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@dawriter

फैसला

2 118       

विष्णु अपने दादाजी के साथ, अपने गाँव “गंधार” में  रहता था। कुछ समय पहले तक गाँव में उसके परिवार के सभी लोग साथ में रहते थे। पर जब से विष्णु के पिताजी की नौकरी पटना  शहर में लगी थी, विष्णु की माँ और उसकी दोनों बहन अपने पिताजी के साथ पटना चली गयी थी रहने। शहर में पढ़ाई की सुविधा ज्यादा अच्छी थी। गंधार जैसे गाँव जहाँ बिजली और पढाई जैसे महत्वपूर्ण चीज़ों का आभाव था। वहीं पटना में इन सब चीज़ों की आरामदेह था। विष्णु के पिताजी, विष्णु को भी अपने साथ ले जाना चाहते थे। पर न तो विष्णु जाने को तैयार हुआ, और न ही दादाजी की इच्छा थी की विष्णु उनको छोड़ कर जाए। सब लोग शहर आ चुके थे। गाँव में केवल विष्णु और दादाजी ही थे  । 
 
सब के एकाएक चले जाने के बाद विष्णु उदास रहने लगा था। इस बात का एहसास दादाजी को हो चूका था। दादाजी, सोनपुर के पशु मेला से एक पामेरियन(झबरा) कुत्ते के बच्चे को गाँव ले आये। भूरे और पीले रंग का कुत्ते का बच्चा का नाम “बन्नी” था। वो केवल आठ महीने का था। विष्णु, कुत्ते का बच्चा देख कर काफी खुश था। वो बन्नी का ख्याल काफी अच्छे से रखता था। 
 
विष्णु रोज़ बन्नी को सुबह - शाम घुमाने ले जाता था। हर रविवार को बन्नी को नहलाया करता था। बन्नी और विष्णु में दोस्ती हो गयी थी। बन्नी रोज़ रात को विष्णु के बिस्तर पर सो जाता था, और रोज़ सुबह चिल्ला कर विष्णु को जगा देता था। विष्णु अगर किसी काम से बाहर जाता था, तो बन्नी गेट पर बैठा उसका इंतज़ार करता रहता। जब तक विष्णु लौट कर नहीं आता, तब तक बन्नी वहीं गेट पर बैठा इंतज़ार करता, और जैसे ही विष्णु आ जाता, बन्नी ख़ुशी से कूदने लगता। उसके बाद विष्णु अपने गोद में बन्नी को ले लेता, और बन्नी, विष्णु के शरीर को चाटने लगता। शायद वो अपना प्यार विष्णु के प्रति इस तरह ज़ाहिर करता। ठण्ड में विष्णु ने बन्नी के लिए एक छोटा सा रजाई ला दिया, लेकिन बन्नी रात को अपने रजाई से निकल कर विष्णु के रजाई में चला जाता।
 
सब कुछ अच्छा चल रहा था, लेकिन समय की चाल को कौन समझ पाया है। दादाजी की मृत्यु हो चुकी थी। अब विष्णु के पास कोई रास्ता नहीं, पटना जाने के अलावा। विष्णु के पिताजी बन्नी को पटना लेकर नहीं जाना चाहते थे। पर विष्णु अपनी जिद पर अड़ गया। और उसकी ज़िद के सामने पिताजी को झुकना पड़ा। 
 
विष्णु और बन्नी पटना आ चुके थे। दोनों के लिए यह जगह बिलकुल नयी थी। 
 
बन्नी नयी जगह के कारण काफी डरा हुआ था, और इस डर से उसने घर में ही गंदगी कर दिया। इस बात से पिताजी काफी नाराज हुए, और विष्णु को गंदगी साफ़ करना पड़ा। विष्णु काफी उदास था, बन्नी को लेकर घर में कोई भी खुश नहीं था। पिताजी ने आदेश दिया की बन्नी को बालकॉनी में सोना होगा। यह सुन कर विष्णु अंदर से सहम गया। उसके मन में तरह - तरह के सवाल आ रहे थे। की बन्नी रात में अकेले बालकॉनी में कैसे सोयेगा ? रात को ठंडी हवा में वो बीमार ना हो जाए ? 
 
