सकता। परन्तु श्वास प्रक्रिया की भांतिवह एक मात्र 'अनिवार्यता'भी नहीं है, विशेषकर आत्मनिर्भर स्त्रियों के लिये।

"जबकुछ न मिले तो अंगूर खट्टे की कहावत जैसी धारणा बन जाना कोई अजूबा नहीं ।" अन्तिमा ने अपनू पति का पक्ष सबल किया ।

ऐसी बात नहीं है, अन्तिमा ! चाह राह खोज ही देती है, फिर मैने इसकी आवश्यकता को नकारा भी तो नहीं।" दीपिका न सरलभाव से कहा।

"तो क्या, तुम ! दहेज - विरोधी-अखाडे़ का प्रतिनिधित्व करना चाहती हो ..?" आकांक्षा ने प्रश्न किया दीपिका से जो देर से चुपचाप सुन रही थी उनकी बातचीत।

"ऐसा भी नहीं, मैं क्या चाहती हूँ, मैने कभी इस विषय परविचार नहीं किया,पर इतना जान लीजिए इस हाट में बिकते नर पशुओं के प्रति मेरा रुझान नहीं। इनसे समझौता करना मेरी नियति के विरुद्ध है। पढ़ी लिखी तो आप सभी है, पर अपनी-अपनी रूचि की बात है।

दीपिका का तीखापन कहीं उनके पति देव के अहं पर भारी न पड़े आकांक्षा से कल्पना ने कहा- "दहेज तो पुरातन से चली आ रही एक अनवरत प्रक्रिया है, जनक-जननी का स्नेहिल आशीर्वाद है।शुभकामनाओं का प्रतीक है ....और फिर लडकियों का भी तो कोई अधिकार है, पितृ -सम्पदा पर।"

" सचमुच... सामर्थ्य की सीमा- रेखा के अन्तर्गत ही। उपहार स्वेच्छा से दिये जाते हैं, दीदी ! माँग या दबाव उसमें सम्भिलित नहीं , और जहाँ तक अधिकारों का प्रश्न है तो फिर कर्तव्य का प्रश्न भी सापेक्षित है, इसे आप क्यों भूल जाती हैं।" तर्क और विवाद मे दीपिका भारी पड़ रही थी , वातावरण मे मतभेदों के उपालम्भों की कड़वाहट भर गई।

"हमारे विरुद्घ तुम्हारी यह मोर्चाबन्दी कहीं तुम्हारी स्वार्थपरता तो नही।" आकांक्षा के पति बोले जो दीपिका के तर्कों को बहुत देर से अपनी मीमांसाऔ की तुला पर तोल रहे थे।

आहत सी दीपिका बोली- "नही ! नही !!"

"छिपो मत, दीपिका ! हम इतने समर्थ हैं कि बाबू जी का पैसा-पैसा चुका सकते हैं, लेकिन उसे केवल तुम भोगो..... हम इतने भी मूर्ख नहीं।"अन्तिमा के शाब्दिक-पैनेपन से दीपिका और घायल सी हुई, "मेरा यह अभिप्राय नहीं था, अन्तिमा ! मैं तो केवल यह कहना चाहती हूँ कि जीवन के अन्तिम -चरण में जब मनुष्य की शक्ति जीर्ण -शीर्ण होने लगती है तो शैथिल्य के इस दौर में वह एक सशक्त अवलम्बन चाहता है, और सन्तान ही उसका केन्द्र बिन्दु होता है तब ..पुत्र और पुत्री दोनों ही की उपेक्षा उन्हें सालती है और वक्त से पूर्वउनका मनोबल तोड़ देती है।"

"मैं तुमसे सहमत हूँ, दीपिका ! पर ..अपने सास-श्वसुरके प्रति उसका कोई दायित्व नहीं.....? " अनिरुद्ध ने पूछा, उसके स्वर में सहजता थी।

"मेरे विचार में पति-पत्नी समानाधिकार की भांति समान कर्तव्यों के लिये भीअनुबन्धित हैं। दीपिका ने भी सहजता से उत्तर दिया।

"यदि मैं बाबूजी को अपने साथ रखलूँ ...तब क्या टूट सकेगा तुम्हारा यह भीष्म प्रण ? " आशुतोष का प्रश्न था दीपिका से।

"आशु ! न मैने कोई शपथ ली है और न मेरा ऐसा कोई संकल्प है। जीवनसाथी के रूप में चाहती हूँ मै एक मानव......पूर्ण और सहज जो मुझे समझ सके और मैं उसे......। परस्पर आदर्शों के बीच हो सके हमारा कृत संकल्पशील 'समझौता'। यदि ऐसा संम्भव हो सका तो कभी अवसर नही खोऊंंगी भावसिक्त प्रत्युत्तर था दीपिका का।

