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@dawriter

प्रतीक्षा उस दिन की

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प्रतीक्षा उस दिन की

हमारे समाज में लड़की का जन्म आज भी दुःख की बात मानी जाती है, शहरों में कुछ बदलाव आया है, मानना होगा परंतु शहर के लोग भी पढ़े लिखे होने के बावजूद, बेटे के जन्म पर अधिक प्रसन्न होते हैं। भ्रूण हत्या आज भी प्रचलित है, बेटी को बोझ समझ जाता है जबकि सच तो यह है कि बेटियाँ ही अधिकतर माता-पिता की देख -भाल करती हैं, बेटे नहीं।महिलाओं को प्रायः घरेलू हिंसा का शिकार होते जाता है। शर्म की बात है कि आज भी हमारा पुरुष वर्ग महिला पर बल प्रयोग को ही अपने पौरुष की कसौटी समझता है। अरे भई, अपना पौरुष वहां दिखाओ जहाँ किसी महिला का अपमान होता दिखे, वहां दिखाओ जहां किसी बेसहारा को सहारे की आवश्यकता हो अथवा वहां दिखाओ जहाँ किसी का शोषण हो रहा हो। वैसे मैं तो कहूँगी कि अब बहुत हुई शराफत, और बहुत हुआ समझौता, अब महिलाओं को जवाब देना सीखना होगा। दहेज के नाम पर हमारी बहू -बेटियों को ज़िंदा जला दिया जाता है, बेटी को पराया धन समझ कर न तो विवाह से पहले अधिक तरजीह दी जाती है, न विवाह के बाद। क्या यही है सशक्तिकरण? हम समझते हैं कि यह हालात शहरों में नहीं हैं - परंतु ऐसा नहीं है, शहर में कुछ काम अवश्य है किन्तु है।

कल परसों ही टी वी पर देख रही थी कि दंगल फिल्म में काम करने वाली ज़ायरा वसीम ने ट्विटर के माध्यम से कश्मीर से माफ़ी मांगी है, अपनी उस भूल के लिए जो उसने की ही नहीं। आज देश की सोलह वर्ष की बच्ची इतनी डरी हुई है यह देखकर मन में आया कि यह कैसा देश हो गया है मेरा जहाँ एक बच्ची खुद को इतना अशक्त महसूस कर रही है! यह कैसा नारी सशक्तिकरण का ढोल पीटनेवाला देश है मेरा!

कहने -सुनने में बहुत अच्छा लगता है कि हमारा देश विश्व की बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है और इसमें हमारे देश की महिलाओं का बड़ा योगदान है। आधी आबादी और अन्य आधी आबादी को जन्म देने वाली स्त्री का समाज के प्रत्येक क्षेत्र में हाथ और साथ प्राप्त हुआ है समाज को, किन्तु फिर भी क्या आज हम गर्व से यह कह सकते हैं कि भारत की नारी एक सशक्त नारी है?यदि स्वयं को धोखा देना चाहें तो आप यह मान सकते हैं और अपने आप को और भारत की तथाकथित स्वतंत्र और सशक्त नारी को छल सकते हैं, परंतु यदि सच कहूँ तो आज देश स्वतंत्र होने के इतने वर्षो के बाद भी नारी की स्थिति में कोई विशेष अंतर नहीं आया है।

कहीं आप यह तो नही सोच रहे की यह कैसी नकारात्मक बात है! जी नहीं नकारात्मक तो नहीं पर यदि कड़वा लगा तो माफ़ी चाहूंगी, लेकिन यह सच है।भारत की महिलाएं जीवन भर पिता, पति व पुत्र की अधीनता में रहती हैं। जन्म के ठीक बाद पिता के रूप में एक पुरुष उसका संरक्षक बन जाता है, जिसकी छत्रछाया में उसका जीवन आकार पाता है, अक्सर पिता अपनी बेटियों को जी जान से पालते- पोसते हैं, किन्तु उनके भविष्य का हर फैसला, उनके विवाह तक वे स्वयं लेते हैं। उसे कब क्या करना है, कहाँ जाना है कहाँ नहीं जाना, कब जाना कब आना है, क्या पढ़ेगी, क्या करेगी और कब और किस से उसका विवाह होगा-यह सब वह अपनी मर्जी के अनुसार नहीं कर सकती।

विवाह के पश्चात कुछ ज़्यादा नहीं बदलता बस अधिकारी पुरुष बदल जाता है, जो कल तक कुछ करने से पहले पिता का मुंह तकती थी अब वह पति का मुँह तकती है।

प्रायः देखा जाता है कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने पर भी एक स्त्री केवल अपने वस्त्राभूषण अथवा बच्चों की छोटी- मोटी ज़िद पूरी करने तक तो स्वयं निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होती हैं क्योंकि वह धनार्जन करती है, किन्तु कोई बड़ा निर्णय लेने का अधिकार उसे प्राप्त नहीं होता। हमारा समाज एक पुरुष सत्तात्मक समाज है जहाँ नारी आज भी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।

भारत की नारी निश्चित रूप से निरंतर संघर्षरत है। आज लगभग ६५ प्रतिशत महिलाएँ साक्षर हैं तथा स्वयं को एवं अपने परिवार को आर्थिक रूप से मज़बूती प्रदान कर रही हैं। वे कंधे से कन्धा मिला कर देश को प्रगतिशील बनाने में जुटी हुई हैं। सरकार ने भी बहुत सी योजनाओं के माध्यम से महिला को सशक्त बनाने की दिशा में काफी कार्य किया है, परंतु फिर भी हम यह नहीं कह सकते कि वह सशक्त हो रही है। इसके कई कारण हैं जिनमे सब से बड़ा कारण है अशिक्षा और दूसरा बड़ा कारण है -हमारे समाज की पुरुष प्रधान सोच।