इस बेचैनी के कारण विष्णु उस रात मन से खाना नहीं खाया, जबकि माँ ने विष्णु के पसंद के सभी पकवान बनायीं थी। विष्णु से ज्यादा डरा हुआ बन्नी था, बन्नी पुरे दिन और रात में कुछ नहीं खाया। रात को सभी खा कर सो गए और बन्नी को अकेले बालकॉनी में बंद कर दिया गया। बन्नी पूरी रात बालकॉनी से चिल्लाता रहा। पर किसी ने बालकॉनी की गेट को नहीं खोला। पिताजी का सख्त आदेश था, की कुत्ते को घर में नहीं घुसने देना है रात को, कहीं सुबह की तरह फिर से गंदगी न कर दे। उस रात न ही विष्णु सो सका, और न ही बन्नी। विष्णु को पूरी रात अपने दादाजी की याद आती रही। दूसरे दिन सबसे पहले विष्णु उठ के बालकॉनी गया, और बन्नी से मिला। विष्णु ने देखा की बन्नी ने रात में कुछ नहीं खाया था, और बन्नी के आँखों में आँसू थे। बन्नी, विष्णु के पूरे शरीर को अपने जीभ से चाट रहा था, मानो सालो बाद वो विष्णु से मिला हो। 
 
दूसरे दिन विष्णु अपना सारा सामान ऊपर वाले कमरे में शिफ्ट कर लिया, और साथ में बन्नी को भी ऊपर वाले कमरे में ले गया। ऊपर वाले कमरे में कोई नहीं जाता था, इसलिये विष्णु को यह जगह सही लगा। 
 
पिताजी इस बात से नाराज़ थे, पर माँ के समझाने पर पिताजी ने विष्णु को कुछ भी नहीं कहा। 
 
विष्णु को पटना के स्कूल वेस्ट पॉइंट पब्लिक स्कूल में दाखिला दिलवा दिया गया। क्लास 3 में उसका दाखिला हो गया। अब वो रोज़ स्कूल जाने लगा, जब तक वो स्कूल में रहता, तब तक बन्नी को बालकॉनी के गेट में ज़ंजीर में बाँध दिया जाता था। जब विष्णु स्कूल से आता तो बन्नी को ज़ंजीर से आज़ाद कर देता, और उसे अपने ऊपर वाले कमरे में ले जाता और फिर वो बन्नी को दोपहर का खाना दे देता। शहर में दोनों का जीवन जीने का ढंग बदल चूका  था, जिसे धीरे - धीरे इन दोनों ने अपना लिया था। 
 
विष्णु को स्कूल में दो दोस्त बन गए थे - “बिपुल” और “अभिलाष”। विष्णु के दोनों दोस्त हर रविवार को विष्णु के घर आते, और फिर सब मिल कर बन्नी के साथ खेलते। अभिलाष के घर में पहले से ही दो कुत्ते उसके पास थे, और उसके घर के सभी लोग कुत्तों से लगाव रखते थे। वो विष्णु को हमेशा कहता था कि बन्नी को उसके हवाले कर दे। 
 
भाई, बन्नी को मुझे दे दे - अभिलाष ने कहा,
 
नहीं, यार मैं बन्नी तूझे नहीं दे सकता, इसके बिना मैं नहीं रह सकता और मेरे बिना वो नहीं - विष्णु हमेशा यही जवाब देता।
 
