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@dawriter

आजादी ......!

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आज छोटू बहुत उदास है। खाट के कोमल सन भी उसे कांटे से लग रहे हैं... , चांदनी रात में ऐसा लग रहा है जैसे चाँद, पूर्णिमा की रात को चांदनी बिखरने नहीं, बल्कि ! उसकी खिल्ली उड़ाने के लिए ही इतना चमक रहा है , जैसे आसमान में अनगिनत तारे, उसे कह रहे हों, यही मौका है ! भाग जा, भाग जा ! इस रोज की कीच कीच से दूर अपनी माँ के आँचल में ज्यादा ज्यादा क्या होगा? माँ नाराज़ होगी ना .... दो चार जड़ देगी .... पर आखिर में मान ही जाएगी और अगर तू जाते ही उसके पैरो में गिर कर माफी मांग लेगा न, तो शायद तेरी दशा देख कर माफ भी कर दे .... पर ये एक आखिरी कोशिश है अगर आज चूक गया न ... तो सारी ज़िन्दगी इसी नरक के सड़ना पड़ेगा। वही जिसे 1 साल पहले वो स्वर्ग समझ कर हरिया के साथ एक जोड़ी मैले कुचैले कपड़ो की गठरी और 100 रुपये लेकर भाग कर आया था ।

उस दिन जब हरिया उसे बाबूजी की चक्की पर ले कर गया था तो पहले तो उन्होंने उसे देखते ही ये ये कह कर मना कर दिया था कि ... अरे हरिया ! इस नन्हे से बालक को कहां से उठा लाया ये तो दो घंटे काम कर के ही टै बोल जाएगा, तब हरिया ने ही जोर दे कर कहा था .... " कि बाउजी दो दिन रख कर तो देखिये अगर सही काम न कर पाया तो दो दिन की मजदूरी भी मत दीजियेगा, बस दो " तभी छोटू में भी कैसे उचक कर कहा था कि मालिक आप दो दिन मुझे बस दो बार खाने पर रख लीजिये सो तो मैं कहीं भी किसी को कोने में जाऊंगा। अच्छा चल ठीक है छोड़ जा इसे, कहते हुए बाबूजी ने उसे अंदर आने का इशारा किया और हरिया उसे मन लगाकर काम करने की हिदायत देकर बाबूजी से दो दिन बाद मिलने की इजाजत लेकर अपने काम पर चला गया था ।

आज बाबूजी से उसने एक साल बाद दुकान पर आ कर पूछा था कि आज मैं छोटू के साथ रात को रुक जाऊ परसो सुबह ही गांव जाना है और उसकी बहन का ब्याह भी है, सारी बात उसे बता दूंगा। ठीक है - बाबूजी ने कहा और उसे अपने साथ मोटर साईकल पर बैठा लिया घर पहुंचते ही बाबूजी में छोटू को आवाज़ देनी चाही तो हरिया ने मना कर दिया, ये कह कर "कोई बात नहीं मैं ऊपर ही चला जाता हूं " ऊपर जाते ही उसने एक खाट पर पड़े हुए छोटू को आवाज़ लगाई तो वो कुछ बुझी सी आवाज़ में बोला, कौन ... अरे ! मैं हरिया इतनी जल्दी भूल गया नाम सुनते ही उसने आंखे खोली और उचक कर खड़ा हो गया। छोटू हरिया से पूछने लगा ... " कहां था हरिया , इतने दिन से कोई खैर खबर भी नहीं ली उस दिन से " । अरे ! तुझे कुछ बताने आया हूं जा पहले एक खाट ले आ दोनो लेट कर बात करते है छोटू भाग कर खाट ले आया और बोला "अब बता क्या बात है , माँ कैसी है ....? तुझे कुछ पता है क्या? और छोटी मेरे बारे में कुछ पूछती है या नहीं"। सब बताता हूं , पहली बात शन्नो की शादी है अगले हफ्ते, क्या? सच मे .... सुनते ही छोटू उछल कर बोला और दूसरी बात ... माँ ने तुझे माफ भी कर दिया। अब तू ये बता तुझे क्या हुआ क्यों रो रहा था। नही .... मैं कहाँ? मैं तो नहीं.... नज़रे चुराते हुए छोटू बोला। हरिया ने कहा .... बता न मुझे क्या पता मैं कुछ कर पाउ। क्या बताऊँ एक साल से बस कोल्हू का बैल बन गया हूँ और कुछ नही हरिया ने कहा पूरी बात बता हुआ क्या? अब छोटू ने बताना शुरू किया उस दिन जब तू मुझे छोड़ कर गया न !

