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@dawriter

बहू की विदाई

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सुन कर ही अजीब लगता है ना विदाई तो बेटियों की होती है बहुओं का तो गृहप्रवेश होता है। पर आज जो कहानी मैं आपसे साझा करने जा रही हूं तो यही कहना सही होगा,गर्मियों की छुट्टियां आते ही बेटियाँ मायेके जाने की तैयारियों में लग जाती हैं,वो एक महीना पूरे साल अपने माँ पापा से दूर रहने का हौसला दे जाता है।चाहे कितने ही साल बाद मायेके जाना हो निगाहें हर जाने अनजाने चेहरे पहचानने की कोशिश करती हैं।आज मार्किट में यही कोशिश मेरी निगाहें कर रही थीं पर चेहरा याददाश्त के दरवाजे पर आता और दस्तक दे लौट जाता पर शायद उस चेहरे ने मेरी पहचान कर ली थी,तभी बड़े प्यार से उन्होंने दीपी पुकारा,"अरे हां ये तो गर्ग आंटी हैं" कहते मैं उनके गले लग गयी।गर्ग आंटी कॉलोनी की तेजतर्रार औरतों में गिनी जाती थीं, जब उनका डॉक्टर बेटा विजातीय बहु ले आया था तो कितने दिन सब ने बिना टिकट तमाशा देख था।शादी के बाद भी यही सुनते रहे कि सास बहू की बिल्कुल नहीं पटती और सुवर्णा सिर्फ पत्नी बन पाई ,बहु नही।

आंटी मेरा हालचाल पूछ ,घर बुला रही थीं कि एक नया चेहरा शायद नए लोग थे ,आंटी से पूछने लगे ,"बेटी कैसी है.".......बेटी!! आंटी का तो एक ही बेटा है फिर यह बेटी कौन  है ,पर कुछ उम्र की सीमा कुछ पहचान की बेड़ी मैं चाह कर भी पूछ ना पायी। पर घर लौटने पर मम्मी से जो पता लगआ वो मुझे झकझोरने के लिए काफी था।

आंटी के बेटे की शादी के साल में ही हार्ट अटैक से मौत हो गई थी और जिस समय यह हुआ था,सुवर्णा सब से अनजान उसके अंश को धरती पर लाने के लिये संघर्ष कर रही थी सब लोगों को सुवर्णा से पूरी हमदर्दी थी  एक तो  बेचारी अनाथ ऊपर से आंटी जैसी सास,सब यही सोचते थे कि आंटी तो अब उसका जीना ही दुश्वार कर देंगी पर मम्मी ने जो बताया वो मेरी सोच से बिल्कुल ही परे था।अरुण की मौत के छह महीने के अंदर ही आंटी ने अपने भतीजे से सुवर्णा की ना केवल शादी कर दी बल्कि कन्यादान भी खुद ही किया।

सब सुनने के बाद आंटी से मिलने की इच्छा और तेज हो गई और अगले दिन मैं उनके घर पहुच गयी,हॉल में अरुण की एक भी तस्वीर नहीं थी पर सुवर्णा की शादी के वहुत फ़ोटो लगे थे।मुझे ताकते देख आंटी बोली,"जो तेरे मन में आ रहा है मैं जान गई हूं पर शायद यही सही था।अरुण के जाने के बाद मैं बिल्कुल टूट गई थी न तो मुझे बहु का होश था न पोती का".....",सारा दिन उसके कमरे में बैठ उसके कपड़ों, किताबो को छू कर महसूस करती,सहेजती पर जी चीज मेरे बेटे को सबसे प्यारी थी उसे तो मैंने अनदेखा ही कर दिया।धीरे धीरे लोगों ने कहना शुरू कर दिया "बहु मनहूस है निकाल बाहर करो इसे"। झूठ नहीं बोलूँगी तुझसे,"...मन में आया कई बार ....पर सुवर्णा को देख के महसूस किया, यह कैसे मनहूस हो सकती है, इसका जीवन तो शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया"। जानती थी पढ़ी लिखी है नौकरी पेशा है संसाधन तो जुटा लेगी पर रिश्ते कैसे पिरोयेगी तो बस मैं उस अनाथ की माँ बन गयी और मैंने अपनी गोद भी भर ली। अरुण की यादें ही हमारे बीच का सेतु बन गईं।

आज के समय में जब सब अपने बारे मे सोचते हैं आंटी ने सुवर्णा के बारे में सोचा। सच ही है रिश्ते तो रेशमी बंधन हैं जो सुलझाते सुलझाते भी उलझ ही जाते हैं।


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