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@dawriter

श श श... सो रहा है देश मेरा

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श्रीवास्तव साहब का लड़का विनय,बड़ा उदास था और गुस्से से भरा हुआ था जब उसने इस बार के यू पी एस सी का परिणाम देखा। यू पी एस सी की टॉपर वही लड़की थी जिसकी वज़ह से वह प्रारम्भिक परीक्षा से बाहर रह गया था,जबकि उसके अंक उस टॉपर से ज्यादा थे। आरक्षण बहुत बड़ी और गहरी बीमारी है,न जाने कितने लोगों को ग्रसती जा रही है पर क्या फर्क पड़ता है,आप अपना काम करें,ये तो बस श्रीवास्तव साहब के लड़के के साथ हुआ था जनाब,आप तब तक चैन से बैठिये जब तक ऐसा कुछ आपके किसी अपने के साथ नहीं होता। कहते हैं संगठन में शक्ति होती है पर ये बातें लगता है अन्य वर्गों के लिए कही गयी हैं, हम तो अपने आपको शेर समझने का गुमान कर बैठे हैं। शेर अकेला घूमता है और हम अनारक्षित वर्ग की यही समस्या है सब अपने आपको अगले से श्रेष्ठ समझते हैं और अपने असंगठित होने का खामियाज़ा ही भुगत रहे हैं और इस भूल का परिणाम शायद हमारी आने वाली नस्लों के लिए और भी घातक होगा।

           विनय अपने कुछ साथियों के साथ दो सालों से दिल्ली में डटा आई ए एस की तयारी कर रहा था उसी की तरह उसके साथियों का भी चयन नहीं हुआ।इस बार विनय अपने घर लौट आया। गहरे अवसाद में था, एक दिन तो जैसे वक्त उसकी किस्मत पर कुठाराघात करने के लिए ही बैठा था।दिल्ली से लौटते समय उसने अपने आप से वादा किया था इस बार वो सबको दिखाकर रहेगा कि योग्यता को आप दबा नहीं सकते और कोई भी उसे आई ए एस बनने से नहीं रोक पायेगा परन्तु किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था, पेपर में छपी ख़बर ने उसकी रातों की नींद और दिन का चैन छीन लिया था, अखबार की सुर्ख़ियों में ख़बर थी अनारक्षित वर्ग के लिए यू पी एस सी ने आयु सीमा 32 से घटाकर 26 कर देने का तय किया है और बाकी सब के लिए ये 37 वर्ष है।अजीब सी तल्खी हुई उसे अपने आप से आगे पढने पर पता चला ये आयु सीमा इसलिए कम की गयी है ताकि युवा  नेतृत्व मिल सके देश को। विनय चीख पड़ा ये कहकर- साला हम लोग ही तो बुढ्ढे होते हैं, बाकी सब तो जवान रहने की बूटी खाकर आये हैं।उसने अखबार को कई टुकड़ों में फाड़ दिया। उसी की तरह देश के कई युवकों ने जो 27 के हो चले थे अपने सपनों को तिलांजली देने का सोच लिया था।

          उसने तो अपनी सारी पढाई यू पी एस सी को ध्यान में रखकर की थी,अब तो वो किसी सरकारी नौकरी में आवेदन नहीं कर सकता था। चपरासी की भर्ती के लिए भी पी एच डी किये लोग आ रहे थें। मन ही मन कह उठा- इसे विडम्बना कहूं देश की या किस्मत कि चपरासी भी अब पी एच डी डिग्री धारी होगा। ऐसे ही एक रात उसने अपने कमरे का मुआयना किया।

         अगली रात उसने एक फांसी का फंदा बनाया और उस पर झूल गया।सुबह जब माँ ने दरवाज़ा खटखटाया न खुलने पर दरवाज़ा तोड़ा गया। सामने पंखे पर विनय लटका था। उसे उतार कर लिटा दिया गया।माँ बेहोश हो चुकी थी। पिता ने एक बार नाक के पास हाथ रखा तो सांसें बंद थी। उसे लिटा दिया। चूँकि आत्महत्या का मामला था इसलिए पुलिस को फ़ोन करना ज़रूरी था।

         श्रीवास्तव जी से तो कुछ कहते ही नहीं बन रहा था, उनके पडोसी ने फ़ोन किया तब पुलिस वाले कहने लगे- लडके ने आत्महत्या की... कोई लड़की का चक्कर था क्या? पडोसी ने कहा नहीं लड़का बहुत विद्वान् और संस्कारी था, वो तो अखबार में छपी खबर देखकर... इतना कहकर पड़ोस के मिश्रा जी चुप ही गए। पुलिस वाले ने कहा- अच्छा समझ गए। कौन जात हो भाई? मिश्रा जी के बताते ही बोले ऐसा है अभी  साहब की पत्नी को खरीददारी कराने जाना है... हवलदार को भेज कर आता हूँ थोड़ी देर में।मिश्रा जी ने जब उनसे शीघ्रता करने का निवेदन किया तो नहीं माने... गुस्से में मिश्रा जी ने मीडिया की धमकी दी तो पुलिस वाले ने कह दिया जा जिसे बुलाना हो बुला ले।