बाबूजी ने सबसे पहले जब पूछा था कि कहां से आया है " गोंडा जिला " नाम सुनते ही पूछा था की भूख लगी है?
उस दिन से आज 1 साल हो गए बाबूजी ने मुझे ना ही कभी धमकाया , न ही ना ही ऊंची आवाज में बात की।

उस दिन वो मुझे अपने साथ रात को चक्की से घर ले आये थे मैंने कई बार मना भी किया था कि मैं बाहर ही चबूतरे पर सो जाउगा .... पर बाउजी ने ज़बरदस्ती मुझे कहा था .... घर चल, खाना खाकर, आराम से सोना छत पर ... तारो की छांव में। यहां बहुत मच्छर हैं, कहीं ऐसे में अगर तुझे मलेरिया हो गया तो परसो हरिया को क्या जवाब दूंगा? कहते हुए ... उसके सिर पर थपकी मारी और अपनी मोटरसाइकिल पर उसे पीछे बैठा लिया। बाबूजी का व्यवहार देख कर मैंने बिल्कुल भी न सोचा था कि घर के बाकी सदस्यों का व्यवहार इनसे उलट होगा। जैसे ही वो घर के बरामदे में घुसे थे बीबी जी मे चिल्ला कर कहा था ये किसे उठा लाये, अब ??

अरे कोई नहीं..... , चक्की पर मुझे जरूरत थी एक लड़के की, सो हरिया से कहा था एक लड़के के लिए वही पहुंचा गया है इसे।

पर .... इसे देख कर तो नहीं लगता ... ये कुछ कर भी पायेगा, एक कनस्तर भी उठा ले तो गनिमत समझो ।

अरे ! ऐसी बात नही हैं.... भागवान, आज सुबह से ही ये मेरे साथ दुकान पर है और ये अपने शरीर से ज्यादा काम करता है। एक दिन तुम रख कर देखो , यकीन हो जाएगा .... अपने पैर धोते हुए बाबूजी ने कहा। ठीक है .... ठीक है..... ! ज्यादा सिर मत चढ़ाओ, मुझे सीढियो में बैठे हुए को देखते हुए बीबी जी ने कहा था।

और अगले दिन से हो मेरे बुरे दिन शुरू हो गए। क्योंकि घर में भैयाजी की शादी का रंगाई पुताई का काम चल रहा था, सो मेरे लिए तो जीवन का सबसे व्यस्त दिन था ।

सुबह से मजदूर मिस्त्रियों के पीछे भाग दौड़, कभी ये रंग ला दो, कभी चूने का कट्टा, कभी ब्रश। कभी ये तो कभी वो। जैसे ही मजदूरों से निजात मिली, तो बीबीजी तुरंत कहती, अरे छोटू ! बैठा काहे हैं चल जल्दी से ये बर्तन साफ कर दे, बर्तन करते ही ..... कपड़ो का ढेर धुलने का इंतज़ार कर रहा था।

खाना भी उस दिन मैंने शाम को खाया था। जैसे ... तैसे , घर मे रंगाई पुताई का काम निपटा, मुझे लगा जान छूटी .... अब तो रोज सुबह ही बाबूजी के साथ चक्की जाया करूँगा और रात को ही आया करूँगा। पर अगले दिन जैसे ही बाबूजी ने आवाज़ लगाई छोटू मोटरसाइकल पर कपड़ा मार और चल।

अन्दर से बीबीजी दौड़ती हुई आयी "क्या हुआ जी छोटू को काहे ले जा रहे हो। अभी ब्याह शादी का काम है घर मे 15 दिन भी तो नहीं बचे हैं.... उसमें ऊपर से आज रीना भी ससुराल से आने वाली है, आप जानते हैं, उसके साथ छोटा बच्चा है दस टहल काम पड़ते हैं अगर ये उसे संभाल लेगा तो हम कुछ काम निपटा लेंगी "।

