224
Share




@dawriter

संस्कारों के बीज... जैसे बोयेंगे , वैसे फल पायेंगे !!

0 1.47K       

अरे... रमा! तू यहां ...?? मंदिर की सीढ़ियों से उतरते हुए जैसे ही बाला ने रमा को देखा ....आश्चर्य से बोल पड़ी!" हां... मैं, यहां..." रमा ने अपनी नजरें छुपाते हुए कहा" किंतु तेरा घर तो यहां से बहुत दूर है ना! क्या रोज यहां आती हैं ..? चल फिर, घर चल आज! बहुत दिन हो गए तुझ से बातें भी नहीं की" बाला ने पूछा। रमा .." नहीं... नहीं! मैं ठीक हूं, अभी थोड़ी देर में घर निकल जाऊंगी, तू यहीं थोड़ी देर बैठ जा..." थोड़ी देर नहीं... बस घर चल, कहते हुए जबरदस्ती बाला ने रमा कोअपने साथ रिक्शा में बैठा लिया और घर पहुंच गई, राम सिंह को चाय पहुंचाने को कहकर बाला... रमा को अपने कमरे में ले गई। और बता रमा क्या हाल है ...?? बेटा बहू कैसे हैं तेरे ...? ठीक से तो रहते हैं न, मेरा बेटा तो बहुत ही अच्छा है, और बहु उससे भी अच्छी! रमा ने दुखी होते हुए कहा..." क्या बताऊं ..? बाला! कौन अच्छा..? और कौन बुरा..? यह तो निभाने के बाद ही पता चलता है ... तू तो हमेशा एक अच्छी पत्नी, आदर्श बहू और एक आदर्श माँ है! तो भला अच्छे कैसे ना होंगे ...?? मैं क्या कहूं ...?? मैं तो सब वही भोग रही हूं... जो मैंने किया है!" बाला -" आखिर रमा तू कहना क्या चाहती है ...?""कुछ नहीं!" मायूस रमा ने जवाब दिया और फिर चुप हो गई। बाला ..." नहीं कुछ बात तो है... जो तुझे मुझे बतानी ही पड़ेगी!" रमा..." नहीं...नहीं..! बाला, बताया ना कोई बात नहीं है .... तभी रामसिंह चाय लेकर आ गया" चल पहले चाय पी.... उसके बाद बात करते हैं" बाला ने चाय रमा को पकड़ाते हुए कहा ..." हां! अब बता....क्या हुआ ...? क्या राकेश तुझसे अच्छा व्यवहार नहीं करता...? या उसकी बीवी से परेशान है....?"

रमा..."देख... बाला, मैंने कभी उसे किसी चीज के लिए परेशान नहीं किया, लेकिन फिर भी कहीं ना कहीं मैं अपने बेटे से दुखी तो हूं ही! फिर सोचती हूं कि यह मेरे ही तो दिए संस्कार है ... क्योंकि! जब माँजी बीमार थी तब मैंने उन्हें बड़ी भाभी के पास पहुंचा दिया था, अब वही सब मेरा बेटा मेरे साथ कर रहा है, यह तो मेरे किये का ही फल है ... जैसा उसने मुझे मेरे बड़ो के साथ करते देखा... वैसा ही आज वह मेरे साथ कर रहा है"। बाला ... हां! कह तो तू सही रही है... रमा! मैंने तुझे तब कहा था कि तू ये सब गलत कर रही है, लेकिन उस समय ना तो तूने भाई साहब की बात मानी, ना ही मेरी! खैर... जाने दे, पुरानी बात हो गई पर इन सब के लिए तुझे बेटे से बात तो करनी ही होगी! पर कैसे ?? कहकर रमा फिर से सोच में पड़ गई। बाला..." देखती हूं मैं कुछ सोचती हूँ, तू शायद इसीलिए घर से आकर मंदिर में बैठ गई थी, अभी मैं राम सिंह को कह कर खाना बनवा देती हूं... बाकी की देखी जाएगी, क्या.. कैसे...? करना है ..." दोपहर का खाना खाकर दोनों बाला के ही कमरे में गई लेट गयी, शाम के समय विनोद और उसकी पत्नी ऑफिस से आए, रमा को घर पर देखकर उन्हें बहुत खुशी हुई कि चलो कुछ दिन माँ का भी मन लगा रहेगा... इस बात से अनजान कि उनका कोई पारिवारिक मामला भी हो सकता है! और उन्होंने रमा से कुछ दिन रहकर जाने की गुजारिश की। रमा और बाला, तो यही चाहते थे कि कुछ दिनों में इस समस्या का कोई समाधान हो जाए। अब दोनो इसी उधेड़-बुन में लग गई... कि क्या किया जाए ..? 1-2 दिन सब सही रहा... उसके बाद एक दिन अचानक रमा की तबीयत बहुत बिगड़ गई, बुखार उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था हालत और भी बिगड़ती ही जा रही थी दवाई से भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, डॉ असमंजस में था ... हर बार बदल बदल के दवाई दे देता पर सब बेकार! दोपहर के समय रमा ने बाला को अपने पास बुलाया औऱ कहा..." बाला! लगता है... मैं और ज्यादा दिन नहीं जी पाऊंगी यह मेरा आखिरी समय चल रहा है। इसीलिए चाहती हूं... तू एक खत लिख दे, जिसे मेरे जाने के बाद मेरे बेटे को दे देना! बाला जल्दी से पैन और कागज ले आई