समय अपने हिसाब से चल रहा था। 
 
एक बार ठण्ड के मौसम में, रात के समय घर में रखे एक बड़े से गुलदस्ते में से एक प्लास्टिक के पत्ते को बन्नी ने नोच के फाड़ दिया। इस बात से पिताजी काफी नाराज हुए। और गुस्से में अपना आदेश दिए की कुत्ता को घर में रखा जाता है, कुत्ता को बाहर रखो। उस ठण्ड के रात में बन्नी को घर से बाहर बगीचे में भेज दिया गया। इस बात से विष्णु नाराज़ था, पर वो कुछ बोल नहीं सका। दूसरे दिन बन्नी की तबियत काफी ख़राब था, उसे ठण्ड लग गयी थी। वो न तो कुछ खा रहा था और न ही पानी पी रहा था। वो सही से उठ भी नहीं पा रहा था। विष्णु ने तुरंत अपने दोनों दोस्त बिपुल और अभिलाष को फ़ोन कर के अपने घर बुला लिया। फिर तीनों मिल के बन्नी को पटना के वेटेनरी हॉस्पिटल ले गए, और वहाँ पर बन्नी का इलाज हुआ। इलाज़ और दवाई का सभी खर्चा तीनों दोस्तों ने मिल के उठाया। विष्णु के घरवालों ने बन्नी के इलाज के लिए एक रुपया तक नहीं दिए। इलाज़ के बाद बन्नी को अभिलाष अपने यहाँ ले गया। विष्णु नहीं चाहता था कि बन्नी को दुबारा ठण्ड में बाहर सोने की सजा मिले। 
 
पर दो दिन विष्णु न किसी से भी घर में बात नहीं किया। माँ को विष्णु का यह हाल ठीक नहीं लगा। उन्होंने विष्णु के पिताजी से बात की, और बन्नी को दुबारा घर में लाने के लिए राज़ी कर ली। 
 
विष्णु ख़ुशी से अभिलाष के घर गया। विष्णु को देखते ही बन्नी ख़ुशी से चिल्लाने लगा। अभिलाष ने विष्णु को बताया - अरे भाई दो दिन से केवल बन्नी चिल्ला रहा है, कुछ खाया भी नही है,
 
खाया तो इसने भी कुछ नहीं है, दो दिनों से - पीछे से बिपुल ने कहा,
 
क्या ? ये सच है क्या - अभिलाष ने विष्णु से पूछा,
 
विष्णु ने सर को हाँ में हिला के जवाब दिया, सर हिलाते वक़्त उसके आँखों में आँसू थे।
 
भाई तू महान है, इतना प्यार जानवर से - अभिलाष ने कहा,
 
।।।।।
 
ज़िन्दगी ऐसी ही चल रही थी,,,
 
तेरह साल बाद।।।
 
विष्णु और अभिलाष पटना में ही है। बिपुल भोपाल में इंजीनियरिंग कर रहा है। लेकिन छुट्टी में घर आया हुआ है। शाम का समय है। तीनो ए.जी कॉलोनी के पार्क में बैठे हुए है। और बातें कर रहे है। तभी,,
 
अरे विष्णु, बन्नी कैसा है ? - बिपुल ने पूछा,
 
ठीक है, पर अब वो बुड्ढा हो चूका है। अब पहले की तरह बदमाशी नहीं करता है, अब उसमे उतनी ताकत नहीं बची है - विष्णु ने कहा,
 
घर में सब उसको अब पसन्द करते है या नहीं - बिपुल ने दुबारा पूछा,
 
नहीं यार, अब तो और ज्यादा उससे नफरत करते है - विष्णु ने कहा,
 
क्यों - बिपुल ने पूछा,
 
भाई अब बन्नी बीमार रहने लगा है, पिछले चार दिनों से उसने कुछ नहीं खाया है, और उसके शरीर के पिछले हिस्से में कीड़ा लग गया है। उसको बैठने में तकलीफ होती है। कल रात अपने हाथ से उसको दूध पिलाए थे, दो घूँट पीने के बाद उसने नहीं पिया। ऊपर वाले सीढ़ी के पास उसका बिस्तर कर दिया गया है। कैसे भी कर के वो उसपर चुपचाप लेटा रहता है। अब तो मुझे देखने पर भी नहीं चिल्लाता है। उसका दर्द मुझसे देखा नहीं जाता है। उसके आँख से केवल आँसू गिरते रहते है। घरवाले उससे घृणा के नज़रो से देखते है - विष्णु ने बन्नी का हाल बताया,
 