" तुम्हारे इस पूर्ण मानव की कैसी होगी साकार-रचना इसे जानने की हमें हमेशा जिज्ञासा रहेगी " इसबार तृप्ति का पति मयंक मुस्कुराया।

"तुम्हारे उस पूर्ण मानव की कल्पना मे अगर कोई रूपसी दीपिका हुई,तब......? अन्तिमा के व्यंग्य ने उसे फिर कचोट दिया, .... उसे लगा जैसे अन्तिमा का हाथ उठा और उठ गई है उसकी तर्जनी उंगली जो तनती जा रही है उसके मुंह की तरफ .... फिर वही..... शनै....शनै..अनेकों उठते हाथों की उंगलियां...... आक्रामक ढंग से बढ़ती जा रही थी उसकी तरफ ..... उपहास .... व्यंग्य...... और उपालम्भ लिये ......।

भागते पदचापों ने उसे उबारा उन चुभते संस्मरणों के बीच से वह उसी की तरफ आ रहे थे।

" ........डाक्टर .साहब ! नम्बर छै: की बच्ची की हालत बिगड़ रही है...।" नर्स हाँफ रही थी।

"चलो हम चलते हैं।" विद्युत की तरह तेजी से दीपिका उठ खड़ी हुई।

टन..नन..न..न....एक नहीं छै:बार घण्टे बजे..।

छै: बज गये , ...साहब ! .....आप .की .....ड्युटी-टाईम तो ओवर..... । नारडा ने कुछ सकुचाते हुए धीरे से कहा।

"कोई बात नहीं ... यही आकस्मिक -आमन्त्रण ही तो मानव की चुनौती होते हैं, नारडा ! " नारडा की दृष्टि में दीपिका और डॉक्टरों से कुछ ओर अधिक ऊँचा उठ गई।

" आक्सीजन की व्यवस्था करों।"

कत्रिम श्वांस देते हुए दीपिका ने पास खड़ी नर्स से कहा।...... करीब एक घंटा और लगा, दूसरे दौर की डाक्टर नम्रता भी गई, दोनों ने परस्पर देखा और मुस्कुरा दी, बच्ची खतरे से बाहर थी।

"भगवान तुम्हारें बच्चे खुश रक्खें ।" भीड़ में से किसी ने दुआ दी।

"अरे , चुप , डाक्टर साहिबा अभी मिस हैं। "

क्या ....आ....? वृद्धा के स्वर का आश्चर्य उसे चुभ सा गया और उससे अधिक उस वृद्धा के पीछा करते ...शूल वाक्य ........।

"इतनी बड़ी उम्र..... बाल भी पकने ...अरे डॉक्टर है ....... कमाती भी है........ इन्हें जरूरत भी क्या है...? .... दीपिका को लगा क्या विवाह केवल जीने के लिए एक आर्थिक अनुबंध मात्र है? मुस्कुरादी वह एक विरक्त हँसी। आवश्यकतानुसार कैसा बदलता रहता है विवाह का मूल कारण..... उसके मापदंडों की आख्या इतनी हल की नहीं थी। उसका विचार था दो विचारधाराओं का दबाव रहित सहज अनुबन्ध जो परस्पर प्यार और समर्पण तथा समभाव से जी सकें सुख-दुख दोनोंं के बीच, समानाधिकार और कर्त्तव्यों से मिली-जुली एक स्वाभाविक जिन्दगी और दे सके भविष्य को एक सशक्त विलक्षण सन्तति।

क्या हुआ उसे अपना अमीष्ठ नहीं मिला, कम से कम सिसकियों के बीच एक तनावपूर्ण अनैच्छिक जीवन के लिये तो वह बाध्य नहीं। आत्मसन्तुष्टि के बाद भी कभी कभी वह गहरे अवसाद से भर उठती, जब कभी भी उसके चुनौतीपूर्ण जीवन को तिरस्कृत किया उसके जैसी उठती उंगलियों ने। नारी की नारी के प्रति इतनी अधिक संकीर्णता उसे खल जाया करती थी। विक्षुब्ध सी वह ड्युटी-चार्ज देकर अपने निजी- कक्ष में आगई.. अनमनी उदास सी .. । सामने लगे दर्पण में अपने ही प्रतिबिम्ब में उसने देखा......सांवली सी बड़ी-बड़ी आँखों वाली वह लड़की अदृश्य हो गई थी। सफेद अधपके बालों के घेरों में... प्रौढता के चिन्ह उभर रहे थे,उसके शयामल-शयामल गालों पर वह हटकर पलंग पर बैठ गई।

