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@dawriter

अनसुलझा चेहरा

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अनसुलझा चेहरा
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सुबह के करीब सात बजे होंगे जब बाजार जाते वक्त मेरी नजर सड़क किनारे मचान पर बैठे मयंक के चेहरे पर पड़ी। वो उदासी के बादल समेटे अकेला बैठा अखबार पलट रहा था। उसका चेहरा पता नहीं क्यूं मुझे खींचने लगता था जब भी मैं उसे देखता था। जैसे मेरा अंतर्मन कहने लगता कि उस चेहरे को मैं किताब की तरह पढूं। जैसा मैंने उस दिन किया भी।

मैंने देखा ,उसकी नजरें अखबार के लिखावट पर टिकने की कोशिश तो कर रही थी पर वो मध्य रास्ते ही किसी सोच में डूबती हुई परावर्तित हुए जा रही थी जो वस्तु को धुंध कर रही होगी शायद उसकी नजरों में।

कुछ था जिसे वो सबसे छुपा लेना चाह रहा था, कुछ था जिसे वो अपनी झूठी और बनावटी मुस्कुराहट तले दबा देना चाह रहा था। पर आँखें कभी झूठ नहीं बोला करती हैं ये बात मयंक भी अच्छी तरह जानता था। चाहे खुशी हो या जिंदगी का अनमोल तोहफा 'गम' ,सब आँखों से साफ-साफ देखा जा सकता है। जिसे हमें समझने वाले अच्छी तरह से पढ़ सकते हैं।

हालांकि मयंक जानता था कि उसकी ख्वाहिश अगर मंजिल पाती है तो कुछ अपनों पर कहर बन कर टूटेगी, और यह एक काला अध्याय भी साबित होगा। ये ख्वाहिस क्या हो सकती है औरों की नजर में इससे उसे कोइ गुरेज नहीं वो सिर्फ उसे ही पता था। इस जीवन मंच पर चंद अपनों के लिए ही सही वो हँसता तो था। पर कुछ फैसले जिंदगी के हाथों ली जाती है जिसके सामने इंसान नतमस्तक खड़ा हो जाता है।

वो जानता था अगर वो खुद को दुनिया की पंक्ति से अलग करेगा तो वो अकेला ही रह जाएगा,लेकिन फिर भी वो अकेलेपन को ही बेहतर मानता था भीड़ में चलने की बजाय। उसकी इस उदासी में भी उसे समझने वाले बहुत थे जो हर वक्त मयंक की खुशी से ज्यादा उसके गम के भी साझेदार थे। यही वजह थी कि वो चंद अपनों के साथ अपना दर्द साझा कर पाता था और यही उसकी ताकत भी थी। लेकिन पता नहीं क्यूं नए रिश्तों से वो भागा-भागा फिरता था। उसे किसी अंजान से नजदीकी बनाने में एक डर सा लगा रहता था,जैसे ये मिलना उसे पश्चाताप के सिवा कुछ नहीं देगी इस भाव से वो संतुष्ट था। उसके नजदीकी बनने की चाहत बहुतों में थी पर मयंक खुद को उनलोगों के सामने ऐसा दर्शाता जैसे वो बहुत ही मतलबी और कठोर इंसान हो। वो अनसुलझी पहेली बना खुश था। जिसे सुलझा हुआ देखने की चाहत ना उसे थी ना हीं किसी और को। औरों को हो भी क्यूं भला ?

मयंक के ऐसा व्यवहार करने से लोग उनसे धीरे-धीरे दूरियां बना लेते थे, और मयंक भी यही चाहता था। लेकिन वो सिमट के रहना तो चाहता था पर उस सूर्य की तरह जो खुद को जला कर उससे निकली लौ से दुनिया रौशन करने की हसरत रखा जल रहा है। भले इसकी रौशनी फिलहाल इतनी फैल नहीं पा रही हो। उसे किसी हमदर्द की जरूरत नहीं,किसी अपनों की जरूरत नहीं। अब शायद मयंक के नजरों में अपनों की नई परिभाषा ने घर कर लिया था,क्यूंकि वो जानता था एक महल के खंडहर होने की "लीला" क्या होती है,वो जानता था एक बादशाह से रंक बन जाने की कहानी क्या होती है। इन कहानियों को वो किसी की जुबान से सुना या किसी किताब में पढा नहीं था बल्कि अपनी आँखों से "मतलबी दुनिया" नामक उपन्यास के मुख्य अध्याय को झेल चुका था।

वो जानता था कि आज के जमाने में अपनों का सही अर्थ क्या है। उसे तो बस अपना समाज और उनसे मिली इज्जत ही प्यारी थी,बहुत ही सीमित हो चुका था वो और उसकी जिंदगी। वो जान रहा था कि खुद के कर्म को खुद ही किया जा सकता है ना कि अनापेक्षित आशा कर के किसी पर बोझ बन कर। बेहत्तर है कि उस दुख को खुद तक ही सीमित रखा जाए जो लोगों तक पहुंच कर उसे भी दुखी कर दे।

दुनिया की चकाचौंध से अलग अपने सिद्धांतों पर चलने वाला मयंक जिसे अंधेरों से ऐसा लगाव जैसे वो एक दूसरे के पूरक हों। एकांत में खुद से बाते करते हुए मैंने बराबर देखा था उसे, जिस वार्तालाप में शायद मायूसी जरूर शामिल होती हो मयंक का साथ दे रही होगी।

उसे बनावटी रौशनी प्यारी नहीं थी जो किसी विद्युत से चालित हो उसे तो प्राकृतिक प्रेम ने घेर रखा था अपने मोह-जाल में। वो जान गया था कि जो हमारी "मौनता" महसूस कर पाते हैं बस वही हमारे अपने हैं वर्ना रिश्तेदारी तो आज कल व्हाट्सएप के वार्तालाप तक ही सिमट कर रह गई है। जिसकी पूर्ती शायद प्रकृति से ही जुड़कर की जा सकती है आज। बस प्रकृति प्रेम ही आदमी को एक जीवंत एहसास करा सकती है।

उसे पिछले साल का जन्मदिन याद आ रहा था जब जीवन में पहली बार उसका जन्मदिन मना था वो अचानक अपनों का प्यार देख भाव-विभोड़ हो उठा था। उसके आँखों में उस दिन खुशी की चमक को साफ-साफ देखा जा सकता था जिसे मां-बाप का प्यार क्या होता है आज तक नहीं पता था,अचानक से इस छोटी सी खुशी ने मानो उसका हर ख्वाब ही पूरा कर दिया था उस दिन। उसके मां-बाप तो मौजूद थे दुनिया में पर परिवारिक तालमेल कहीं ना कहीं बिगड़ा हुआ था जिसे ना वो जताना चाहता था ना ही दिखाना चाहता था। शायद वो भी किसी के आशा पर खरा नहीं उतर पाया हो और खुद को दोषी मान रहा था।

वो काली अंधेरी रात को पसंद करने लगा था अब। जिसे रौशनी से नफरत करते मैं आज-कल देख रहा हूँ, वो जिंदगी में कुछ खास करेगा या ना करेगा ये तो कोइ नहीं जानता पर वो खुद में संपूर्ण है और सफल है ,ये उसने साबित कर दिया है।

उसकी ताकत उसका "अकेलापन" ही है ये साफ-साफ उसकी नजरें आज बता रही थी मुझे। वो एक बार फिर आज जन्मदिन नहीं मना कर भी खुश रहेगा।
खैर,अब तक मैं उसके करीब पहुँच चुका था और मयंक मुस्कुराते हुए मुझे बगल में बैठने का इशारा कर रहा था।



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