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@dawriter

सही फैसला

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रात के १२ बजे की ही तो बात रही होगी जब ओमकारनाथ भार्गव जी की नींद ड्राइंग रूम में रखे टेलीफोन की घंटी की घनघनाहट से खुली थी उनने नींद में ही फ़ोन उठाया था और दूसरी तरफ से जो खबर आई थी  उसने उनकी रातों की नींद हमेशा के लिए उड़ा देने का पूरा इंतज़ाम कर दिया था वो फ़ोन का रिसीवर हाथ में लिए हुए ही लगभग चीखते हुए ज़मीन पर धम्म से बैठ गए थे और वही से अपनी पत्नी को जोर जोर से आवाज़ लगाने लगे थे “सविता जी सविता जी” रिसीवर से अब भी आवाजें आ रही थी “बाबूजी बाबूजी आप ठीक तो हैं बाबूजी ? सविता जी ने ओमकारनाथ जी को ऐसी हालत में देखा तो घबरा गई और रिसीवर हाथ में लेते हुई बात करने लगी “ हाँ बेटा प्रशांत क्या हुआ तुम ऐसे  घबराए हुए क्यों लग रहे हो ?” दूसरी तरफ से भर्राई हुई आवाज़ आई माँ महेश्वर से वापस आते टाइम मानपुर घाट के पास हमारी गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया सविता जी ने घबराते हुए पुछा- तुम सब ठीक तो हो न बेटा?  प्रशांत की टूटी आवाज़ और बिखरे शब्दों ने उनकी ये आस भी तोड़ दी सुबकते हुए प्रशांत ने कहा “माँ मीना और निशांत हमें छोड़कर चले गए माँ “ सविता जी खबर सुनकर जेसे बच्चो की तरह रोने लगी .

रात लम्बी थी पर इतनी लम्बी होगी ये इंदौर के द्वारकापुरी इलाके में रहने वाले भार्गव परिवार के किसी सदस्य ने नहीं सोचा था ये रात लम्बी ही नहीं बेहद काली भी थी इतनी काली की अगले दिन सुबह का  सूरज भी इस काली रात के कालेपन को कम नहीं कर पाया था .

सविता जी की आखों के सामने रह रह कर वो द्रश्य घूम रहा था जब उनका बेटा प्रशांत उसकी पत्नी मीना और उनकी १५ साल की बेटी रिया और छोटा बेटा निशांत उसकी पत्नी गरिमा और उसका ५ साल का बेटा आरव सब वीकेंड के लिए मंडलेश्वर महेश्वर घूमने निकले थे सब कितने खुश थे इस ट्रिप पर जाने के लिए ,आरव और रिया तो घाट के पानी में नहाने और महेश्वर का किला देखने के लिए पूरे उत्साह में दिखाई दे रहे थे ...वो और भी न जाने क्या क्या सोचती जा रही थी और उनकी आँखों से आंसू ऐसे  बह रहे थे जैसे किसी बांध के गेट खोल दिए गए  हो और उसमे बहकरसब कुछ तहस नहस हो जाएगा
इधर ओमकारनाथ जी का भी यही हाल था जवान जहान बेटा और एक बहु ऐसे चले जाएँगे ये तो उनने अपने बुरे से बुरे सपने मैं भी कभी नहीं सोचा था घर के बरामदे में दो शरीर सफ़ेद चादरों में लिपटे हुए थे जिन्हें देखकर घर वालो का ही  नहीं दाहसंस्कार के लिए आए मोहल्ले वालो और रिश्तेदारों का भी रो रोकर बुरा हाल था ..