नारी स्वयं नारी की दृष्टि में इतनी हीन और छोटी क्यों हो जाती है यदि वह परम्पराओं से आगे निकल जाना चाहे, तो......। शायद इसलिए उसके प्रदत्त संवैधानिक अधिकार कितने बेमानी हो गये है इन उठती उंगलियों के सर्पदंश के समक्ष....।

उसे लगा, वह कुछ अधिक भावुक हो गई है, जब से वह चेतना से मिली है।

"चेतना" बड़ा सुन्दर नाम पर वह एकदम विपरीत, दब्बू और भीरू। उसे स्मरण हो आया चेतना का विवाह....बन गया उसकी वृद्धा मां का अभावग्रस्त जीवन का आरम्भी , ........ वह सह नहीं पाई एक और क्रूर आघात..दुर्घटना में उसका दामाद शशिकांत चेतना को सदा-सदा के लिये यातनाओं और उलझनों
के मरुस्थल पर अपनी एकमात्र निशानी सौरभ बेटी के दायित्व को सौपकर रोती, बिलखती और तड़फती छोड़ गया।....इस आकस्मिक धक्के ने चेतना के ममता के सभी द्वार बन्द कर दिये थे। पेट की भूख और ममता के दायित्व से विवश चेतना घर की चारदीवारी से बाहर आ गई।

उदार और सदय आलोक जो रिशते में दूर का भाई लगता था, इस आड़े वक्त पर आगे आ गया। उसके यत्न स्वरूप उसे अध्यापन का कार्य मिल गया। धीरे-धीरे अपनी सूझ-बूझ और परिश्रम से वह प्राचार्या के पद पर आ गई। एक सम्मानित पद पर होने के बाद भी चेतना अपने और अपनी बेटी के लिये सामान्य-जीवन न पा सकी ऋणी चेतना भातृत्व-भाव से श्रृद्धानत कितनी बार प्रताड़ित हुई अपनी ही विभागीय -सखियों, आधीनस्थ कर्मचारियों के लुका छिपी आरोपों से ..... ।

उस विधवा मां को भी क्या, कुछ सुनना और सहना नहीं पड़ा था आलोक को लेकर। भातृभाव भीअस्पृशय नहीं रह सका उन उठती उंगलियों के बाण छेदन से।स्मृति मात्र से ही दीपिका की आँखे सथल हो गई, उन दिनों चेतना कितना अधिक रोया करती थी फिर पुनर्विवाह का मार्ग दिखाया दीपिका ने। उसे याद आया जब उसनें चेतना से कहा था, "जीवन के लिये कोई न कोई सशक्त आधार पीठिका तो होनी ही चाहिए। या तो तुम अपने दब्बूपन को त्याग कर इन अप्रिय-तत्वो के समक्ष आकर साहस से सामना करो नहीं तो शादी कर लो यदि कुछ नयापन अतीत के पृष्ठों पर न लिख पाई तो नजाने कितने आलोक तुमसे जोड़े जायेंगे

काल्पनिक किस्सों कहानियों की रज्जू से। तुम तो नयी पीढी़ की स्रजना हो, प्रतिनिधि हो । प्रगतिशील जागरूक आने वाले कल के अंकुरों की जन्मदात्री हो, यदि इतनी बेबस असहाय हो गई तो इन उंगलियों के बढ़ते कसाव के भय से भयभीत उपलब्धियाँ तुम्हारे अभाव कभी कम न कर सकेगी।"

" हाँ, कई बार मैने चाहा है पुनश्च एक नया आरम्भ, पर दीपिका पुरातन संस्कार ग्रस्त ये उठती हजारों उंगलियां मेरा मनोबल तोड़ देती हैं। सच तो यह है कि वह स्क्यं उनसे मुक्त नहीं है, आशंका और प्रारब्ध मायावी ये दो शब्द हमेशा ही मेरी दुर्बलता बनकर आड़े आए हैं।

"मै मानती हूँ मैं और तुम दोनो ही विदूषी और नई पीढ़ीयों की प्रतिनिधि मानी जाती है पर जब-जब भी .. जागृति-स्तम्भ की पाषाण टुकड़ियों ने क्रांतिकारी कदम उठाए तो हमारी ही जाति की हमारे जैसे हाथों की यह उठती उंगलियां क्या हमारे आगे नहीं आ जाती ? " कितनी स्पष्ट स्वीकारोक्ति थी चेतना की जिसे कभी खुल कर कह नहीं पाई दीपिका चेतना से कि वह भी कब उबर पाई है अब तक उन उठती बढ़ती और उभरती वर्तुलाकार भंवर से। एक नहीं हजारों बार उसने भी देखी है अपनी ओर आती ,अपने जैसी हाथों की यह उभरती ..बढती....उठती उंगलियां. ●●●

लेखिका- राजेश रस्तोगी.



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