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@dawriter

परवरिश

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हाथ की किताबें आले पर रख वह वहीं से चिल्लाया " अम्मी खाना दो। "
"देती हूं हाथ मुँह धोके आ पहले। "
उसने जैसे ही उसके हाथ में कटोरी थमाई वो ठुनका "ऊँ हूँ फिर से चूड़ा दूध। नहीं खाऊंगा। तुमने कल भी यही खिलाया था और कहा था कल सालन बनाऊंगी पक्का। "
उसने हामिद की ठुड्ढी पकड़ कर पुचकारा " खा ले बेटा। देख न कितना काम है सबको कल ही सिल के देना है। "
उसने पैर पटका "परसों सिल के दोगी तो क्या होगा ? "
"नहीं बेटा पंद्रह अगस्त तो कल है न। झंडा तो कल ही फहरेगा सबका। "
पेट का कीड़ा उसके दिमाग में घुस गया " क्यों फहराते हैं झंडा? "
उसके बालों में हाथ फेरते हुए रजिया मुस्कुराई " ये तिरंगा झंडा हमारे मुल्क की पहचान है। इसे ऊँचा करके इसलिए फहराते है ताकि दुनिया में हमारी पहचान कायम रहे। "
"कितना ऊँचा, इतना ",उसने दोनों हाथ उठाए।
"बहुत ऊँचा , सबसे ऊँचा ", रजिया ने सुर मिलाया।
वह तैयार झंडों की तरफ लेने के लिए झुका "मैं एक ले लूं।"
रजिया तिपाये से हड़बड़ाती हुई उठी "अरे अरे ये खेलने की चीज नहीं है। "
तबतक वह एक झंडा लेकर लहराते हुए फरार हो चुका था।
************************************अरे अरे कहते हुए वो दरवाजे तक उसके पीछे आई तो सकीना भी उसकी तरफ तेजी से आती दिखी। वह रूक गई , जरूर अनहोनी कोई बात है। वरना इस उम्र में खाला इतनी तेजी से न दौड़ती। रजिया जब निकाह करके आई थी तब ससुराल के नाम पर यही सकीना खाला ही तो थी, पड़ोसी कम सास ज्यादा।
मोहल्ले वालों ने बताया शकील की अम्मी तो अक्सर बीमार ही रहती थी। शकील को इन्होंने ही पाला था। बेटे जैसा मानती थी उसको। लेकिन शकील बुरी संगत में पड़ गया था। एकदिन खाला से जबानदराजी कर बैठा तबसे बोलचाल बंद हो गई। रजिया निकाह कर के आई तब शकील की गैरहाजिरी में आने लगी कभी कभी। उसके होने पर खाला बहुत जरूरी होने पर ही देहरी पर कदम रखती। वह भी अपनी नहीं बल्कि रजिया और हामिद की जरूरतों के लिए।
शकील तो छह महीने से जाने कहाँ गायब है।
लेकिन उसके किये से खाला ने मदद से हाथ खींचने शुरू कर दिये हैं।