               मिश्रा जी ने जैसे ही जाने माने पत्रकारों को फ़ोन किया घटना की जानकारी देने के लिए तो उनका पहला शब्द था- "कौन जात हो भाई"... थोड़े से अफ़सोस के साथ उन्होंने कहा अनारक्षित हो कोई ख़बर नहीं बनती... कोई ज्यादा टी आर पी भी नहीं मिलेगी... एक काम करो किसी और को बुला लो,हम एक सितारे के यहाँ अभी बेटी हुई है उसकी कवरेज के लिए जा रहे हैं,वैसे आपका जो नुक्सान हुआ उसका खेद है हमें पर हम मदद न कर पायेंगे।

          विनय के माँ पिता जी की हालत खराब थी, जवान बेटे की लाश घर पर पड़ी देख उनकी हालत और बद्तर होती जा रही थी,ऊपर से लचर व्यवस्था, जब तक पुलिस आकर मुआयना न कर ले पंचनामा न हो जाए, तब तक तो कुछ किया भी नहीं जा सकता।मिश्राइन अपनी ओर से सांत्वना देते हुए बोली- इसलिए हम कहते थे की बेटे को कोई व्यापार ही करवा दो आज देख लो हमारा रवि हमारे सामने है और सही सलामत है। ये पडोसी सांत्वना कम और ज़ख्म ज्यादा कुरेदते हैं।मिश्रा जी के आँखें दिखाते ही मिश्राइन चुप हो गयी। धीरे-धीरे खबर पूरे शहर में जंगल की आग की तरह फ़ैल गई। विनय के दोस्तों के कानों तक जैसे ही उसके मरने की खबर पहुँची सर पर पैर रखे भागते पहुंचे।

      विनय के पास बैठकर लम्बी लम्बी देने लगे,ऐसा नहीं करना चाहिए था,हम सब साथ मिलकर आन्दोलन करते सरकार के फैसले के खिलाफ़। धरना देते जंतर-मंतर घेरते। अभी तो बस अखबार में ख़बर आई है,कोई बिल थोड़ी पारित हुआ है।एक ने कहा- वैसे भी अभी देश में बड़ा परिवर्तन हो सकता है, एक बहुत ही ईमानदार आदमी मुख्यमंत्री बना है वो सबकी बहुत सुनता है,हमारी मदद करेगा धरना प्रदर्शन में विनय को इतनी जल्दी उम्मीद नहीं छोडनी चाहिए थी।

        एक ने कहा- मैं उस पार्टी के कुछ लोगों को जानता हूँ वो हमारी मदद कर सकते हैं। फ़ोन लगाया गया- वहां से जवाब आया जी हाँ हम आपकी मदद ज़रूर करेंगे,सरकार के विरोध में हम ज़रूर आपका साथ देंगे। फ़ोन रखते रखते उसने पूछा वो सब तो ठीक है पहले ये तो बताओ- "कौन जात हो भाई"? और जवाब सुनते ही कहने लगा- अभी हमारी नयी नयी सरकार बनी है तो हम इस ओर ध्यान नहीं दे पायेंगे वैसे भी ये अलग राज्य की बात है और आप लोग तो कोई वोट बैंक भी नहीं हो न जहाँ मैं टोपी पहनूं या सांत्वना के लिए जाऊं।

          सारे तमाशे विनय के सामने हो रहे थे। एक ने सुझाया चलो हम आन्दोलन छेड़ते हैं कितने लोग साथ हो जायेंगे? उसने अपने दोस्तों की ओर सवालिया दृष्टि से देखा? उसके कुछ दोस्त जब लम्बी-लम्बी देने लगे बढ़ा-चढाकर लोगों की संख्या बताने लगे तो अचानक से लाश बोल उठी- "हरामखोरों तुम लोग मेरे मरने की ख़बर सुनकर आये हो मजबूरी में,अभी मैं उठ जाऊं तो सालों सब विरोध भूल जाओगे", बोलता हुआ विनय खड़ा हो गया।

                 सबके चेहरे पर आश्चर्य था... विनय कहने लगा- मैं तुम सबको आइना दिखाना चाहता था कि कोई नहीं सुनने वाला हमारी, हम चाहे जिए या मरें कोई खबर नहीं बनती,इसलिए कोई सहानुभूति भी नहीं बनती लोगों की हमसे। तुम सबकी आँखों में पड़े शेर होने के चश्मे को उतारना चाहता था। अब समय आ गया है कि हमें संगठित होना होगा और एकजुट होकर शांतिप्रिय तरीके से अपनी बौद्धिकता का प्रयोग करते हुए एक नयी पहल करनी होगी।

