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@dawriter

मातृत्व

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बाहर से चीखने चिल्लाने की आवाजें आ रहीं हैं, दिल कर रहा उसका यह परिणाम। आखिर निर्णय था भी तो बहुत विचित्र और इसी विचित्रता को पापाजी ने पागलपन की संज्ञा दी दी। नही, वो दोषी नहीं है ,सबके अपने सपने होते हैं पर अब बस अपनी आत्मा और शरीर  को और विदीर्ण होते नही देख सकती मैं, इसलिए पूरे होशोहवास में कभी माँ न बनने का निर्णय ले ही लिया है मैंने।

अठाइसवां साल लगते ही पापा ने अल्टीमेटम दे दिया कि बहुत हुआ अब पीएचडी करके प्रवक्ता लगे हुए भी दो साल हो गए हैं, अब शादी में और विलंब करने का कोई औचित्य नहीं है। शादी से कोई परहेज नहीं था बस एक लय सी थी जिंदगी में, और उसमे कोई अड़चन नहीं चाहती थी मैं पर सृष्टि और समाज के विरुद्ध जाने का कोई इरादा नही था इसलिए तीन महीने के भीतर ही जतिन के साथ सप्तपदी के सातों वचन आत्मसात कर लिए। जतिन घर के इकलौते पुत्र और तीन बहनों के लाडले भी थे पर फिर भी पापाजी के कठोर अनुशासन ने कभी कदमों को मर्यादा लांघ उच्श्रृंखल नही होने दिया। सास उर्मिला स्वभाव से धर्मभीरु और सिर्फ अपने कुल की खुशियों का ध्यान रखने वाली महिला थीं। सब कुछ अच्छा ही था कि शादी की दूसरी सालगिरह पर रिश्ते की मामीजी ने उलाहना दिया'अब अगली पार्टी तुम्हारे बच्चे की होनी चाहिए, बहुत साल हो गए इस आंगन में कुलवंशज खेले हुए',जतिन की ओर देखा तो उन्हें भी मुस्कुराते हुए पाया,,तो इसका मतलब यह है कि सब यही सोच रहे हैं सिर्फ मैं ही नही समझ पा रही हूं। 'जतिन, तुम्हे भी लगता है कि अब हमें अपनी फैमिली शुरू कर देनी चाहिए' जवाब न देकर उन्होंने मुझे अपनी बाहों में भींच लिया और मुस्कुराते हुए कहा 'शायद अपने प्यार को मूर्त रूप देने का समय आ गया है।

खुशखबरी का इंतजार करते करते लगभग एक साल बीत गया और इस एक साल में प्यार भरे उलाहने उपालंभों में बदलने लगे थे। मेडिकल साइंस ने इतनी तरक्की कर ली है कि अब तो कुछ भी नामुमकिन नही ,यही सोच, हर परीक्षण उपचार से गुजरी पर रिजल्ट शून्य ही निकला। धरती नारी और गाय यदि उपजाऊ न हो तो उसका इस समाज में कोई मोल ही नही है,इस बात पर सदैव वाद विवाद करने वाली मैं, बिना वादी या प्रतिवादी बने हार गई थी। दबे ढके शब्दों में कोई टोने टोटके झाड़ फूंक का भी जिक्र होता तो पता नही क्यों पहले की तरह मैं प्रतिवाद नही कर पाती थी।

उपचार का विचार ही सांत्वना देने के लिए काफी होता है कि सब ठीक होगा पर अनगिनत सुइयाँ, शरीर की चीर फाड़ मुझे उतना कष्ट नहीं देती थी जितना कि उन प्रयासों का विफल हो जाना। पर शायद अम्मा जी के बताऐ पूर्णमासी के व्रतों का परिणाम था या मामीजी के गोवर्धन महाराज  की 121 परिक्रमा का प्रताप या डॉ निधि की कोशीश,बंजर जमीन पर एक  अंकुर फूटा। साइंस के अनेकों चमत्कारों में से एक है आई. वी.एफ, निसंतान दम्पतियों के लिए वरदान। हाँ, वरदान ही तो बन गया था मेरे लिए भी अचानक से उपेक्षित तिरस्कृत मैं पूरे परिवार की धुरी हो गई।। सुुर्य को  जल  देेनाा, संतान गोपाल के जप,एकादशी को गरीबों को दान , ताबीज  भभूत  सब किया पर कुल की तारणहार नहीं बन पाई,  इतनी मुुरादों  से मााँगा गया वो अंकुुुर कोपल न हो पाया। लगा सब    खतम  हो गया, अस्पताल में ही सबके चेहरे चुुुगली कर रहे थे कि माँ होने का गौरव तूझे नहीं मिल पाएगा।। जो आया ही नही था उसके लिए सबके मन में हमदर्दी थी लेकिन मेरी आत्मा और शरीर दोनों चीर चुके हैं इसका किसी को अहसास नहीं था।

तूफान में मछुआरे जब डगमगाति नाव ले भयानक लहरों से जूझते हैं तो एक छोटी सी रोशनी की किरण देख कर ही हौसला पा जाते हैं और यहाँ तो गर्भ पूरे छ महीने रहा था तो सबको आशा बंधना स्वाभाविक था। फिर बार बार वही सब दोहराया गया, पर अब उतना दर्द नही होता था या शायद महसूस नही हुआ। पानी की तरह पैसा  बहा, परीक्षणों में खून बहा और हर दिन नई उम्मीद का आँसू बहा कर, आखिर कुदरत फिर एक बार  पुनः  मेहरबान हुई ,वही लाड़, हिदायतें, ताक़ीदे अबकी एक बालक आ जाये बस। डर इंसान को डरपोक बना देता है पर नवजीवन के  स्पंदन ने हृदय से डर को निकाल देने का प्रयास किया पर पूर्व के आशाओं के टूटे टुकड़े चुभते ही रहते थे। छठा महीना पार होते ही सबने राहत की साँस ली और शायद सोचा की कठिन समय चला गया पर सोचा कहाँ सत्य होता है, सत्य तो वो होता है जो घटित हो जाता है और दर्द की पुनरावृत्ति हो चुकी थी, मैं मां बन गई थी लेकिन मेरे प्रेम के मूरत रुप मे जीवन नही था। चीत्कार उठा मन 'हे प्रभु, जब गोद मे नही देना था तो गर्भ में भी क्यों दिया?' सबके रुआँसे चेहरे देख मन को खुद को ही दोषी मानने लगा। अस्फुट से स्वर सुनाई दिए "आरोग्य सेंटर,उदयपुर".....नहीं अब बस और नहीं, बहुत हुआ नहीं बनना मुझे गौरवशाली माँ। माँ बनने के लिए कितनी परीक्षा दूँ, शरीर को प्रयोगशाला बना दिया, कुलवंशज की उम्मीद में पूरे परिवार ने जीना  छोड़ दिया है,..... क्या किसी अनाथ बच्चे को गोद ले कर जीवन को संपूर्णता नही दी जा सकती। मुझे अपना गंतव्य दिख गया था, जीवन को मकसद देने के लिए यह जरूरी तो नही की वो जीवन मेरे गर्भ से ही प्रस्फुटित हुआ हो,अंकुर को सींच कर उसको पालना भी तो मातृत्व ही है।

दीपिका शर्मा नारायण

Image Source: carolaucourant



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