अरे कल उसको वेटनरी ले कर चलते है, सब ठीक हो जायेगा - अभिलाष ने कहा,
 
हाँ मैं भी यही सोच रहा था - विष्णु ने कहा,
 
अच्छा सुन, अभी मैं निकलता हूँ। कल मिलते है - अभिलाष ने यह कह कर निकल गया।
 
भाई मेरे मन में एक विचार है - विष्णु ने बिपुल को कहा,
 
क्या - बिपुल ने पूछा 
 
विष्णु ने अपने विचार बिपुल को बता दिया। 
 
क्या तुम सोच समझ के यह फैसला लिए हो - बिपुल ने पूछा,
 
हाँ - विष्णु ने कहा,
 
ठीक है तो कल वेटनरी में मिलते है।।
 
।।
 
दूसरे दिन, दोपहर 11 बजे। वेटेनरी हॉस्पिटल।
 
विष्णु, अभिलाष, बिपुल और बन्नी तीनों जानवर के डॉक्टर के केबिन में थे।
 
विष्णु ने बन्नी के वर्तमान हाल और बीमारी के बारे में बताया।
 
डॉक्टर ने बन्नी का चेकउप किया। चेकउप करने के बाद डॉक्टर बोले - देखिये विष्णु, एक आम कुत्ते का जीवनकाल 8-12 साल तक का होता है। और झबरा कुत्ते का उम्र तो केवल 8-10 साल तक ही होता है। और आपका कुत्ता तो 14 साल का चूका है। अब वो कितना जियेगा, जब तक है तब इसका ध्यान रखिए। इससे ज्यादा मैं क्या बोल सकता हूँ।
 
सर मैं कुछ कहना चाहता हूँ - विष्णु ने डॉक्टर से कहा,
 
हाँ कहिये - डॉक्टर ने कहा,
 
आप बन्नी को हमेशा के लिए मुक्ति दे दीजिए - विष्णु ने कहा,
 
मतलब - डॉक्टर ने अजीब नज़र से विष्णु के तरफ देखते हुए पूछा,
 
मतलब यह की आप ऐसा कोई इंजेक्शन बन्नी को दे दीजिए, जिससे वो हमेशा के लिए सो जाए। और उसे कोई तकलीफ न हो। मुझसे अब उसकी तकलीफ नहीं देखी जाती है, और मैं नहीं चाहता की लोग इसको घृणा की नज़रो से देखे। वो कुछ खा नहीं रहा है, न अपने जगह से हिल पाता है। एक तड़प वाली मौत से अच्छा है उसे एक बार में शांति वाली मौत दे दीजिए - विष्णु ने यह बात बोला। और यह बात बोलते वक़्त उसके आँख में केवल आँसू थे।
 
बिपुल को छोड़ कर, अभिलाष और डॉक्टर आश्चर्य थे। दोनों इस तरह की स्तिथि के लिए बिलकुल तैयार नहीं थे।
 
आप एक बार फिर सोच लीजिये विष्णु - डॉक्टर ने कहा,
 
हाँ मैंने फैसला ले लिया है - विष्णु ने कहा,
 
ठीक है मैं कागजात तैयार करवाता हूँ - डॉक्टर यह बात बोल के अपने केबिन से निकल गए। वो कागजात लाने गए थे।
 