बेटा राजेश!

जब तुम्हें यह खत मिलेगा, उस समय मैं तुम से बहुत दूर जा चुकी होऊंगी, लेकिन फिर भी मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है, केवल एक गुजारिश है...चाहे तुम अपनी मां का आदेश भी मान लो, कि मेरा क्रिया कर्म संस्कार"तुम ही करो" अंत समय में मुझे तुम अपने ही हाथों मुखाग्नि देना इससे बेटे मनु के मन में तुम्हारे लिए कोई दुर्भावना नहीं होगी... कि मेरे पिता ने मेरी दादी के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जो कि तुम्हारे मन में मेरे लिए है.. ये मैं अच्छे से जानती हूं...भले ही तुम मानो या ना मानो! यह मेरे संस्कारों का ही परिणाम है कि आज तुम अपनी मां से नाराज हो। सच कहूं तो शायद इसमें तुम्हारी गलती भी नहीं है ... तुमने मुझे अपनी दादी की मौत का जिम्मेदार माना है,कहीं ना कहीं मैं इसके जिम्मेदार ना सही, पर कहीं हद तक दोषी जरूर हूँ। इसीलिए मैं नहीं चाहती... कल तुम्हें, तुम्हारा बेटा भी इसका जिम्मेदार माने! इसीलिए मैं चाहती हूँ मेरे जाने के बाद, तुम मुझे यहां से ले जाना और मेरा अंतिम संस्कार का कार्य तुम ही संपन्न करना।

