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चिट्ठी - दादाजी के नाम (गहमर पंद्रह साल बाद)

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पूजनीय बाबा ( दादाजी )

स्वर्गीय जीवनन्दन दत्त

दिनांक - 10th सिंतबर 2018
विषय - 15 साल बाद मेरी गहमर यात्रा

चरणस्पर्श,
             आशा करता हूँ आप जहाँ भी होंगे, इस पत्र अवश्य पढ़ रहे होंगे। पिछली चिट्ठी के बाद इस चिट्ठी में डेढ़ साल से अधिक वक़्त का समय लग गया। माफी चाहूँगा मैं व्यस्त हो गया था शहर के जीवन में। खुद को कहीं खो सा दिया था। पिछली चिट्ठी मैं आपको बता चुका था कि अब मेरी रुचि साहित्य के तरफ हो चुकी है। पिछली चिट्ठी में मेरे जीवन की कोई दिशा दशा तय नहीं थी। मुझे नहीं पता था मैं अपने जीवन में क्या करूँगा? इस बार दिशा तो मिल चुकी है, दशा अभी भी खराब है।

इस चिट्ठी को लिखने के पीछे मेरी  मनोदशा यह है कि मैं पंद्रह साल बाद दुबारा गहमर आया हूँ। यह चिट्ठी भी गहमर के ‘गहमर इंटर कॉलेज’ के प्रांगण में बैठा लिख रहा हूँ। इन दो सालों में अनेक छोटे - बड़े साहित्यकारों से मिला। लेखनी की धार मजबूत हो इसके लिए वरिष्ठ साहित्यकारों के सानिध्यता में गया। इसी क्रम में मेरी मुलाकात आदरणीय विभा रानी श्रीवास्तव जी से हुई। पता नहीं  कब मैं उन्हें माँ कह कर पुकारना शुरू कर दिया। मई 2018 के एक दिन यूँही हमारे संस्था ‘लेख्य मंजूषा’ की मासिक गोष्ठी का आयोजन था। उसमें विभा माँ ने बताया की गहमर में पिछले 5-6 साल से सिंतबर महीने में  दो दिनों का गहमर साहित्य सम्मेलन का आयोजन होता है। गहमर का नाम सुनते ही मेरे शरीर में अजीब सी बेचैनी महसूस होने लगी। आप विश्वास नहीं कीजिएगा बाबा गहमर का नाम सुनते ही सबसे पहले आप ही का चेहरा मेरे दिमाग में आया। मेरे रौंगटे खड़े हो गए। मेरी मनोदशा को विभा माँ ने भांप लिया। उन्होंने सबसे पहले गहमर साहित्य सम्मेलन के आयोजक ‘अखंड गहमरी’ से मेरा परिचय करवाया। अखंड गहमरी ने मुझे  गहमर आने का निमंत्रण दिया। बाद में पिताजी ने बताया वह अखंड गहमरी को पहचानते हैं।

खैर, इन चार महीनों मुझे रोज़ गहमर के दृश्य याद आ रहे थे। बचपन के वह तीन साल मुझे याद आ रहे थे, जो मैंने आपके और दादी के साथ गहमर में बिताए थे। बचपन की उन यादों को दुबारा जीने के लिए मैं गहमर जाने के लिए अपनी हामी भर दी।

8th सिंतबर 2018 को मैं और वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय सतिषराज पुष्करणा सर  के साथ गहमर के लिए निकल पड़ा। सफर के दौरान वरिष्ठ कवि आदरणीय विश्वनाथ वर्मा जी भी मिल गए। यह दोनों इस सम्मेलन में सम्मानित होने वाले थे। मन में अजीब द्वंद चल रहा था। सोच रहा था गहमर उतर कर उसकी मिट्टी को प्रणाम करूँ। फिर सोच रहा था जिस गाँव में मेरा बचपन गुजरा आज उसी गाँव में आयोजित साहित्य सम्मेलन से निमंत्रण आना मुझमें घमंड भर रहा था।