आप सोच रहे होंगे कि अब तो देश में. साक्षरता का आंकड़ा अच्छा खासा है, जी हाँ हम कह सकते हैं, लेकिन अशिक्षा आज भी बड़े पैमाने पर अपनी जड़ें जमाए हुए है, क्योंकि हम सब जानते हैं की साक्षर होना और शिक्षित होना दो अलग बातें हैं।

यदि महिला शिक्षित होगी तभी कुछ हद तक सशक्त बन सकती है। कुछ हद तक इसलिए क्योंकि शिक्षित होने के बाद कम से कम वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकती है। हमारे देश की लगभग सत्तर प्रतिशत आबादी गाँवों में बसी है और गाँव की महिलाएं आज भी साक्षर तो हैं, परंतु शिक्षित नहीं अतः वे पूर्ण रूप से पुरुष पर निर्भर है शहर की महिलाएं काफी हद तक आर्थिक निर्भरता प्राप्त कर चुकी हैं।

सशक्तिकरण की जब हम बात करते हैं तो वह आर्थिक के साथ साथ सामाजिक, राजनितिक हर प्रकार से सशक्त होने की बात होती है। यह देश वो देश है जहाँ नारी को देवी, लक्ष्मी और दुर्गा कहा जाता है। जहाँ ' यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ' का पाठ पढ़ाया जाता है, और स्त्री सशक्तिकरण के नाम पर नारी को मूर्ख बनाने का दिखावा अक्सर होते देखा जाता है लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि इस देश की महिला आज भी पुरुष के अधीन ही जीवन बिता रही है।

न केवल गाँव की स्त्रियां वरन शहर की शिक्षित एवं कामकाजी महिलाएँ भी पूर्ण रूप से सशक्त नहीं है।

यहाँ बात आरम्भ होती है सही मायने में सशक्त होने की। मैंने प्रायः यह अनुभव किया है की हमारे समाज में पढ़ी लिखी, नौकरी पेश महिलाओं की दशा और भी दयनीय है। वह अपने परिवार को एक अच्छा जीवन देने के लिए हर दिन संघर्षरत है।घर- बाहर की परस्थितियों से अकेली ही लोहा ले रही है। इस प्रकार देखें तो लगता है कि सचमुच महिलाएं सशक्त हैं, किन्तु आज भी कितने परिवार ऐसे हैं जहा घर की स्त्री को महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने की स्वतंत्रता है? न के बराबर ही समझिये। अधिकतर हमारे पुरुष उन्हें इस योग्य समझते ही नहीं कि वे कोई निर्णय लेने में सक्षम हैं बल्कि कभी- कभी तो उनसे पूछना या उन्हें बताना भी आवश्यक नहीं समझा जाता। जब तक हमारे समाज की मानसिकता नहीं बदलेगी तब तक सशक्तिकरण की बात अपूर्ण रहेगी। हमारे समाज में कई पुरुष तो उन्हें गाड़ी चलाने योग्य तक नहीं समझते। सड़क पर महिला ड्राइवर के लिए ' बिवेयर ऑफ़ लेडी ड्राइवर्स ' तक लिखा देखा है मैंने कई वाहनों के पीछे।पुरुष जब तक उन्हें सशक्त बनाने की बात नहीं सोचेंगे और बराबर का अधिकार नहीं देंगे तब तक सरकार की हर योजना विफल रहेगी।

कैसा सशक्तिकरण जब उसे इतना भी अधिकार नहीं कि वह अपने जीवन से जुड़े फैसले ही कम से कम खुद ले सके! कैसा सशक्तिकरण जब उसके प्रेम और विवाह तक के मामलों में पंचायते हस्तक्षेप करें, वह अपने ही देश में स्वतंत्र विचरण करने से भी आतंकित रहने लगे।यह कैसी शक्ति है!

यदि सचमुच इस देश के लोग नारी को सशक्त देखना चाहते हैं तो पुरुष समाज को आगे आना होगा। नारी को समानता का अधिकार जमीनी स्तर पर देना होगा, उसे अपने से आगे बढ़ते देख कर प्रसन्न होना सीखना होगा, घर का काम-काज करने में उसकी सहायता को शर्म की बात समझना छोड़ना होगा। आगे बढ़ कर दहेज का विरोध करने की पहल करनी होगी, अपनी पत्नी, बहन और बेटी के विचारों को मान देना होगा।

जिस दिन हमारा समाज एक स्त्री को मानसिक रूप से स्वतंत्र और सशक्त बनाने के प्रयास की दिशा में आगे बढ़ना सीखेगा उस दिन सशक्त हो जाएगी भारतीय नारी।जिस दिन खाप पंचायतें उसके जीवन की ठेकेदार नहीं होंगी, उस दिन सशक्त हो जाएगी वह, जिस दिन उसे घर से बाहर निकलने में भूखे भेड़ियों का भय नहीं होगा, जब वह घर के फैसलों में भागीदार बनेगी, जब वह अपने गर्भ में पल रही संतान की रक्षा उस समाज से करना सीख जाएगी जो आज भी केवल लड़कों को ही अपने वंश का संचालक समझ कर अजन्मी बच्चियों को जान से मार डालते हैं -उस दिन -हाँ, उस दिन सशक्त हो जाएगी मेरे देश की नारी। आइए मिलकर करें प्रतीक्षा, उस दिन की।

#womenempowerment



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