अच्छा ठीक है , जैसी तुम्हारी मर्ज़ी .... । कहते हुए बाबूजी घर से निकल गए और उस दिन वो काला दिन जिसे मैं कभी भूल ही नही पाया हूं दोपहर को दीदी जी आ गयी थी उन्हें भैया जी स्टेशन से ले आये थे। आते ही उन्होंने कहा माँ मैं हाथ मुँह धो आती हूँ आप ज़रा चाय चढ़ा दो और हां मुन्ने का दूध भी बना देना। पर बीबी जी ये दोनों काम मुझे सौप कर खुद नाती के साथ खेलने बैठ गयी सच बड़ा ही नटखट था, वो ! और मैं रसोई घर मे चाय और मुन्ने का दूध बनाने चला गया । एक ट्रे में चाय और दूध ले कर मैं आया ही था कि दीदी जी भी आ गयी। उन्होंने कहा ले ये दूध तू ही मुन्ने को दे दे हम दोनों चाय पी ले जैसे ही उसने दूध की बोतल मुन्ने के मुंह को लगाई उसने जोर जोर से रोना शुरू कर दिया..... मैं डर गया और बोतल वापस बाहर खींच ली। बीबीजी मे मेंरे हाथ से बोतल छीनी और कहने लगी, हे राम ! कितना गर्म दूध??? बच्चे का मुँह जल गया। तुझे इतना भी नहीं पता कि इतने छोटे बच्चे को गुनगुना दूध दिया जाता है, कहते ही पास में पड़ी हुई हॉकी उठाई और मेरी पीठ पर बजानी शूरु कर दी। अगर उस दिन दीदी जी ने, न बचाया होता तो मेरी दो चार हड्डी टूटनी तो तय थी ।

मां ! " ये क्या कर रही हो इतना छोटा है ये, इसे क्या पता दूध कितना तेज़ करना है? मैं आपको कह कर गयी थी न कि इसे दूध दे देना "कहते हुए दीदी जी ने बीबीजी के हाथ से हॉकी छीन ली ।

हाँ .. हाँ ... ! सारी गलती मेरी ही है, कहते हुए बीबीजी ने मुन्ने को उठा लिया और दीदी जी ने मुझे बाहर जाने का इशारा किया। इस सब मे बीबीजी ये भी भूल गयी थी कि मैने दोपहर को दीदी जी के आने की तैयारियों में खाना भी नही खाया था, पर इतना सब होने के बाद मेरी हिम्मत नहीं थी कुछ भी कहने की।

शाम को अंधेरा होते ही बीबीजी ने मुझे कहा "तू छत पर जा मैं खाना वही भिजवा दूंगी तू नीचे मत आईओ " समझ तो मैं भी गया था कि ये सब उन्होंने बाबूजी को पता न चले इसलिए कहा था। मैं चाहता तो एक मिनट में दूध का दूध औऱ पानी का पानी कर सकता था, पर मैने सोचा जाने दो क्यों बखेड़ा खड़ा किया, पर शायद वो मेरी सबसे बड़ी गलती थी अगर उस दिन मैंने आवाज़ उठा दी होती तो बात इतनी न बिगड़ती। क्योंकि ! उसके बाद तो रोज का नियम बन गया था मेरे साथ मार पीट करने का। कभी बीबीजी तो कभी भैया जी जब तक दीदी जी थी वो मुझे बचा लेती, पर उनके जाने के बाद तो कोई रोकने वाला ही नहीं था ।