दोपहर के दो बजे के आसपास हम लोग गहमर पहुँच चुके थे। स्टेशन पर आज भी कुछ नहीं बदला है बाबा। उसके बाद हम लोग निकल पड़े अखंड गहमरी जी के घर। बाबा रास्ते में शांति पैलेस सिनेमाघर मिला। समय के साथ वह भी वृद्धावस्था में पहुँच चुका है। उसके बच्चे उसे छोड़ कर मॉल के मल्टीप्लेक्स में जा चुके हैं। पिछले चार साल से शांति पैलेस बन्द पड़ी हुई है। आपको तो याद ही होगा इस सिनेमाघर हमलोगों ने तीन फिल्में देखी थी।

जब हम लोग कार्यक्रम में पहुँचे तो लघुकथा का सत्र चल रहा था। लेकिन मेरा ध्यान सत्र से अधिक गाँव घूमने पर था। शाम में मौका मिलते ही मैं निकल पड़ा गहमर के मुख्य सड़क पर। उसी सड़क पर जिसपर आप कभी मेरे कंधों पर हाथ रख कर चला करते थे।
सड़क पर निर्माण का कार्य चल रहा था। चलते चलते मैं उस मकान तक पहुँच गया, जहाँ मैंने और आपने ( बाबा) अंतिम में गुजारे थे। बैंक वाला घर, मरम्मत का काम चल रहा था।

आपको पता है बाबा चलते - चलते मैं पहुँच गया डॉ. छोटे लाल अंकल के क्लिनिक। कुछ देर इंतज़ार करने के बाद वह क्लिनिक पर आए। मैंने उनका पैर छू कर आशीर्वाद लिया, लेकिन वह मुझे नहीं पहचान सके। पहचानते भी कैसे? पंद्रह साल बाद जो मिलने पहुँचा था। फिर मैंने उनको बताया मैं ‘छोटू' दत्ता जी का छोटा बेटा। उसके बाद तो उन्होंने मुझे गले से लगा लिया। उसके बाद चर्चाओं का दौर चला। बचपन को याद करते हुए मैंने उन्हें कहा - ‘अंकल बचपन में मेरे पैर के घाव का ऑपरेशन  आपने किया था। उस ऑपरेशन के समय मैंने आपको कितनी गालीयाँ दी थी’। यह सुन कर अंकल हँसने लगे। फिर मैंने उनकी बात पिताजी से करवायी। पंद्रह साल के बाद दो परम मित्र आपस में बात कर रहे थे। बात वह दोनों कर रहे थे सुखद अनुभूति का एहसास मुझे हो रहा था। बात होते - होते आप तक भी पहुँची, डॉक्टर अंकल ने आपके बारे में एक बात बताई। उन्होंने कहा कि आपकी इच्छा थी पिताजी के रिटायरमेंट के बाद गहमर में ही बस जाने की। लेकिन ऐसा हो नहीं सका, उस समय शहर अपनी ओर हम सब को खींच रहा था। पापा के रिटायरमेंट से पहले आप हम सब को छोड़ कर इस दुनिया से जा चुके थे।

डॉक्टर अंकल से बातचीत में पता चला गहमर में आज भी दोनों जगह ‘रामलीला’ का आयोजन होता है। यह सुनते ही वह सारे दृश्य मेरे आँखों के सामने आ गए जब हम सब ठेला पर बैठ कर रामलीला देखने जाया करते थे। बाबा, आज के समय ईश्वर के प्रति मेरी आस्था बिल्कुल शून्य हो चुकी है। लेकिन आपके दिए संस्कार का नतीजा है कि रामलीला की बात सुनते वक़्त मेरे आंखों में आंसू थे। मैं तो प्रशांत सर को हमेशा कहता हूँ - ‘सर मेरे अंदर जो थोड़े बहुत संस्कर बचे हैं, वह बाबा दादी की देन है’।

