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@dawriter

नारी शक्ति

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हम है इस सृष्टि की शक्ति नारी!

हां हम कर सकते हैं हर काम.. हम सशक्त हैं, हम स्फूर्ति वान हैं, हम सृजन की शक्ति से युक्त हैं .. क्योंकि हम नारी हैं ...! और एक नारी के भीतर आत्मविश्वास और सहनशीलता दोनो ही होती है ..! एक बेटी जो कल तक एक नाजुक गुड़िया सी पली बढ़ी थी वो सात फेरे लेते ही एक परिपक्व सोच वाली गृहस्थी की संचालिका बन जाती है, महज पांच वर्ष की आयु में यदि माँ न हो तो छोटे भाई बहनों की माँ का रूप धर लेती है, और यदि 60 वर्ष की हो तो संतान के भूखे पेट के लिए लाठी के सहारे टिक, रोटी बना कर उसका पेट भर सकती है..! नाजुक कोमल उंगलियों से लेकर, झुर्री दार हाथों की कलाइयां होने पर भी उसमे धैर्य व प्रेम की कहीं कोई कमी नहीं होती ..

प्रेम का सागर होती हैं नारियां .. जो कभी अपनो से फोन पर बात करते करते रो देती हैं..! जो टीवी पर विदाई के दृश्य देख कर रो उठती हैं, जो किसी सीरियल पर भी किसी की व्यथा देख भाव विह्वल हो जाती हैं ..! जो बच्चे के बात न मानने पर थप्पड़ लगाती हैं और उसके सो जाने पर उसके भोले मुखड़े को निहार उसकी बलैया लेती हैं..!

नारी जो सास के तानो के बावजूद उसको हर रात पांवो में तेल लगाने पहुच जाती हैं..जो चावल के दानों के साथ मानो घर की परेशानियां और गम बीन कर फेंक देती हैं ..! जो घर के बड़े बूढों के चाय की शुगर से लेकर रोटियों की मोटाई तक का ध्यान रखती हैं ..! जो पति की शर्ट के बटन से लेकर जूतों की पॉलिश तक का ख्याल रखती हैं ..! कभी भरवा पराठो के साथ तो कभी दाल के हींग वाले तड़के के साथ मन का प्यार उड़ेल कर रख देती हैं।

जो बच्चों की स्कूल प्रोजेक्ट से लेकर उनको रात में ब्रश कर के सोने की हिदायत देते नहीं थकती हैं ..! जो खुद ढाल बनकर हर आने वाले पल के सामंजस्य की योजना बना कर रखती हैं। वो सब्जी के ठेले पर सब्जियों की परख, वो हाथ मे उठाकर गेंहू व चावल की गुणवत्ता का ख्याल .. वो ठंडा गर्म का अंदाज लगा कर बच्चे को नहलाना,और उसके चलते चलते गिर जाने पर वो दौड़कर उसको उठाना और जमीन को पांव से कुचल कर बच्चे को फुसलाना! वो बेटी की चोटियां बनाने से लेकर बेटे की रुमाल पिनअप करने तक! पति को पर्स और रूमाल देने से लेकर, ससुर जी को दवा खिलाने तक ..! सब कुछ एक नारी ही सम्हाल सकती है ..! अपने सुदृढ़ और सशक्त कंधों पर केवल वो ही इन जिम्मेदारियों का बोझ उठा सकती है।

कभी वो ही धीर गम्भीर है तो कभी अति चंचला ..जो लाल हरी चूड़ियों के लोभ से मचल जाती है, तो कभी खट्टी इमली और कच्ची अमिया देख पुनः बच्ची बन जाती है! वो कभी गहनों की चमक से दमक जाती है तो कभी फूलो की वेणी मात्र से ही गमक जाती है ..! जिस प्रकार नारी के अनेक रूप है उसी प्रकार उसकी अनेक दशाएं भी हैं ,वो कभी लक्ष्मी तो कभी सरस्वती ,कभी अन्नपूर्णा तो कभी स्कंदमाता, कभी काली तो कभी दुर्गा..! कभी पोषित कभी शोषित ..! कभी वंचित कभी उपेक्षित और कभी पूजित, और कभी वंदित होती है!