उस रात जब मैं छत पर पहुंचा तो मन बहुत उदास था और नींद कोसो दूर। आसामान में टकटकी लगाए, मैं सोच रहा था कि ये असंख्य तारे भी तो कभी आपस मे लङते होंगे और फिर ये एक दूसरे को मारते पीटते भी होंगे शायद जो हमे टूटते हुए तारे कभी कभी दिखाई देते है वो लड़भिड़ कर टूटे होते होंगे या फिर लड़ाई में उन्हें तोड़ कर गिरा दिया जाता होगा, पर पता नहीं क्यों? उस दिन मुझे माँ बहुत याद आ रही थी डाँटती तो भी थी मुझे ...... पर शायद उसने कभी मुझ पर हाथ तो नहीं उठाया था और उसकी हर डांट मेरी किसी बड़ी गलती पर होती थी। बेवजह तो कभी नहीं शायद वो माँ थी , इसीलिए इन्ही सब विचारो की नदियों में गोते खाते कब मेरी आँखों मे दिखते हुए तारे नदियों की लहरों में हिचकोले खाने लगे और जल्दी ही मेरी आँख लग गयी। फिर धीरे से एक आवाज़ मेरे कानों में पड़ी और नींद खुल गयी वो दीदी जी थी मैं हड़बड़ाहट में उठा, मुझे लगा बाबूजी आ गए होंगे और उन्हें सारी बात पता चलने पर अब वो भी शायद मुझ पर टूट पड़ेंगे, पर दीदी जी मे कहा, आराम से छोटू। अंधेरे में चाँद की रोशनी में मैने देखा दीदी जी हाथ मे कुछ लिए खड़ी थी वो मेरे लिए खा ना लायी थी। उन्होंने थाली मेरी ओर बढ़ा दी और कहने लगी खा ले भूख लगी होगी, भुख तो बहुत लगी है पर आज मन भर गया है, दीदी जी ! कहते हुए मेरी आँखें छलक आयी थी। उन्होंने मेरे सर पर हाथ रखा और कहने लगी मन छोटा न कर, रे छोटू, खाना खा कर हल्दी वाला दूध पी ले .. आराम मिलेगा। मैने पहली बार माँ के बाद किसी ओर की आंखों में अपने लिए प्यार देखा था। अच्छा, अब मैं जाती हूँ .... मुन्ना उठ गया तो सब जाग जाएंगे। तू भी खा कर सो जा .....। ठीक है ! दीदी जी , कह कर मैने थाली ले ली ।

उसके अगले दिन बीबीजी ने सुबह ही आवाज़ दी और ऐसे बर्ताव किया, जैसे कल कुछ हुआ ही न हो। हां अब भी कल की ही तरह उन्होंने मुझे बाबूजी के सामने आने नहीं दिया, कभी किसी काम से बाज़ार भेज दिया, कभी पेड़ो में पानी देने। बेवजह के सारे काम उन्होंने मुझसे सुबह सुबह करा लिए। कभी कपड़े धोने में लगा दिया, कभी बर्तन, कभी कुछ तो कभी कुछ।

शाम तक सब सामान्य हो गया मेरे शरीर का दर्द भी और बीबीजी का बर्ताव भी ।

ऐसे ही कुछ दिन बीत गए, शादी नजदीक आ रही थी और अब तो मेरा काम और भी बढ़ गया। जैसे ही कोई काम खत्म होता, बीबीजी मुझे मुन्ने को थमा देती .... ले , अब इसे बाहर तक घुमा तो ला . ..। एक दिन ऐसे ही दीदी जी नहाने गयी हुई थी, मुन्ना बहुत रो रहा था .... और रोते रोते उसने, पास ही पड़ा टी वी का रिमोट उठा कर जोर से जमीन पर दे मारा। बीबीजी भागते हुए आयी और रिमोट के दो टुकड़े देख मुझे गाल पर तड़ातड़ दो तीन रख दिये। मैं कहता रहा मैने ये सब नहीं किया, तो उन्होंने कहा " तूने जब इसे रिमोट लिए देखा तो छीन क्यो न लिया .... " तेज़ आवाज़े सुन कर दीदी जी भी भागते हुए आयी और मेरा गाल देख कर सब समझ गयी। उन्होंने जल्दी से रिमोट उठा कर उसे जोड़ दिया और चला कर देखा तो वो सही था , फिर कहने लगी ... " मां ! आप बेवजह ही बेचारे को डांट रही हो चल तो गया ये " बीबीजी , दीदीजी को घूरते हुए निकल गयी ।

अब क्योंकि भैया जी की शादी को भी 5 दिन केवल शेष रह गए थे, हर समय कोई न कोई मेहमान घर मे आया रहता उनकी चाय पानी, जाते समय उनको चौराहे से रिक्शा या ऑटो कराना बस अब यही मेरा काम रह गया ।

