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@dawriter

कामवाली बाई के साथ ATM फ्री।

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आकृति के माता पिता की खुशी साँतवे आसमान पे है। आज उनकी बेटी की शादी है।

आकृति बहुत ही अच्छी लड़की है समझदारी के साथ साथ होशियारी भी घुली हुई थी उसमे, पढ़ाई में अच्छी थी। इसलिए माता पिता ने उसकी पढ़ाई से कभी समझौता नहीं किया। पिता ऑटो चालाते है और माँ घर पे सिलाई कढाई कर के गृहस्थी चला रही थी। पिता ने स्वाभिमान और माता ने त्याग के अमूल्य पढ़ाई भी आकृति को करवाई थी। और जब काबलियत के साथ कठिन संघर्ष जुड जाता है तो आसमान भी जंमी पर आ जाता है। ऐसा ही आकृति के साथ भी हुआ, उसे एक बडी एमनसी कंपनी में अच्छे पद पर जाँब मिल गयी। जिनके यहाँ 100 रु की भी कमी रहती थी आज बेटी लाखो पा रही थी। पर तब भी कोई घंमड नहीं, आकृति के माता पिता के लिए भी ये मात्र बेटी की मेहनत का परिणाम था ऊपर वाले की कृपा थी, और अब उन्हे आकृति की शादी की चिंता थी।

भारतीय समाज में हम आधुनिकता के जितने भी खोखले दावे कर ले पर आधारभूत सच आज भी यही है कि लड़की की शादी जब तक नहीं होती माता पिता को चैन नहीं आता। कुछ रिश्ते आये पर बात कुछ बन नहीं पायी, कुछ लड़कों को अपना अहम ज्यादा प्यारा था कि ऐसी लड़की से हम शादी नहीं कर सकते जो हमसे ज्यादा कमाती है। तो कुछ लड़के शादी के बाद जाँब के लिए सहमत नहीं थे। पर आकृति के पिता प्रतिबद्ध थे कि मेरी बेटी जाँब करना चाहती है या नहीं ये मेरी बेटी का निणर्य होगा। जितनी दिन रात की मेहनत एक लड़का इस मुकाम तक पहुँचने के लिए करता है उतनी ही मेरी बेटी ने भी की है. जितनी प्रथानाऐ लड़के के माता पिता ने की है उतनी ही श्रद्धा से हमने भी ऊपर वाले के सामने हाथ जोड़े है। कि हमारे बच्चे को सफल करे।

लोगों का कहना था कि यदि ऐसा ही सोचते रहेंगें तो कभी लड़की की शादी हो ही नहीं सकती। लेकिन आज वो दिन आया आकृति के माता पिता की खुशी सातवे आसमान पे थी। प्रफुल्ल के रुप में उसे जीवनसाथी मिल गया था। प्रफुल्ल एक भाई और एक बहिन वाले छोटे परिवार से था।बहिन की शादी हो चुकी थी। और पिता रिटायर हो चुके थे।प्रफुल्ल का अपना बिजनेस था। और आज प्रफुल्ल और आकृति परिणय सूत्र में बंध गये।

एक नया जीवन नयी जिम्मेदारीयो के साथ आकृति का इंतजार कर रहा था। शादी की कुछ छुट्टियों के बाद आफिस और घर का मैराथन एक साथ शुरु हो गया। किचन के स्वाद से लेकर फाईलो के जंजाल को निपटाने तक के सभी कामो में आकृति निपुण थी। और स्वाभिमान का गहना पहने हुए वो नहीं चाहती थी कि कोई भी उस पर ऊगँली ऊठाये कि वो जाँब के कारण घर पे ध्यान नहीं देती। इसलिए सुबह पाँच बजे उठकर ,नहाकर चाय सभी को कमरे में दे कर आती, नाशता बना कर टेबल पर लगा देती और टिफिन पैक कर के 9 बजे आँफिस के लिए निकल जाती। सास हमेशा कहती तू मत परेशान हो मै कर लूँगी पर आकृति कहती "आपने आज तक किया ही है अब और नहीं". शाम को आँफिस से आने के बाद, सास रात का खाना बनाने जाती, तो तुरंत किचन में पहुंच जाती, “आप आराम करें, मैं खाना बना लेती हूं.” खाना बना कर सबको परोसती। पर इस पूरी रूटिन में वो बहुत थक जाती। और एक नयी नवेली शादी की और भी बहुत सी इच्छाये होती है। प्रफ्फुल का कहना था कि काम के लिए तो मेड है खाना बनाने के लिए भी अंरेज कर लो। म पर आकृति को लगता कि नयी नवेली किसी बाहर वाले से खाना बनाने की बात करेगी तो बुरा लगेगा ये सोचकर कह देती मै कर लूँगी।