तुम्हारी माँ

कहकर रमा की आंखों से अविरल धारा बह गयी ...." कोई बात नही रमा सब सही हो जाएगा" कहकर बाला ने रमा को गले से लगा लिया,"अब तू थोड़ी देर सो जा... फिर मैं चाय भिजवाती हूँ" कहकर बाला वहां से चली गयी। बाहर ही विनोद उसे मिल गया" क्या हुआ..?? माँ! बहुत परेशान लग रही हो रमा चाची की तबियत ठीक तो है.. न"" नही..नही..! बेटा ऐसा कुछ नही है, सब ठीक है" कहकर बाला की आंखें भी छलछला गयी। नही... माँ! कुछ तो हुआ है.. आप बताइए मुझे, आपको मेरी कसम ... सुनते ही बाला ने विनोद की तरफ कागज का टुकड़ा बढ़ा दिया ये क्या है... माँ ? कहकर विनोद ने उसे पढ़ना शुरू किया," ओह्ह! अब क्या करना है...? माँ!" मैं भी इसी उलझन में हूँ बेटा! क्या करूँ ..? मुझे तो लगता है माँ, ये खत राजेश के पास अभी पहुंचा देना सही होगा! हां...बेटा, सोच तो रही हूँ, कि कड़वाहट समय रहते ही दूर हो जाये तो अच्छा है। ठीक है... माँ! मैं खुद ये खत राजेश को देकर आता हूँ और कोशिश करूंगा कि उसे कुछ समझा भी सकूं," पर... बेटा! ध्यान से, पता नही तुम्हारी बातें उसे कहीं बुरी न लग जाये"" ठीक है...माँ! कहकर विनोद तेज़ी से बाहर निकल गया, बड़ी मुश्किल से काफी पुछताछ के बाद राजेश के घर पहुंचने में उसे काफी समय लग गया। बेल बजाई...तो दरवाजा मनु ने खोला.. नमस्ते अंकल! आपको किससे मिलना है ..? बेटा! राजेश घर पर है ..? पापा! जी हाँ .. एक मिनट, पीछे से राजेश आया अच्छा भला सुलझा हुआ इंसान! विनोद को पहचानते ही बड़े आदर से अंदर बैठाया। थोड़ी देर बाद विनोद ने पूछा रमा चाची कहां है ...?" पता नही... विनोद भाई, कुछ बता कर नही गयी 2 दिन से उन्हें ढूंढ रहा हूँ, शायद मैं थोड़ा ज्यादा ही बोल गया था!" राजेश ने निराश मन से कहा।" कोई बात नही... चाची हमारे घर है" तुम्हारे घर ...?? वो कैसे ..??" ये सब तो तुम्हे बाद में पता चलेगा... अभी तो उनकी तबियत बहुत खराब है, और तुम्हारे लिए ये एक चिट्ठी रख छोड़ी है कि उनके जाने के बाद ही तुम्हे दूँ पर रहा नही गया सो अभी देने चला आया" विनोद ने चिट्ठी पकड़ाते हुए कहा, चिट्ठी पढ़ते हुए राजेश की आंखों से टप टप आंसू बहने लगे, पास ही राजेश की पत्नी अर्चना ने भी अपनी गलती महसूस की राजेश ने हाथ जोड़कर विनोद से विनती की..." मुझे माँ के पास ले चलो।" हां... हां ..! क्यों नही ..?? पर बेहतर होगा! कल तुम खुद उनके पास जाओ.. वैसे भी अब रात बहुत हो गयी है और डॉक्टर ने उन्हें आराम करने को कहा है ...कल उनसे मिलो... तो और उन्हें इस बात का बिल्कुल आभास न होने दो की तुमने कोई खत पढा है, इससे उन्हें ज्यादा खुशी होगी"। ठीक है विनोद भाई जैसी आपकी आज्ञा। अगली सुबह तक रमा की तबियत में भी कुछ सुधार होने लगा था, जैसे ही राजेश ने आवाज़ लगाई... माँ! तुम यहाँ ..?? रमा चकित रह गयी... अरे बेटा! तू, रमा कहना तो चाहती थी कि फुर्सत मिल गयी तुझे अपनी माँ की सुध लेने की पर फिर चुप रह गयी, राजेश ने माँ के पैर छुए और रमा के बराबर में बैठ गया और कहने लगा.. माँ! तुम जानती हो कितनी मुश्किल से तुम्हे ढूंढ पाया हूं, मैं तो अभी रिपोर्ट ही लिखवाने जा रहा था, रास्ते मे ही विनोद भाई मिल गए उन्होंने बताया कि तुम उनके घर पर हो और मैं फ़ौरन तुम्हे लेने आ गया, कह रहे थे तुम्हे बुखार भी है ...अब कैसी तबियत है ...?? अब तो ठीक हूँ बेटा, मैं सच कहूँ तो मुझे लगता था कि तू कभी मुझे लेने आएगा ही नही...! ऐसा कैसे हो सकता है ...? माँ! चल अब जल्दी से, ये साड़ी तो लेकिन बाला की है... बाला मैं तेरी साड़ी बाद में भिजवा देती हूं, कोई बात नही रमा इसे तू ही पहन लेना तुझ पर अच्छी लगती है। राजेश और रमा को विदा करा कर बाला और विनोद निश्चिंत हो गए ऐसा लग रहा था मानो सर से कोई बहुत बड़ा बोझ हट गया हो, माँ और बेटे को मिला कर दोनो ही बहुत सुकुन महसूस कर रहे थे।

घर पहुंच कर अर्चना ने रमा को कमरे में लिटा दिया, और चाय पानी का इंतज़ाम करने लगी... इसी बीच राजेश ने माँ के साथ ही एक थैला देखा माँ इसमें क्या है ...?? कुछ नही ...बेटा! मेरे कपड़े है, एक दिन खुद के पहने, एक दिन बाला के। आज मेरे इसी मे है। जरा देखूं तो... कहते हुए विनोद ने पूरा थैला मेज पर पलट दिया साथ ही माँ से नज़र बचा कर उसमे चिट्ठी भी डाल दी, अरे... माँ! इसमें तो एक कागज भी है, ला जरा देखूं तो, रमा उसे बाहर से देखते ही पहचान गयी, और उसके टुकड़े टुकड़े करके राजेश के हाथ मे देते हुए बोली...." ले... बेटा! इसे कूड़ेदान में फेंक दे पर माँ उसमे था क्या ..? कुछ नही बेकार था। इसीलिए फाड़ दिया, राजेश के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी, इतने में ही अर्चना चाय औए नाश्ता लेकर आ गयी, बहू!" मैं नाश्ता तो नही कर पाऊंगी चाय पी लूंगी बस" कोई बात नही मांजी मैं कुछ बिस्किट ला देती हूं...खाली चाय नुकसान करेगी। बहू के इन शब्दों से रमा खुश हो गयी।
कुछ दिनों में धीरे धीरे रमा की हालत में भी सुधार होने लगा था और टूटे रिश्तो में भी।।

©नेहाभारद्वाज



Vote Add to library

COMMENT