सकीना थोड़ी दूरी पर ही रूककर हांफने लगी। सांसों को जैसे तैसे काबू में करते हुए बोली "शकील मिल गया , टीवी में दिखा रहे। "
रिश्ते में दूरी चाहे जितनी बढ़ गई थी लेकिन शकील से मोहब्बत आज भी थी ,सकीना को भी ,रजिया को भी।
दरवाजे को कुंडी लगा वह सकीना बी के पीछे हो ली।
उनके घर पहुंची तो खालिद कुर्सी पर जमा हुआ था सकीना खाला का पोता जो शकील से दो चार साल ही छोटा था। न दुआ न सलाम उल्टे उपेक्षा से उसने देखा रजिया को। उसे अखरा तो जरूर कि सकीना खाला की तालीम को क्या हो गया। लेकिन उसका मन तो शकील की खबर में अटका था।
सकीना बी खुद भी उद्वेलित थी "अरे समाचार लगाओ ना। "
खालिद ने झिड़क दिया " अभी पांच मिनट प्रचार देगा उसके बाद देगा समाचार। "
इन पांच मिनटों में चलते प्रचार के साथ रजिया का मन भी चलता रहा। बार्नविटा ,हाँ अगली बार राशन लेने जाऊंगी तो बार्नविटा लूंगी हामिद के लिए।
शैम्पू के विज्ञापन के साथ उसने एकबार अपने बालों पर नजर डाली और दुपट्टे में छुपा लिए। बनफूल तेल का पाउच एक रूपये में भी आता है जानकर यूं खुश हुई मानों खजाना मिल गया हो।
मस्ती का विज्ञापन जब आया तो अचानक से खालिद उठकर पानी पीने चला गया।
वह शकील की यादों में खो गई, कितने नाजों से रखता था उसे। अपनी छोटी सी आमदनी में भी। ऐसे पांचों वक्त के नमाजी को जाने कौन बदजात मिल गया जिसने उसे समझा दिया, क्या जोरू में अटका है कौम की खिदमत कर बहत्तर हूरें मिलेंगी।
उसे ख्यालों से बाहर निकाला सकीना के कोंचने ने "देख देख फोटू अपना शकील ही है न? "
समाचार अंग्रेजी में हो रहे थे सुसाइड बॉम्बर, टेररिस्ट, शकील, जिहाद क्या क्या तो बोल रहे थे उसके पल्ले नहीं पड़ा। उसकी नजर एकटक दिखाई जानेवाली तस्वीर पर टिकी थी छह महीने में ही सूख गये हैं क्या कौमवाले खाना नहीं देते। आँखों पर नजर पड़ते ही उसे डर लगने लगा। नहीं उसका शकील तो एकदम गोलू भोलू था ये तो एकदम भेड़िया है। दांत भींचते हुए "नहीं ये शकील नहीं है", कहकर वो उठ गई।
"चची जबतक मामला ठंढ़ा नहीं हो जाता आना जाना न ही करें तो अच्छा , और दादीजान आप भी ", खालिद तल्ख हो गया।
रजिया को सुनने का होश कहाँ था वह नहीं नहीं बड़बड़ाती बाहर की तरफ बढ़ी और चौखट में पाँव उलझा बैठी। मुँह के बल गिरी और फिर कभी न उठी।
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हामिद झंडा लिए गली में सबसे ऊंची जगह की तलाश में फिर रहा था।
अचानक से उसका सामना भीड़ से हुआ। अभी अभी नमाज खत्म हुई थी लोग धीरे धीरे निकल रहे थे।
वह मुस्कुरा उठा कोलंबस ने अमेरिका खोज लिया। वो उत्साह से मस्जिद में घुस गया और लाउडस्पीकर लगाने के लिए रखी सीढियों का उपयोग करके ऊपर चढ़ने लगा। उसके निशाने पर सबसे ऊपर लहराता झंडा था।
ऊपर चढ़कर उसने वो झंडा उतारकर फेंक दिया और जेब से तिरंगा निकालकर डंडे में फंसाने लगा।
ऊपर से गिरा झंडा नमाज से लौटती भीड़ के ऊपर गिरा।
ये झंडा भी कोई मामूली नहीं था कौम का झंडा था मस्जिद से निकली भीड़ भी उसी कौम की थी।
सनसनाता सा एक पत्थर हामिद की कनपटी पर पड़ा और वह तिरंगा लिए गुंबद पर से फिसलता हुए जमीन पर। जब उसका शव जमीन पर गिरा तो पूरा तिरंगे से ढंक गया।
हालांकि उसे सैकड़ों पत्थर लगे थे लेकिन पुलिस का कहना है कि निशान सिर्फ छत्तीस ही थे।
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सकीना कभी रजिया तो कभी खुद की छाती पीटते हुए रो रोकर हलकान हुए जा रही थी। तभी खालिद ने पकड़कर खींच लिया " चुपकर बुढ़िया सब तेरा ही किया धरा है जरा सी गलती पर तुमने मुँह मोड़ लिया उस दिन जरा ठंडे से समझाती तो शकील चचा क्या तेरी बात न मानते। कितना तो मानते थे तुझे। कौन था अच्छे बुरे की तमीज देनेवाला ? तूने भी मुँह मोड़ लिया फिर मतलबियों ने कौम के नाम पर बरगलाकर इंसानियत के खिलाफ खड़ाकर दिया। "
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हामिद की लाश पुलिस कस्टडी में है। पोस्टमार्टम करनेवाले डॉक्टर ने अपना काम खत्म करके फिर से उसपर तिरंगा ओढ़ा दिया है।



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