नारी कोमल हृदय की स्वामिनी है, जो कभी कामवाली के बच्चे को नई टॉफियों का पैकेट देकर खुश हो लेती है तो कभी सफर में , पानी बोतल और गुब्बारे बेचते छोटे नौनिहालों को देख आंसू आंखों में भर, दोगुना दाम देकर उनकी आंखों में खुशी की झलक देख लेती हैं। किसी गरीब असहाय को भरपेट भोजन करा कर जो दिवंगत करीबियों को श्रद्धा सुमन अर्पित कर देती हैं और गंगा स्नान से लेकर तुलसी के चौरे को जल अर्पित कर वो सुहागन होने का आशीष संजो लेती हैं।

समाज मे आज नारी को बहुआयामी कर्तव्य निर्वहन करते और अनेको भूमिकाओं में बेहतर प्रदर्शन करते हुए देखा जा रहा है और समाज के किसी भी वर्ग में आप उन्हें पिछड़ा नहीं देख सकते। चाहे वो वायुसेना जलसेना या थल सेना की सैनिक वेषभूषा हो या फिर बनारसी साडियो की आभा ,कभी पटियाला सलवार के रंग हों तो कभी कश्मीरी दुशाले में लिपटी सुघड़ आकृति! कभी बंगाल के तांत की तरह अकडी गरिमा मयी लाल टीके से सजी अनुकृति हो या फिर महाराष्ट्र की मुंगड़ी! कभी शॉपिंग मॉल में बच्चों संग पिज़्ज़ा हट घूमती है तो कभी शार्ट ड्रेस में वो गोआ के बीच पर भी घूम लेती है! कभी मुम्बई के समंदर में जीवनसाथी की बाहों में बाहें डाल वो प्रेयसी की भूमिका निभाती है तो कभी बिहार के छठ माई के पूजन में अनुरक्त नाभि तक गंगा में डूबी , सूर्य को अर्घ्य देती चमकती नाक से मांग तक सिंदूर को सजाए हुए वो पूजन में व्यस्त होती है और फिर कभी चलनी की आड़ में पति की मुखाकृति को निहारती है और चौथ के चांद की सुंदरता को मात दे देती है जी हाँ यही तो है नारी शक्ति! कहां नहीं है नारी? हर रूप में सटीक हर रूप में उन्मुक्त!

जी हां यही तो है नारी शक्ति! बेटी ,बहू ,पत्नी ,भाभी, बहन ननद, बेटी , देवरानी जेठानी ,बुआ और मासी के रूप में है हमारे समक्ष ..हर भूमिका में सफल हर क्षेत्र में अग्रणी हर दांव में उत्तम और हर परीक्षा में खरी! क्यो सही कहा न? दुनिया को शक्ति प्रदान करने , उत्साह और प्रफुल्लता प्रदान करने वाली और जीवन मे विविध रँगों का संचार करने वाली नारी शक्ति! जिसे कोई आजीवन न तो बांध सकता है न कभी बांध सकेगा! ये प्रकृति और पुरुष समस्त इस नारी शक्ति के अधीन हैं और इसके समक्ष नतमस्तक हैं जो इसे नहीं मानते वे मूढ़ हैं जो जन्मना सृजन से हीन है वो पुरुष भी इसके ही अधीन है ..!

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मित्रों आपको नारी शक्ति व उसके रूप, रंग, वेशभूषा से लेकर उसके मन के भावों की अप्रतिम श्रंखला आपको कैसी लगी ये बताना मत भूलियेगा। आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में.....

-कविता जयंत श्रीवास्तव



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