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@dawriter

बौड़मसिंह मर गया

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गाँव के दो महानुभवों के बीच टाइम पास के लिए बौड़म सिंह पर चर्चा चल रही थी।

गांव देहाती गाँव से कहीं ऊपर उठकर कुछ हद तक मॉडर्न गाँव बन रहा था। यहाँ अंग्रेजी का बहुत जोर था।

जगदीप ठाकुर ने पेड़ के तने से टेक लगाई और महिंदर बाबू - जो गाँव में एक मात्र 'बहुत' पढ़े लिखे प्राणी थे - के सामने जवाब टेक दिया "बौड़मसिंह मर गया।"

"हाँ जानते हैं हम" महिंदर उसी पेड़ के चबूतरे पर बैठे से लेट गए। बाकायदा हाथ का सहारा लेकर विष्णु भगवान की भांति पोज़ बना कर लेट गए। बाकी पंच 'पांच-पांच' पत्तों से 'पोकर' खेल रहे थे। खेल नया था इसलिए व्यस्त थे। सबके चेहरे पर काले धूप के चश्में थे।

"जानते हो तो ये भी जानते होगे कि काहे मर गया?" गर्मी बहुत थी, ठाकुर साहब ने भी चश्मा लगा लिया।

"जिसकी आती है बारी उसे जाना ही पड़ता है ठाकुर साहब!" महिंदर बाबू दार्शनिक हो गए।

"ज्यादा कन्हैया न बनो महिंदर बाबू, चार जमात पढ़े हो....."

महिंदर बाबू ने घूर के देखा।

"......अच्छा..अच्छा चौदह जमात पढ़े हो तो कोई अकल की बात भी करो, अच्छा-भला तो था, काहे मर गया।"

"हमें पता है, पर बताएंगे तो आप खिल्ली उड़ाओगे" महिंदर बाबू पेड़ पर बैठे पक्षी के पर गिनने की नौटंकी करने लगे। हालांकि पर दो ही होते हैं, दो ही थे।

"अरे नहीं महिंदर बाबू, काहे उड़ाएंगे खिल्ली, देखो मक्खी तक तो उड़ा नहीं रहे हम। चलो बताओ, जरा मन लग जाएगा। दुपहर कट जायेगी। अभी तीस का ही था सायद... फिर काहे मर गया। व्हाई?"

"व्हाई नहीं पूछिए हाउ?"

"हाउ?"

"काहे कि खुले में शौचने गया था।"

"का? का बके अभी?"

"खुले में हगने गया था ठाकुर साहब" महिन्दर बाबू ज़रा ज़ोर से बोले। पोकर वालों का ध्यान भंग हो गया। उन्होंने घूरा, महिंदर बाबू ने ठाकुर साहब की तरफ इशारा कर दिया।

ठाकुर साहब इशारे को इग्नोर कर के बोले "अरे, तो हम तो पचास साल से हग रहे हैं, हम तो कभी न मरे, ये तो बेतुके जा रहे हो।"

"नहीं, हम तुक पे ही हैं, वो हगने के कुछ देर बाद जलेबी खाने चला गया था।"

ये सुनकर ठाकुर साहब झट से सीधे हुए। चश्मा उतार कर बोले "तुम बौरा गए हो लगता है महिंदर, कभी हगने से मर गया कभी जलेबी से, अरे ऐसे मरते आमजन तो सारा गाँव रोज़ मर रहा होता। डेली बिना नागा, सिवाए गुड्डू के।"

"क्यों गुड्डू काहे नहीं?"

"ऊ तीन दिन में एक ही बार जाता है, इसलिए।"

"अरे ठाकुर साहब, बौड़म ने खुले में शौचा, अब उसके ऊपर एक मक्खी बैठ गया...."

"एक पल रुको, किसपे बैठा? बौड़म पे?"

"नाही, उसके मल पे"

"उसके मल पे मक्खी काहे बैठेगा? ओ का गुड़ हगता था?"