प्रशांत अपनी पत्नी के पास बैठा रो रोकर पूरी तरह थक गया था उसकी हिचकियाँ रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी और निशांत की पत्नी गरिमा तो जैसे बुत बन गई थी उसे होश ही नहीं था की उसके साथ ये क्या हो गया ...दो भाइयों के अच्छे खासे हस्ते खेलते घर अचानक से उजड़ गए थे
खैर जैसा की हमेशा से होता आया है लोग दाहसंस्कार करके अपने अपने घर लौट गए कुछ रिश्तेदार जो तेरहवी तक लिए रुक गए वो हर दिन होने वाले छोटे मोटे संस्कारों का हिस्सा बनते रहे .प्रशांत भी अपने गम को छुपाते हुए कभी माँ कभी बाबूजी और कभी अपनी बेटी रिया को ढाँढस बंधाता।

पर गरिमा उसने तो जैसे ज़िन्दगी से नाता ही तोड़ दिया था निशांत क्या गया जैसे उसके जीने की वजह चली गई नन्हा आरव कभी पापा पापा करके रोता कभी भूख लगने पर उसके पास आकर खाना मांगता पर गरिमा जेसे हर बात से बेखबर अपने ही गम में गुम हो गई थी कब मोहल्ले रिश्तेदारी वाली औरतों ने उसकी मान का सिन्दूर पोंछ दिया कब उसके हाथ से लाख की चूड़ियाँ उतार ली गई उसे कोई खबर ही नहीं थी ओमकारनाथ जी और सविताजी अपनी खिलखिलाती गुडिया जेसी बहु को पत्थर होते देखकर और भी दुखी हो रहे थे .

प्रशांत की नज़र भी खुद में ही घुटती गरिमा पर पड़ती तो उसकी आँखों में आंसू उतर आते पर उसका खुद का गम भी कम न था वो गरिमा को क्या दिलासा देता ।

इधर रिश्तेदार भी गरिमा के आसपास सोग का माहोल लगातार बनाए रखते कोई कहता भरी जवानी में पति चला गया ऐसा दिन भगवन किसी को न दिखाए तो कई कहता क्या होगा बिचारी का कैसे जियेगी ५ साल के छोटे से बच्चे को लेकर ...जितने मुह उतनी बातें पर लोगो का मुह बंद भी कौन कर सकता है आस पड़ोस के लोग तो जेसे आते ही इसलिए थे की गरिमा को अहसास दिला सके की पति के न रहने पर उसकी दुनिया में क्या दुर्गति होने वाली है ...

नन्हा आरव सारी बातें सुनता पर कुछ तो उसकी समझ नहीं आता और कुछ वो मां से पूछना चाहता पर मा जवाब नहीं देती .उसने दादी के पास जाकर पुछा दादी ये बिन बाप का बिचारा बच्चा क्या होता है सविताजी ने ये सुना तो उनकी रुलाई फूट पड़ी वो कोई जवाब न दे सकी  पास ही खड़े प्रशांत ने आरव को अपने पास बुलाया और धीरे से उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा “कुछ नहीं होता बेटा ऐसा जाओ तुम बाहर जाकर खेलो “ और आरव अपने ताउजी की  बात सुनकर बाहर चला गया ..प्रशांत को काफी गुस्सा आया पर माहोल की नजाकत देखकर वो चुप रह गया .

शोक के १३ दिन बीते और सब नाते रिश्तेदार अपने अपने घर को रवाना हो गए
गरिमा भी धीरे धीरे दुनिया से जुड़ने लगी आरव का मोह उसे फिर से घर के कामों में उलझाने लगा वो जब जब नन्हे आरव को देखती उसकी रुलाई फूट पड़ती उसके सवाल भी तरह तरह के होते माँ पापा क्या कभी लौट कर नहीं आ सकते मैं बुलाऊंगा तब भी नहीं ? तो कभी पूछता मम्मा मेरा दोस्त कहता है सब मरने वाले ऊपर जाकर तारा बन जाते हैं क्या मेरे पापा भी बन गए होंगे ?गरिमा उसके मासूम सवाल सुनती और उसके सर पपर हाथ फेर देती कभी उसे आरव के भविष्य की चिंता होती कभी निशांत की याद सताती पर वो जैसे तैसे अपने मन को समझाती .प्रशांत पेशे से सी ए था और कुछ दिनों बाद उसने अपना ऑफिस आना जाना शुरू कर दिया पर कुछ दिनों से देख रहा था जब भी ऑफिस से आता अडोस पड़ोस में रहने वाली कुछ औरतें माँ और गरीमा को घेरे बेठी रहती पर उसने अपने आप को काम में इतना ज्यादा डूबा लिया था की इन सब बातों पर उसका ध्यान ही नहीं जाता ऐसे  ही कुछ महीने बीत गए।