              विनय ने मोबाइल निकाला और मिश्रा जी से कहने लगा- पुलिस स्टेशन फ़ोन कर कहिये, मरा हुआ आदमी अपने आप ज़िंदा हो गया।मिश्रा जी ने जैसे ही पुलिस में और मीडिया में खबर दी सब सरपट भागते आये। विनय सबको अपने मरने के बाद के अनुभव बताने लगा। हर न्यूज़ चैनल में बस विनय ही विनय दिखाई दे रहा था।एक पत्रकार ने पूछा तो विनय कहने लगा- मुझे तो गलती से उठा ले गए थे लोग... पर जब पहुँच ही गया था तो यमराज ने दो चार सवाल पूछ ही लिए कि मैं क्या करता हूँ।

        पत्रकार उत्सुकता से उससे पूछने लगे- तो आपने क्या जवाब दिया। विनय ने कहा- "मैंने कह दिया कि भगवान ने इंसान को चार आश्रमों में बाँटा था अभी तो मैंने ग्रहस्थ आश्रम में प्रवेश भी नहीं किया कि अखबारों में मुझे बूढ़ा घोषित कर दिया गया अब बताइए लोग ब्याह भी नहीं करेंगे हमसे। भगवान ने इंसानों को बनाया, इंसानों ने वर्ण व्यवस्था बनाई। इंसानी मूल्यों का पतन होता गया,उसके बाद जब हम गुलामी से आज़ाद हुए तो दस सालों के लिए आरक्षण का प्रावधान रखा गया जिससे सब सामान्य ओहदे तक आ सकें,आज हमें आज़ाद हुए 69 साल हो गए पर अभी भी समानता नहीं आई है यमराज साहब। इतना ही फर्क पड़ा है बस की 27 में हम बूढ़े हो गए और लोग 37 में भी जवान बने रहते हैं,इतनी विषमताओं से भरे देश में मुझे वापस मत भेजो कहकर मैंने उनके पैर पकड़ लिए। उन्होंने मेरी एक न मानी और वापस भेज दिया"।मैं चीखता रहा यह कहकर कि अब तो अनारक्षित लडकियाँ भी हमारे कुछ कहने से पहले पूछ लेती हैं हमसे कि कौन जात हो... थोड़ी देर बाद अपनी हमदर्दी जताते हुए ये कह चली जाती हैं कि बच्चों का भविष्य नहीं बिगाड़ना।इतना सुनते ही उन्होंने मुझे नीचे फेंक दिया।

             कुछ दिन जब तक कोई और भड़कती खबर नहीं मिली,तब तक विनय खबरों में छाया रहा पर उसके बाद ये तमाशा भी शांत हो गया।विनय को देश विदेश सारे न्यूज़ चैनल में देखने के बाद उसकी डिमांड बढ़ गयी। उसे अमेरिका से बुलावा आ गया। विनय ने अपना बोरिया बिस्तर बाँध लिया और जाते जाते एक खुला खत छोड़ गया सबके लिए-

      मैं विनय श्रीवास्तव,

                       जन्म के साथ ही मुझ पर एक कर्ज़ था इस देश की सेवा करने का।मैंने भरसक प्रयत्न किया पर कभी आरक्षण ने रोका तो कभी नीतियों ने, आज मैं जा रहा हूँ,देश छोडकर अपने हुनर के साथ, हमेशा के लिए, मुझे यहाँ कभी मौका नहीं मिल पाया अपने आप को साबित करने का पर जिस देश ने दिया है,वहां खुद को ज़रूर साबित करूँगा। हिंसा के बल पर, वोट की राजनीति के दम पर, जहाँ बातें और मांगें स्वीकारीं जाती हों वह देश विकासशील था... है और शायद हमेशा ही रह जाएगा... आज मैं जा रहा हूँ कल और भी लोग जायेंगे और एक-एक कर हर क्षेत्र से प्रतिभा का पलायन होता जाएगा...

              पर आपको क्या करना है जनाब... आप बेधडक होकर सोइये... सारा देश सो ही तो रहा है... जब तक अखबार में छपी ख़बर बिल का रूप धारण कर सच साबित नहीं होती जाइये... गहरी नींद सो लीजिये आप... कुछ नहीं होगा बाद में आपके चिल्लाने से याद रखियेगा... आप किसी के भी लिए वोट बैंक नहीं हैं...

                  अब लिखने वाले की जात मत पूछना चुपचाप सो जाओ सब....

     श...श..श... सो रहा है देश मेरा कृपया हॉर्न तो बिलकुल ही न बजाएं।।

                                                 अभिधा शर्मा।।



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