LIFE

बच्चों का बचपन जी लें...

rita1234   884 views   3 days ago

दैनिक जीवन की भागदौड़ भरी दिनचर्या में हम रोज़ बेहद कीमती पलों को नही जी पाते। वो है हमारे “बच्चो का बचपन” जिसकी कसक बाद में बेहद टीसती है।

निशा तुम डरती क्यों हो??

rita1234   1.03K views   4 days ago

ससुराल में अपनी जिम्मेदारियों को बखूभी निभाती निशा को सासु माँ से मायके जाने की इजाज़त लेने में बहुत डर लगता है

उस गाँव की स्त्रियां

nidhi   157 views   5 days ago

इन क्षेत्रों में कुछ प्रतिशत ही परिवार हैं जो इस मानसिकता से दूररहते हैंपर ज्यादातर लोगो में ऐसी छोटी मानसिकता वाले कीड़े ही दिमाग में बिलबिलाते है।।।

कैसी भूल..

Kavita Nagar   1.30K views   2 weeks ago

अपनी शिक्षा के सहज सम्मान की इच्छा लिए शिक्षा सपनों की ससुराल के ख्बाब देख रही थी

मूक दर्शक

poojaomdhoundiyal   25 views   4 weeks ago

कितनी बार होता है कि हम किसी अच्छाई या बुराई को देख कर उसे अनदेखा कर आगे बढ़ जाते हैं। या फिर रुकते तो हैं पर बस एक मनोरंजन की आशा से। अगर मनोरंजन हो तो अच्छा वरना मूक दर्शक बन आगे बढ़ जाते हैं। कितना सही है हमारा ये व्यवहार?

हां मैं स्त्रीलिंग हूं

poojaomdhoundiyal   77 views   1 month ago

क्या दोष है उस भ्रूण क्या? यही की वो स्त्रीलिंग है। यही की वो कुछ कमजोर और हीन मानसिकता के लोगो से जुडी है। जो एक स्त्रीलिंग को पनपने न देने में अपना पौरुष समझते हैं।क्या सोचता होगा वो भ्रूण जब वो ऐसी परिस्थितियों से गुजरता होगा। उसकी भावनाएं कैसी होती होंगी।वो क्या कहना और क्या सुनना चाहता होगा ।

श्रद्धा-सुमन

falguniparikh   133 views   1 month ago

कभी कभी खुदकी गलती ही हमें जीने नहीं देती

યાદ

pravinakadkia   164 views   1 month ago

એક માતાનાં મનોભાવની વાત છે. હૃદય્સ્પર્શીવાર્તા જરૂરથી વાંચશો.

खौफ की खाल (नज़्म)

Mohit Trendster   1 views   1 month ago

खौफ की खाल उतारनी रह गयी, रुदाली अपनी बोली कह गयी... रौनक कहाँ खो गयी? तानो को सह लिया, बानो को बुन लिया। कमरे के कोने में खुस-पुस शिकवों को गिन लिया।

"फुर्सत के दो पल मिल जाते काश"......

vandita   380 views   1 month ago

आज के समय मे लोग इतना व्यस्त हो गए है कि उनके पास अपने लोगों के लिए वक्त नहीं है। ऐसा ही कुछ मेरी इस कहानी में आपको पढ़ने को मिलेगा।

अनसुलझा चेहरा

gauravji   33 views   1 month ago

वो काली अंधेरी रात को पसंद करने लगा था अब।  जिसे रौशनी से नफरत करते मैं आज-कल देख रहा हूँ, वो जिंदगी में कुछ खास करेगा या ना करेगा ये तो कोइ नहीं जानता पर वो खुद में संपूर्ण है और सफल है ,ये उसने साबित कर दिया है

दो बेज़ुबान - चीकू और मैं।

nidhi   40 views   1 month ago

मुझे रोज़ चीकू याद आता है..उसकी बड़ी बड़ी लाल आँखें याद आती हैं जो चीख चीख कर मुझसे पूछ रही हैं तुमने मुझे आज़ाद क्यों नही कराया??

ख्वाहिशों वाली खिड़की

avinashsurajpur   204 views   2 months ago

"आसमान में आज काले काले बदल थे, न तारो के कोई निशान थे न चाँद था. फैली थी अंदर से चीखती हुई, अनंत सी ख़ामोशी. और बेजान सी हो गयी थी, ख्वाहिशों कि खिड़की भी."

क्यों करूँ करवाचौथ

Maneesha Gautam   179 views   2 months ago

आप करवाचौथ क्यों करती हैं ओर यदि नहीं करती तो क्यों नहीं....मुझे आपके जवाब का इंतजार रहेगा।

जिंदगी की परीक्षा

kavita   276 views   2 months ago

माँ की मृत्यु के उपरांत नितांत अकेले पिता द्वारा पुत्र के पालन पोषण में उभरती वस्तु स्थिति एवम पिता पुत्र के बीच के प्रेम का अनूठा वर्णन

निराशा

Rajeev Pundir   250 views   2 months ago

दूसरों की मजबूरियां किस तरह हमारी समझ में नहीं आती और हमारे लिए एक पहेली बन कर रह जाती है , पढ़िए इस कहानी में I

जीवन में विलेन ढूँढने की आदत (लेख)

Mohit Trendster   20 views   2 months ago

बचपन से हमें बुराई पर अच्छाई की जीत वाली कई गाथाओं का इस तरह रसपान करवाया जाता है तो कोई भी बुरा नहीं बनना चाहता। अब सवाल उठते हैं कि अगर कोई बुरा नहीं तो फिर समाज में फैली बुराई का स्रोत क्या है? दुनिया में सब अच्छे क्यों नहीं?

समूह वाली मानसिकता (लेख)

Mohit Trendster   2 views   2 months ago

समूहों की रेखाओं में उलझे समाज का विश्लेषण।

अपवित्रता??....... वो पाँच दिन (पीरियड्स)

Maneesha Gautam   44 views   2 months ago

जिस खून को लोग अपवित्र समझते हैं वे यह क्यों नहीं समझते कि 9 महीने तक माँ के पेट में उसी खून से उनका विकास और पालन पोषण होता है।

नार्मल डिलीवरी ही होनी चाहिए।

Maneesha Gautam   731 views   2 months ago

वो पिकं रेखाएं माँ बनने की परीक्षा में पास होने के संकेत थे। आंनद ,रमा का पति भी संपूर्णता की परीक्षा में सफल होकर गर्व महसूस कर रहा था।

अपशकुनी

kavita   105 views   2 months ago

समाज की घृणित सोच और गिरी हुई मानसिकता की शिकार एक युवती की कहानी

औरत का अस्तित्व

Mona Kapoor   8 views   2 months ago

औरत का हर रूप सम्मानीय है, उसे कमजोर ना समझते हुए उसकी इज्जत करें।

कंधो का बोझ

avinashsurajpur   171 views   2 months ago

पार्क की एक बेंच पर अपनी धर्मपत्नी के साथ बैठे शर्मा जी आज अपने कंधो को कुछ जादा भारी महसूस कर रहे थे। हालाँकि वो उम्र के उस पड़ाव पर थे जहाँ बहुत सी जिम्मेदारियों से मुक्ति मिल जाती है और कंधो का बोझ बहुत हद तक कम भी हो जाता है। लेकिन उनके कंधो पर इतना बोझ क्यों था??

धारा विरुद्ध

suneel   121 views   3 months ago

पर मैं सोच रही थी, कि हम लोगों ने जिस तरह अकारण ही बेटे के जन्म को उत्सव का पर्याय बना दिया है, अब उसे बदलने का वक्त आ गया है।