प्रशांत महसूस कर रहा था गरिमा घर के कामों में तो उलझने लगी थी पर पर उसकी आँखों की उदासी बढती ही जा रही थी उसकी पत्नी के जाने के बाद वो तो वापस दुनियावी कामों में लग गया है बहार भी आने जाने लगा है पर गरिमा जेसे सिकुड़ती जा रही है रंगों से संगीत से ,मुस्कुराने से मतलब कुल मिलाकरअपनी हर पसंदीदा चीज़ से गरिमा ने अपना नाता तोड़ लिया है ....

2कई बार उसने सोचा भी की माँ बाबूजी से इस बारे में बात करे फिर सोचा हो सकता है गरिमा निशांत को बहुत ज्यादा मिस कर रही हो और थोड़े दिन में सब ठीक हो जाए पर उसे क्या पता था की ये तूफ़ान के पहले की शांति है

एक दिन जब वो ऑफिस से घर लौटा तो देखा पड़ोस की रमा आंटी माँ से कह रही है “सविता मैं तो कितने दिन से कह रही हूँ यही सबसे सही रहेगा तुम ज्यादा सोचो मत “और जब उनने प्रशांत को अन्दर आते देखा तो वो चुपचाप बाहर निकल गई

उसने मां से पूछा भी की क्या कह रही थी रमा आंटी पर उनने बात टाल दी.रात को जब वो खाना खाकर छत पर टहलने जाने लगा तो ओमकारनाथ जी ने सीढ़ियों से लगे अपने कमरे से उसे आवाज़ दी बेटा प्रशांत यहाँ आना ज़रा बात करनी है तुमसे वो अन्दर गया तो देखा माँ बाबूजी दोनों पलंग पर गंभीर होकर  बैठे दिखाई दे रहे है उसने पुछा क्या हुआ माँ आप दोनों ऐसे क्यों बैठे हैं.बेटे को आया देखकर सविताजी ने बिना किसी लाग लपेट के कहा बेटा हम चाहते हैं की तुम्हारी और गरिमा की शादी करवा दी जाए.ये बात सुनकर प्रशांत का मुह खुला का खुला रह गया उसको जेसे धक्का लगा उसने खुद को सँभालते हुए कहा मान ये कैसी बात कर रही हो आप ? और इतना कहकर वो कमरे से बहार निकल गया उसे समझ ही नहीं आया की वो क्या जवाब दे ...वो बाहर आया तो उसने देखा उसकी बेटी रिया अवाक् सी खड़ी है और पास ही निशांत के कमरे से सुबकने की आवाजें आ रही है .

पर ओमकारनाथ जी और सविताजी भी कहा मानने वाले थे ४,६ दिन निकले थे उनने फिर प्रशांत को अपने कमरे में बुलाया उसके कमरे में जाते ही ओमकारनाथ जी वोले “देखो पूरी बात ध्यान से सुनो “ प्रशांत सर झुककर सुनने की मुद्रा में बेथ गया क्यूंकि पिछले ५.६ दिन से वो महसूस कर रहा था की घर में रोज ही ये सुगबुगाहट चल रही है जिसके कारण हर तरफ से ख़ामोशी छाई हुई है सब एक दुसरे से कन्नी कट रहे हैं .ओमकारनाथ जी गला खंखारते हुए बोले देखो बेटा अब तुम दोनों अकेले हो दोनों को कभी न कभी जीवनसाथी की जरुरत तो होगी ही तो बेहतर है की तुम दोनों एक दुसरे से ही शादी कर लो .