उसके बाद अंकल से पता चला गाँव में बिजली का वही हाल है जो पंद्रह साल पहले था। दिन भर गायब, रात को दस बजे के बाद आ जाता है। बीच रात में आज भी बिजली कटती है, लोग आज भी गाँव में छत पर सोते है, खुले आसमान को देखते हुए। धीरे-धीरे गाँव विकास की दौर में शामिल हो गया है। मुख्य सड़क छः फ़ीट ऊपर कर दी गयी है। इस कारण नाला भी ऊपर हो गया, जिसके परिणाम में पूरा गाँव डूब चुका है। अंकल ने ये भी बताया अगले महीने से बिजली बीस घण्टे होने जा रही है। गहमर के स्थानीय विधायक इसके लिए प्रयासरत है। इस बात को सुनकर मैं खुश नहीं हुआ। बेशक, विकास के लिए सड़क, बिजली जरूरी है। लेकिन इसके दुष्परिणाम हम शहर वालों ने अधिक झेला है। आप तो जानते ही है बाबा, शहर में बिजली चौबीस घण्टे रहती है। लेकिन उस बिजली के कारण घर के सब सदस्य अपने - अपने रूम में घुसे रहते है। अगर गहमर में बीस घण्टे बिजली आ गयी तो क्या डॉक्टर अंकल के क्लिनिक पर शाम के समय वह महफ़िल जमेगी जो इतने सालों से उनके क्लिनिक पर जमती है? बाबा आज भी उनके क्लिनिक पर 6-7 लोग बैठ कर गप्प करते हैं। एक दूसरे का हाल लेते हैं। बातों के बीच में गाली देकर वार्तालाप को और अधिक रसीला बना देते हैं। यह अपनापन तो पटना जैसे शहरों में विलुप्त हो चुका है।

नास्ते के बाद चाय का दौर चला। चाय हम लोग क्लिनिक के बाहर बैठ कर पियें। तब तक पापा के एक और मित्र ‘सहदेव बाबा’ का भी आगमन हो गया था। चाय पीते वक़्त मेरा बाल-मन जाग गया और मैंने डॉक्टर अंकल से पूछ बैठा - ‘अंकल रात को जब छत पर सोते है, तो क्या आज भी ‘मुँहनोचवा’ आता है’। मेरी इस बात को सुनकर सबने ज़ोरदार ठहाका लगाया। वह मुँहनोचवा का ही समय था,  जब हम लोग गहमर में छत पर सोया करते थे। मुँहनोचवा के डर से मैं दादी के बगल में सोता था।

उसी समय एक हवा का तेज झौंका आया। आपको कैसे बताऊं बाबा इस शुद्ध हवा के लिए तो मैं पिछले पंद्रह साल से तरस गया था। ऐसा लगा बस जी लूँ इस हवा को। मैंने लंबी सांस लेते हुए अपने चेहरे को आसमान की तरफ किया। न जाने कितने वर्षों के बाद आज दुबारा आसमान को मैंने देखा था। इतने तारे अद्भुत, पटना में तो इतना व्यस्त रहता हूँ कि आसमान को सही से देख तक नहीं पाता हूँ।

आसमान की ओर देखते हुए, मुझे वह सारी कहानियाँ याद आने लगी जो आप और दादी हम सब को सुनाया करते थे। मन में एक ही विचार आया उस समय, ‘बाबा मुझे भी अपने पास बुला लीजिए’।

उसके बाद मैं वहाँ से निकल पड़ा। थोड़ा आगे बढ़ने पर आपके परम मित्र ‘उमेश पंडितजी’ मिल गए। मैं उन्हें नहीं पहचान सका, पर वह मुझे एक नज़र में पहचान लिया। उन्होंने मुझे देखते ही भोजपुरी में कहा - ‘का हो का हाल बा? एतना दिन बाद गहमर अयला’।

बाबा आपको विश्वास नहीं होगा, आपके मित्र के चेहरे पर कोई बदलाव नहीं आया है। एक बाल तक सफ़ेद नहीं हुए उनके। मैं उनका नाम भूल गया था, पर मुझे याद है उनके साईकल के पीछे उनका नाम लिखा हुआ था। वह साईकल उन्हें शायद 2002 में सरकार के तरफ से मिली थी। गाजीपुर के सभी दिव्यांगों को सरकार के तरफ से दिव्यांग साईकल दी गयी थी। साईकल के पीछे नाम देखने के बाद उनका नाम याद आया। इस बात पंडितजी ने भांप लिया, उन्होंने कहा - ‘तू भुला सकेला, हम नैके भुलाल बानी’। बाबा आपके मित्र के आभामंडल पर वह तेज आज भी समान रूप से मौजूद है। ललाट पर गोल तिलक, कानों के नीचे चंदन का लेप। मुख में लाली जो पान खाने से आती है। मृदुल आवाज़ में जब उन्होंने बात करना शुरू किया तो लगा बस सुनते रहूं। उस वार्तालाप में मैं था, पंडितजी थे और आप भी उस हवा के माध्यम से वहाँ मौजूद थे।