एक दिन सुबह सुबह बीबीजी के चिल्लाने की आवाज़ आयी .... छोटू उठ जा ......, सारे हलवाई आ गए हैं, और तू दिन चढ़े तक सोया पड़ा है। मैं भी हड़बड़ी में उठा और नीचे पहुंच गया तो देखा सारे बरामदे में कढ़ाई भगोने और बोरिया रखी है। बीबीजी ने कहा चल छोटू ये सारी बोरिया एक कोने में लगा दे, मैं आगे बढ़ा जैसे ही पहली बोरी उठायी वो मुझसे उठी ही नहीं और सारे बरामदे में उसके आलू बिखर गए ...... । पास ही खड़े भैया जी ने मेरे सिर पर दो हाथ मारे ...... जिससे मेरा सर घूम गया और मैं वही धम्म से बैठ गया । बीबीजी ने डांट कर कहा , " चल उठ खड़ा हो , काम का न काज का ..... ढाई मन अनाज का .... । एक बोरी भी नहीं उठती , तभी सारे हलवाई भी बोल पड़े बहन जी छोटा सा बच्चा ही तो है और आप एक बोरी उसे उठाने को कह रहे हो । ये तो खुद उनके वजन के बराबर होगा फिर जल्दी से सबने मिलकर आलू इकठे किये और बोर में भर कर उसे साइड लगा दिया ।

अब मैं दो दिन तक हलवाइयों के ही साथ रहा उन्हें कभी कुछ चाहिए, तो कभी कुछ। उनके साथ काम करने में एक फायदा और भी था ...... कि मुझसे कोई गलती होने पर वो लोग मुझे समझाते थे, न कि मारने दौड़ पड़ते। एक बार के लिए सोचा ...., ये नौकरी छोडकर, इन्ही के साथ काम कर लूं। फिर लगा .... खामखा इन लोगो पर ये इल्ज़ाम लग जायेगा कि तुम हमारे नौकर को बहला कर ले गए। तो अब दो दिन शांति से ख़त्म होने के बाद जिस शाम को भैया जी की शादी है और उसकी तैयारी जोरो शोरो से चल रही थी .... । इसी बीच ...... बाबूजी ने आवाज़ लगाई, छोटू .... अरे ओ छोटू ...... ले मैं दौड़ता हुआ गया, आपने मुझे बुलाया बाबूजी, हां .... ले ये तेरे शाम को बारात में पहनने के कपड़े, देख ले नाप सही है क्या? अगर कुछ ऊपर नीचे है तो बता दे मैं बदल दूंगा। ठीक है बाबूजी, कहकर छोटू जैसे ही जाने को मुड़ा, पीछे से बीबीजी जोर से बोल पड़ी, क्या ज़रूरत थी? उसके लिए इतने महँगे कपड़े लाने की। मैंने सूरज के कुछ पुराने कपड़े निकाल रखे थे इसे देने के लिये . .... । मैं थोड़ी देर के लिए वही खड़ा रहा कि बाबूजी कभी मुझे ये कहें ..... की ये रहने दे, वही पुराने ही पहन लेना। पर बाबूजी ने कहा, अरी भागवान ... कोई फर्क नही पड़ता, इन सब छोटी छोटी बातों से और फिर सबको पता भी तो चले, हम छोटू को भी ऐसे वैसे कपड़े नहीं पहनाते। तू जा छोटू, नाप देख ले कपड़ो का ...... । वाकई मैंने अपनी ज़िंदगी मे इतने अच्छे कपड़े कभी पहने नहीं थे, मैं बहुत खुश हो गया और दौड़ता हुआ बाउजी के पास। एक दम सही है .... बाबूजी ! मेरे चेहरे की चमक देख कर बाबूजी ने कहा, शाम को भैया जी की शादी में पहनना, फिर तुम्हे बारात में जम कर नाचना भी तो है। कह कर बाबूजी मेरे सर पर थपकी दे कर चले गए और मैं सातवे आसमान पर।