सविताजी अपने दोनों हाथों को एक दुसरे से बांधते हुए बोली बेटा गरिमा की भी सारी उम्र पड़ी है उसे भी जीवनसाथी की ज़रूरत होगी और वो किसी और से शादी करेगी तो निशांत की निशानी आरव को भी अपने साथ ले जाएगी फिर तुम्हारी भी एक ही बेटी है कल को शादी करके वो भी अपने घर चली जाएगी  तुम दोनों शादी कर लोगे तो तुम्हे भी एक बेटा मिल जाएगा और रिया को भी माँ मिल जाएगी.आरव और गरिमा को भी सहारा मिल जाएगा .

प्रशांत दोनों की बातें चुपचाप सुनता रहा  फिर धीरे से बोला माँ  आपने गरिमा से  हिला दिया प्रशांत ने बात आगे बढाई मां आप जानती है न निशांत मुझसे ८ साल छोटा था और गरिमा मुझसे १३,१४ साल छोटी है वो बात भी जाने दें तो आप ये तो जानती ही हैं की गरिमा को हमेशा मैंने अपनी छोटी बहन की तरह माना है और वो भी मुझसे भाई साब कहते नहीं थकती थी ..सविता जी ने बात काटते हुए कहा वो तो कहने के लिए सब कहते ही हैं बेटा ...प्रशांत बीच में ही बोल पड़ा नहीं माँ ऐसी बात नहीं आपने गरिमा से पुछा नहीं पर मैंने उसकी आँखों में उदासी देखी है वो और मैं हम दोनों ही ऐसे किसी रिश्ते के लिए तैयार नहीं है.

और रही बात आरव की तो वो निशांत और मैंने कभी बच्चो में फर्क नहीं किया वो मेरा भी बेटा है और मेरे लिए रिया भी बेटे के बराबर ही है ...ओमकारनाथ जी ने कहा प्रशांत कहना आसान है पर करना मुश्किल है तुम दोनों की शादी ही सबसे सही फैसला है ...

प्रशांत दृढ आवाज़ में बोला नहीं पिताजी ये नहीं होगा बल्कि मैं तो चाहता हूँ गरिमा चाहे तो अपनी कॉमर्स की डिग्री के साथ मेरा ऑफिस ज्वाइन करे या जरुरत के हिसाब से और कोई पढाई करके कही और जॉब कर ले. जरुरी ये है की वो अपने पैरों पर खड़ी हो और अपनी ख़ुशी से जिंदगी में आगे बढे फिर अगर वो किसी से  शादी करना चाहेगी तो मैं खुद करवाऊंगा ..जहां तक बात है दोनों बच्चों की आरव और रिया दोनों मेरे लिए बराबर है और मैं अपना फ़र्ज़ अच्छे से निभाऊंगा ....रिया मेरी बेटी है इसलिए मैं एक बेटे के लिए शादी करू ये मैं कभी नहीं करूँगा ....

ये कहकर वो वो कमरे से बहार निकल गया उसने बहार आकर देखा गरिमा के चेहरे पर मुस्कराहट लौट आई थी और रिया के होंटों से से बुदबुदाहट निकली थैंक्स यू पापा इतने मैं ही आरव कही से दौड़ता हुआ आया और उसकी गोदी में चढ़ता हुआ बोला आप आज मुझे जादुई कालीन की कहानी सुनाने वाले थे न ताउजी ? प्रशांत ने मुस्कुराते हुए कहा हाँ बेटा चलो आज वही कहानी सुनाता हूँ....उसने पीछे पलटकर देखा तो रिया और गरिमा दोनों गले मिलकर खुश हो रही थी ...

काली अँधेरी रात छटने  लगी थी मुस्कुराहटों का उजाला फ़ैल रहा था यही सही फैसला था 

राइटर कनुप्रिया गुप्ता



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