प्रफ्फुल "मन की ताकत से सब कुछ नहीं होता और इंसान कमाता क्यो है जीवन को सरल करने के लिए ऐसा रुटीन हमेशा के लिए सही नहीं है।" दिन,दो दिन...हफ्ते बीतते हुए एक महीना बीत गया।और शादी के बाद की पहली सैलरी बैक एकाँउट में आ गयी थी। और उस दिन ज्यादा काम नहीं था ,इसलिए वो घर के लिए जल्दी निकल पड़ी। घर के दरवाजे की बेल बजाने के लिए जैसे ही हाथ आगे बढाया उसे पडोस वाली गुप्ता आंटी की आवाज सुनाई दी।

प्रफ्फुल की माँ तुम तो भाग्यशाली हो कि तुम्हें कामाऊ बहू मिली उस पे वो इतना घर का काम भी करती है। क्या बात है।

हाँ आप सही कह रही है मधु आंटी की आवाज सुनाई दी ,नहीं तो जाँब वाली बहुओ के अलग नखरे होते है।कुछ घर का काम करना नहीं है और मुँह बना रहता है हमेशा। पर आप की बहु तो पूरे घर के काम पे भी ध्यान देती है और इतनी बडी कंपनी में जाँब भी करती है अरे ये तो वही बात हुई कामवाली बाई के साथ एटीम फ्री।

ये क्या बात हुई, वो कमाती है क्योंकि वो काबिल है। आकृति की सास के स्वर आकृति के कानो पे पड़े। मधु तुम्हारी बेटी भी तो घर गृहस्थी ही संभालती है तो क्या वो कामवाली हो गई, अपने घर का काम करने से कोई कामवाली नहीं हो जाता, अपने घर का काम हम नहीं करेंगें तो क्या बाहर वाला करेगा। झाडू पौछे जैसे कामो के लिए तो घर पे आती है मालती, पर आज ही खाने वाली के लिए भी बात कर ली है। वो मुझे कुछ करने नहीं देती पर खुद कब तक करेगी, जानती हो जब मै शादी होकर आई थी तब एक छोटे से स्कूल की टीचर थी,मेरी सास भी मुझे कामवाली के साथ एटीम फ्री ही समझती थी,पर मेरे पति ने हमारे बीच सामान्य व्यवहार बनाने में मदद की। पर मै भाग्यशाली हूँ कि मुझे ऐसी बहू मिली है। वो भी इंसान है उसके पास केवल 24 घंटे होते है ओर दोहरी जिम्मेदारी बहुत अच्छे से निभाने की इच्छा, इसलिए मुझे भी उसका साथ देना है। नहीं तो मैने अपने जीवन के कटु अनुभव से क्या सीखा? जिस तरह से हम प्रफ्फुल की जिम्मेदारी है वैसे ही आकृति की जिम्मेदारी भी उसके माता पिता है।

पैसो के मामले में वो क्या निणर्य लेगें ये उनका फैसला होगा। पर हमारी बहू न तो हमारे लिए कामवाली बाई है और न ही एटीएम मशीन,वो इस घर की बहू है।

मनीषा गौतम

 



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