शाम को सब लोग भैया जी की शादी में गए ... मैंने भी खूब मस्ती की। खूब खाया और भाभी जी के विदा करा कर लाने से पहले ही बीबीजी के साथ घर आ गया। उन्होंने कहा था कि बहूजी के घर आने से पहले उनके स्वागत की तैयारी करनी है सो मैं भी घर आकर लगभग 4 बजे होंगे, आंखों में नींद भरी थी ..... सोना चाहता था। तो छत की तरफ बढ़ गया बीबीजी बोली कहाँ जाता है ..... रे ! मेरे साथ पहले सब निपटने दे फिर चले जाना। मैं भी जल्दी जल्दी से घर की साफ सफाई में लग गया, दिन में मेहमानों ने भी घर मे कम आफत नहीं मचा रखी थी हर कोने में चाय के अधपिये कप बिखरे पड़े थे, खाने की पत्तल दोने सब कुछ समेट कर एक बोरे में भरा, झाड़ू पोछा लगाया। तब तक लगभग दिन निकल आया ..... बीबीजी अंदर मेहमानों के जाने के सामान बांधने लगी और मुझे बोली जा झटपट नहा धो कर आ जा .... । तब तक मैं भी नहा धो लू ....। फिर बाकी खाना पीने का काम देखते हैं। अच्छा जी ! कह कर मैं भी ऊपर आ गया और अपने कोने में बिना छत , केवल दीवारों वाले गुसलखाने में नहाने लगा। फिर नीचे पहुंचते ही बीबीजी ने कहा एक एक कप दोनो की चाय बना ले ..... बाकी सब तो अभी सोये हुए है मैं फ़ोन कर के पूछ लेती हूं, अभी और कितनी देर लगेगी विदाई करा कर लाने में । मैं जैसे ही चाय बना कर लाया गांव से आई हुई बूढ़ी मासी जी बाहर आ गई और आवाज़ देने लगी बहु कहाँ है जरा एक प्याली चाय पिला दे तो पेट मे कुछ प्रेसर से बन जाये। कब से इंतज़ार कर रही हू .... सुनते ही बीबीजी ने मेरा चाय का कप उन्हें पकड़ा दिया और कहने लगी, तू अपनी और बना ले। मैने अच्छा जी कह कर रसोई की तरफ रुख किया तो अंदर से मुन्ने के रोने की आवाज़ आने लगी..... मैं दौड़ता हुआ गया अंदर। शायद उसे भूख लगी थी अपना हाथ बार बार मुँह में दे रहा था। मैंने बाहर आ कर कहा बीबीजी उसे भूख लग गईं शायद ! हाँ जा , तू दौड़ कर दूध बना ले। मैं देखती हूं अभी तो रीना को आने के भी समय लगेगा। मैं तो इसे रात को आराम से सो जाएगा इसीलिए लायी थी, कह तो रहे थे आधे घंटे में पहुंच जाएंगे। मै जल्दी से दूध लेकर बीबीजी के पास पहुंचा, ये लो बीबीजी ने कहा तू ही पिला दे .... और मैं उनकी शक्ल देखने लगा मैंने कहा आप देख लीजिए , तेज़ तो नहीं है न, उन्होंने हाथ लगा कर देखा, ठीक है ! पिला दे ..... कह कर चली गयी तो वही हाथो हाथ मुन्ने राजा ने अपनी पजामी भीगा दी। मैने जल्दी से दूध खत्म कर के बीबीजी को बताया। उसके कपड़े बदलने को उन्होंने कहा जा बाहर ले आ उसे और कहने लगी। मैं पानी डालती हूँ ..... तू इसे धो दे। मैंने आश्चर्य से कहा, जी मैं ..... मैने तो आज तक कभी भी ये सब नहीं किया। अरे ! तो क्या ? ले ज्यादा बाते मत बना, काम कर। मैं पानी डालती हूँ और फिर उसे लेकर अंदर चली गयी, ये कहते हुए इस पजामी को धो कर छत पर डाल देना। उस दिन , मैंने पहली बार ये सब किया था। जैसे ही मैं सब करके नीचे आया बाहर से आवाज़ आयी , दुल्हन आ गयी .......