वार्तालाप के दौरान उन्होंने एक ऐसा सवाल किया जिसका जवाब मेरे पास नहीं था। उन्होंने मुझसे पूछ लिया - ‘का हो छोटू, पटना में  कीर्तन होकेला की ना’?
इसके प्रत्युत्तर में मेरे पास सिर्फ एक झूठी हँसी मौजूद थी। यह सवाल उनके साथ - साथ आपका भी था। जो पंडितजी के मुख से निकला। वह मेरी हँसी से जवाब समझ गए। उन्होंने कहा - ‘शहर के लोगन इतना व्यस्त रहे लन, ई ( कीर्तन) सब लागी समय कहाँ मिलेला’?

पंडितजी ने बिल्कुल सही कहा। हम शहर के लोग इतना झूठे कामों में व्यस्त रहते है, की इन सब कामों के लिए हमारे पास समय कहाँ है।  स्थिति तो इतनी विकट है महीने बीत जाते हैं आपकी तस्वीर को देखे हुए। आपके बेटे - बेटियों को तो याद भी नहीं है, की आपने 550 पृष्ठ की कोई कीर्तन कॉपी भी लिखी( हस्तलिखित) थी। घर में किसी को पता नहीं है वह कीर्तन कॉपी मेरे पास है। अपने पास रखने के पीछे मेरे मन का लालच है। उस कॉपी के जरिये ही मैं आपसे संवाद कर पाता हूँ।
कुछ देर बाद पंडितजी का आशीर्वाद लेकर मैं वापस कार्यक्रम स्थल पर चला गया।
.............

दूसरे दिन,
सम्मेलन के आयोजक अखंड गहमरी के तरफ से माँ गँगा का भ्रमण और माँ कामाख्या का दर्शन का  कार्यक्रम था। पूरे देश से आए साहित्यकारों के लिए सिर्फ एक कार्यक्रम था। मेरे लिए बचपन में लौटने जैसा था। रास्ते में हनुमान चबूतरा भी आया, जो बाढ़ में पूरी तरह डूबा हुआ था। शाम को टहलते - टहलते आप यहीं आया करते थे। गँगा घाट पहले की तरह नहीं है। बहुत खूबसूरत घाट बना दिया गया है। गँगा के तट पर शुद्ध हवा मुझे अपने बचपन में खींच के ले जा रही थी। उस समय हर महीने दादी के साथ आकर हम सब गँगा स्नान करते थे।

उसके बाद हम सब कामाख्या मंदिर की तरफ प्रस्थान हुए। मंदिर के सीढ़ियों पर चढ़ते वक़्त मुझे वह दृश्य दिखाई दे रहे थे, जब पूरा परिवार पहली बार इस मंदिर में आया था। तो बड़ी दीदी ( पम्मी दी ) ने मेरी और आपकी तस्वीर खिंची थी, इसी सीढ़ी पर बैठे हुए। गर्भ गृह में जैसे ही गया, मुझे वह दृश्य याद आया, जब आप अपनी चिट्ठी मेरे हाथों माँ कामाख्या के चरणों में रखने को बोलते थे। क्या लिखते थे आप उस चिट्ठी में - ‘हे माँ, मेरी सभी इच्छा पूर्ण हो चुकी है, मुझे अपने पास बुला ले’। आप तो चले गए मुझे अकेला छोड़ कर। आपके जाने के बाद मैं कितना बदल गया इसकी जानकारी भी नहीं है आपको। कितना पत्थर दिल इंसान बन गया आपके जाने के बाद। मुझे भी अपने पास बुला लो बाबा। यहाँ रहूँगा तो पाप ही करूँगा।

जानते है अब मंदिर के अंदर नारियल तोड़ना बन्द हो चुका है। यज्ञ वाला कमरा भी बन्द हो चुका है।
.......