ये क्या कर रहे हो, तुम बन्नी को मार रहे हो - अभिलाष ने विष्णु से पूछा,
 
वो कुछ गलत नहीं कर रहा है, बन्नी के अच्छे के लिए विष्णु ने यह फैसला लिया है - बिपुल ने कहा,
 
तुम्हे पता था, इस फैसले के बारे में - अभिलाष ने बिपुल से पूछा,
 
हाँ मुझे कल शाम में विष्णु ने बताया था, तुम्हारे जाने के बाद - बिपुल ने कहा,
 
पर भाई किसी की जान लेना गलत है - अभिलाष ने कहा,
 
नहीं यह गलत नहीं है, क्योंकि तुम समझ नहीं पा रहे हो - बिपुल ने कहा,,
 
इन दोनों से अलग,,
 
विष्णु केवल रोये जा रहा था। वो बन्नी को अपनी गोदी से नीचे नहीं उतार रहा था। वो बन्नी के शरीर को सहलाये जा रहा था। और बन्नी विष्णु के हाथ को आने जीभ से चाटे जा रहा था। बन्नी को देख कर लग रहा था कि अब वो खुश है। 
 
विष्णु को केवल वो दिन याद आ रहा था, जब बन्नी पहली बार बन्नी को दादाजी घर में लेकर आये थे। छोटा सा कुत्ते का बच्चा, घर आते ही बन्नी सबसे पहले विष्णु के गोदी में चला गया था। और पूरा दिन उसके गोदी से नहीं उतरा था। 
 
यह सब सोच सोच के विष्णु के आँखों से आँसू लगतार गिरे जा रहे थे। हर आँसू की बूँद बन्नी के बीमार शारीर पर गिर रही थी। जिससे उसको ठंडक मिल रही थी। विष्णु बार - बार अपने मन में यह बोल रहा था कि डॉक्टर दुबारा इस रूम न आये।
 
बीस मिनट बाद डॉक्टर अपने केबिन में आ गए। डॉक्टर को देखते ही बिपुल और अभिलाष दोनों के आँखों में आँसू आ गए। 
 
डॉक्टर ने कागजात पर हस्ताक्षर करने के लिए विष्णु को बोला। विष्णु रोते - रोते उस कागजात पर अपने हस्ताक्षर कर दिया। 
 
डॉक्टर ने अपने इंजेक्शन में दवाई डालने लगे। यह देख कर विष्णु रोने लगा। उसकी रुदन देख कर अभिलाष भी रोने लगा। डॉक्टर ने दोनों को केबिन से जाने को कहा। 
 
विष्णु ने बन्नी के माथे पर चूमा, और केबिन से निकल गया। उसके साथ अभिलाष भी था।
 
केबिन में डॉक्टर, डॉक्टर का सहयोगी और बिपुल था। तक़रीबन तिस मिनट बाद बिपुल, बन्नी की लाश को अपने गोदी में लेकर निकला। बन्नी की लाश को देख कर विष्णु, अभिलाष और बिपुल तीनों रोने लगे। उनकी आवाज़ में दर्द था। विष्णु बार - बार बन्नी के शरीर को हिला रहा था, पर बन्नी का शरीर एकदम ठंडा पर चूका था। उसके शरीर में कोई हलचल नहीं थी। वो बेजान हो चूका था।
 
।।।
 
बन्नी के लाश को दीघा हाट में गँगा नदी के पास के मैदान में तीनों ने दफना दिया। विष्णु को घर जाने का बिलकुल मन नहीं था। पर ज्यादा शाम होने पर बिपुल ने उसे घर चलने को कहा। वो बिपुल की बात का जवाब दिए बिना घर की और चल पड़ा। 
 
रास्ते में एक फोटो वाले के यहाँ रुक कर एक फोटो लिया। यह बन्नी की तस्वीर थी। शायद विष्णु ने पहले ही आर्डर कर दिया था। 
 
वो तस्वीर लेकर घर आ चुका था।।।।


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