बीबीजी भागी मुन्ने को मुझे सौप कर और मैं बिना चाय पानी के वही बैठा रहा ।
दुल्हन आ चुकी थी, और मेरा मन इस घर से जा चुका था। मैंने देखा बहु जी सब बड़ी बूढ़ी औरतों के पैर छू कर पैसे दे रही हैं, सबसे मिलने के बाद बाबूजी ने मुझे आवाज़ लगाई और मैं मुन्ने को दीदी जी को सौंप कर बाहर भागा, उन्होंने बहु जी से कहा ...... ये हमारा छोटू ! और बहू जी ने मुझे 100 रुपये का नोट पकड़ा दिया मैं हैरानी से बाबूजी को देखने लगा, वो बोले, कोई बात नहीं तू घर में छोटा है रख ले।

फिर धीरे धीरे कुछ दिन बीत गए और दीदीजी भी जाने की तैयारी करने लगी। शाम को ही उनकी गाड़ी थी भैया जी के साथ समान गाड़ी में रखते हुए मन बहुत भारी हो रहा था। दीदी जी मेंरे सर पर हाथ रखा और मेरे लाख मना करने पर भी 100 रुपये का एक और नोट मेरी जेब मे डाल दिया और अब मैं 200 रुपये की संपत्ति का मालिक बन गया ।

बाबुजी मुझसे अक्सर पूछते भी , की छोटू तेरा बहुत हिसाब हो गया है। चाहे तो ले ले, या घर भिजवा दे। मैं उनसे हर बार यही कहता कि जब घर जाऊंगा तो ये लेकर ही जाऊंगा अभी कोई खास जरूरत तो नहीं है ।

पर आज सोच रहा हूं, कि तेरे साथ गांव चला ही जाऊं पर बाबुजी से पैसे मांगने में डर लगता है। क्या करूँ ....। सुनते ही आंखों के कोरो से बहते हुए आंसुओ को साफ कर के, हरिया ने कहा, कल का दिन है .... तेरे पास । परसो भोर में ही गाड़ी है, तू चाहे तो बाबूजी से बात करके कह दे ... तेरे कुल मिला कर तीस हजार रुपया बैठते है साल भर के .... हे राम ! इत्ता पैसा इत्ते में तो मैं शन्नो की शादी में खूब मदद कर सकता हूँ, चल बाकी कल देखते हैं।

इतना सुनते ही सुरेश बाबू सीढियो से उतर आए। अगले दिन छोटू ने बहुत कोशिश की बाबूजी से बात करने की पर सुबह बाबूजी जल्दी निकल गए और शाम को छोटू के ऊपर जाने तक नहीं आये थे ।

पर छोटू को जाने क्या हुआ उठा उसने बत्ती जलाई और एक थैले में अपना सामान भरा, जिसमे उसके एक जोड़ी भैया जी को शादी के नए कपड़े थे और एक जोड़ी घर के, और जेब में अपने वही 200 रुपये लेकर नीचे सीढियो से उतर ही रहा था ....... कि उसे अंधेरे में एक साया सा दिखाई दिया। वो डर गया. ... कही भैया जी .......। नहीं ..... नहीं ...... वो वापस ऊपर जाने को पलटा तो उसके कंधे पर किसी ने हाथ रखा। छोटू, अरे ! ये तो बाबूजी है वो पलटा ," कहाँ जा रहा है , रे ! " जी.... कुछ नहीं घबराया हुआ सा, छोटू बहाने ढूंढने लगा, जी ......जी..... मैं तो बस, बाहर का ताला देखने आया था। ठीक से बंद भी है ...... या नहीं ! " थैला लेकर " सुनते ही, छोटू चुप हो गया और तेरे पैसे, वो नहीं लेकर जाएगा क्या ? शन्नो के ब्याह में खाली हाथ जाएगा। सुनते ही अधेरे में भी उसकी आंखे चमक उठी। ले, ये तेरे पूरे तीस हजार रुपये, ध्यान से रख ले साल भर की कमाई है ये। और ये 500 रुपये किराये के, लेते ही छोटू फफक पड़ा ।

बाबूजी ने उसे बाहर तक विदा किया और रिक्शा करके जाने को कह कर चले गए ।
आज छोटू आज़ाद था अपनी माँ के पास और अपने गांव जाने को ।।

#Life



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