आइए बाबा अब आपको गहमर में हुए बदलाव के बारे में बताता हूँ।
जिस समय हम लोग गहमर में रहते थे, उस समय केवल एक बैंक हुआ करता था। जिसमें पापा काम करते थे। आज गहमर में चार बैंक हो चुके हैं।
उस समय केवल एक अंग्रेजी माध्यम का स्कूल हुआ करता था। जिसमें हम भाई- बहन पढ़ा करते थे। वह स्कूल तो बंद हो गयी। लेकिन उसके बाद गहमर में 8-9 अंग्रेजी स्कूल खुल गए।

गाँव से पलायन अधिक मात्रा में हो रहा है। लोग शहर की तरफ भाग रहे हैं। वहाँ के लड़को में अब फ़ोर्स की नौकरी के तरफ रुझान कम हो गया है।
ईंट वाली सड़क के जगह अब सीमेंट वाली सड़क देखने को मिलती है।
जो चीज़ नहीं बदला वह यह है कि चार लोग आज भी एक जगह खड़े हो कर बातचीत करते हैं। घर के आगे का मिठाई का दुकान आज भी है। ‘लॉंगलत्ता’ मिठाई आज भी वहाँ मिलती है।

पहला मकान में अब एक बैंक खुल चुका है। अंतिम मकान जिसमें अंत समय में आप थे, बैंक के ऊपर वाला मकान। वह टूट चुका है। अमजद अंकल पकड़ीतर वाला मकान छोड़ बैंक वाले मकान में रहने के लिए आ चुके हैं। देखने से अमजद अंकल बीमार लगे। कपड़ो का बिज़नेस अख्तर अंकल का परिवार देखता है। अख्तर अंकल अब इस दुनिया में नहीं है। अमजद अंकल गैस एजेंसी खोल लिए हैं। बैंक के आगे सब्जी मंडी आज भी लगती है। मुन्ना भैया का दुकान बंद हो चुका है।

वहाँ के बच्चें आज भी अपने दादा को अपने कंधे पर हाथ रख कर बाज़ार घुमाते हैं।
........

बाबा अब वापस जाने का समय हो गया है। जिस ट्रैन से मुझे जाना है अब उसका समय हो रहा है। मैं पैदल निकल पड़ा स्टेशन की तरफ। आपको याद है न बाबा एक बार मम्मी से झगड़ा कर लेने के बाद मैं अपना सामान लेकर स्टेशन की ओर चल पड़ा था। वह बचपन था, कितना खूबसूरत बचपन था।

पालटफॉर्म नंबर दो को देखकर मेरे आंखों से आँसू खुद-ब-खुद निकल पड़े। मुझे वह दृश्य अपनी आँखों के सामने दुबारा दिखने लगे, जब दादी पहली बार गहमर आयी थी। मैं उन्हें लेने स्टेशन गया था। दादी को देखते ही मैं उनसे लिपट गया था।
मेरे आंखों में आँसू देख कर दिल्ली से आए एक कवि ने मुझसे पूछा - ‘अभिलाष आप रो रहे हैं’?
प्रत्युत्तर में मैंने कहा - हाँ क्योंकि मैं अपना बचपन देख रहा हूँ।

बाबा हर इंसान दो रूप में रहता है। एक कठोर और दूसरा निर्मल। मेरा कठोर मन के कारण मैं अपनी दाढ़ी नहीं कटाता हूँ। कठोर मन इंसान का खुद का बनाया होता है। निर्मल मन वह जब आपके आंखों से आंसू खुद निकल आते हैं।
शहर के जीवन में हम सब कठोर बनते जा रहे हैं। घर की स्थिति के बारे में क्या लिखूं? आप तो सब देख ही रहे होंगे।
इस मौके पर दो पंक्ति याद आ रहा है बाबा, आपको सुना देता हूँ।
“चैन ओ सुकून आज कल तेरे दर कहाँ है,
जिसे कह सकूँ वह घर अब घर कहाँ हैं” ।
।।।
मेरी ट्रैन आ चुकी है बाबा। अब मैं वापस पटना जा रहा हूँ। दो दिन गहमर में रह कर मैं वापस आपके और दादी के पास पहुँच गया।  पता नहीं अगली चिट्ठी आपको कब लिखूँगा? लेकिन आप और दादी अपना आशीर्वाद मुझपर हमेशा बनाए रखिएगा।

आपका पोता,
अभिलाष कुमार दत्ता (छोटू)

 



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