"का पता, हम नहीं जाँचे!" महिंदर बाबू ने कंधे उचकाए।

"ए मक्खी नहीं मक्खा बैठा होगा, मक्खी होती तो बैठती, नाही?" ठाकुर साहब ने अपनी व्याकरण नॉलेज बघारी।

"आप बैठने कहाँ दे रहे हैं, मक्खा हो या मक्खी, बैठने तो दीजिए, तभी आगे बताएँगे।"

"ओह, सारी, बताओ.... मल पे मक्खी बैठने से बौड़मसिंह कइसे मर गया?"

"मक्खी जो था...."

ठाकुर साहब ने घूरा

"....मक्खी जो थी, वो मल पर बैठी..." महिंदर बाबू ने गलती सुधारी "बौड़म घर चला गया। "मक्खी मल पर बैठी रही"

"अरे कब उठेगी?" ठाकुर साहब बेचैन हुए।

"अभी तो बैठी है...सब्र करिए"

"हमें घिन्न लग रहा है।" ठाकुर साहब ने नाक सिकोड़ी

"अच्छा चलिए उठा देते हैं..... हाँ तो मक्खी मल से उठी और सीधा, बिना दिसा ज्ञान के, नाक की टक्कर में...."

"मक्खी की नाक होती है?" ठाकुर साहब क्यूरियस हुए।

महिंदर बाबू ने घूरा

"....अच्छा-अच्छा, फिर कहाँ पहुंची?"

"वो सीधा नाक की टक्कर में डंठल हलवाई की दुकान पर पहुंची। वहां रखी थी जलेबी, वो उन्हीं पर बैठ गयी।"

"ये मक्खी का चरित्र ठीक नहीं लगता महिंदर बाबू... कभी कहाँ बैठती है 'छी छी', कभी कहाँ 'अहा', खैर, तुम बौड़म की मौत पर आओ" जलेबी सुन के ठाकुर साहब लार-भरे हो गए।

"हाँ.... तो मक्खी जिस जलेबी पर बैठी थी..."

"जलेबी पर.."

".....जिस जलेबी पर बैठी थी, वही जलेबी बौड़म ने खा ली।"

"तो मक्खी का जहर लगा आई? या बौड़म जहर हगता था?"

"का पता? हम नहीं जाँचे, का पता पेचिस हो?"

"का पता..." ठाकुर साहब भी दार्शनिक हुए "फिर का हुआ?"

"फिर याद नहीं? बस लग गए दस्त। हो गयी छुट्टी। कट गया टिकट। मर गया बौड़म, इतना दस्त किया कि कमजोरी से मर गया" इस तरह महिंदर बाबू ने बौड़म की मौत-मिस्ट्री सॉल्व कर दी।

ठाकुर साहब ने हुंकार भरी।

वो बड़ी शान से मुस्कुराए।

"अच्छा महेंद्र बाबू, ऐसे जलेबी खाने में तो जान का बड़ा खतरा है। का किया जाए?"

"खुले में करना बंद जाए और का किया जाए। घर पर ही किया जाए।"

"माने अपना घर हग भर वाली कहावत बना दें? तुम भी न महेंद्र निरे अज्ञानी हो। जिस आंगन में तुलसी मैया बिराजी वहां ये सब, छी,छी,छी.."

"अरे आंगन में नहीं ठाकुर साहब..."

"तो का छत पे? नाही भाई हमारे पोते खेलते..."

"ओहो, शौच बनवाइये, वो बेहतर विकल्प होगा।"

"अरे हाँ... ये बात सही, पर सारे गाँव का का होगा? कहीं मक्खी हमारी शौच न पाकर दिसा ज्ञान से भटक कर किसी और के मल पे.... हरी ॐ"

"तो उनके लिए भी बनवाइये। आखिर ठाकुर हैं आप"

ठाकुर साहब सोच में पड़ गए 'आधा सेर जलेबी खाने के लिए इतना खर्चा?'

फिर बोले "एक काम करिए महेंद्र बाबू, ठकुराइन से दो हाथ का सूती कपड़ा लीजिए, और डंठल हलवाई को दे आइए, कहिएगा कि ठाकुर साहब के लिए आधा सेर जलेबी इसमें ढक के रखा करे।"

 - समाप्त! (या आरम्भ)

खुले में शौच या खुले में खाना, दोनों सेहत के लिए हानिकारक हैं।

टॉयलेट_है_ज़रूरी

#सहर



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