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@dawriter

एक 'सलाम' ऐसी सोच को !

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ये कोई जरुरी तो नही जिन लोगों का नाम अखबार की सुर्खियों में हो, या जिन लोगों को कोई सम्मान मिला हो केवल उन्हीं लोगों को सलाम करना चाहिए, कभी कभी हमें ऐसे लोग भी मिल जाते है जिनकी कोई चर्चा नहीं होती परंतु वो जो काम करते हैं, उन्हें देख -सुन मन कहता है सलाम एेसी सोच को -आज कुछ ऐसे ही लोगों की कहानी बताना चाह रही हूँ मैं -

राजकुमारी, लोगों के घर जाकर झाडू, पौछा, बर्तन का काम करती हैं, उसका पति मजदूरी करता है, तीन बेटियाँ है उसकी। रोज की तरह अपने काम पर निकल ही रही थी कि पास रहने वाली माया ( वो भी झाडू, पौछा करती है) बोली - ऐ, राजकुमारी तू तो नसीब वाली है रे, तीन बेटियाँ है, तीनों को काम में लगाएगी, तो कितना पैसा अाएगा तेरे पास। मेरे तो एक ही बेटी है काम पर साथ ले जाती हूँ काम सिखाने, तु भी ले जाया कर। तब राजकुमारी ने कहा -नहीं कभी नहीं मेरी बेटियाँ ये काम नहीं करेगी, मैं तो उन्हें खूब पढांउगी, किसी काबिल बनाऊगी। स्कूल में बात कर ली है अगले हफ्ते से तीनों स्कूल जाएगी, तो माया बोली -क्या करेगी पढ़ाके, इतने रुपये कहा से लाएगी, तीनों को काम में लगा- बहुत रुपये आएगे मजे से जिंदगी जीना। राजकुमारी ने कहा -मेरी मजबूरी है कि मैं दूसरे घरों के गन्दे बर्तन धो रही हूं, पर मेरी बेटियों की ऐसी कोई मजबूरी नहीं के वो दुसरो के घरों के गन्दे बर्तन धोए, मैं उन्हें पढ़ाउंगी ताकि वो समाज में सर उठाकर जी सके। ये कह कर राजकुमारी अपने चेहरे पर संतोषी भाव लिए काम पर चली गई और माया वही खड़ी मुंह बनाने लगी।

एक सलाम राजकुमारी की ऐसी सोच को।

मधु की शादी एक ऐसे घर में हुई जहाँ लड़कियों की शिक्षा को कोई ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता था। बस अक्षर ज्ञान तक ही पढ़ाया जाता था, मतलब पांचवी तक। पर मधु अपनी बेटी को और पढ़ना चाहती थी, घरवाले सब खिलाफ थे उसके, कि क्या करेगी छोरी को इतना पढ़ाके, आगे जाके चुल्हा ही तो फुकना है घर के काम सिखा, खाना बनाना, सिलाई, मेहँदी आदि। पर मधू नहीं मानी, कभी घर खर्चो में कमी कर तो कभी अपनी पायल बेच स्कूल की फीस भरी, फिर एक स्कूल में चपरासी का काम किया घर से दूर जाकर दूसरे घरों में काम किया और अपनी बेटी को उच्च शिक्षा दिलाई।

एक सलाम मधु की ऐसी सोच को।

कोमल का कॉलेज उसके घर से दूर पड़ता था। कोमल को रोज कॉलेज जाने के लिए पहले कुछ दूर पैदल जाना पड़ता फिर ऑटो लेती फिर पैदल चलना पड़ता था कॉलेज के लिए। रोजाना उसे अॉटो लेना पड़ता। एक ऑटो चालक जो कि एक कम उम्र का लड़का था उसे अक्सर मिल जाया करता था, वो कोमल को पूरे कॉलेज के गेट पर छोड़ देता था और ज्यादा पैसे भी नहीं मांगता था, जब एक दिन कोमल के परीक्षा चल रही थी तो कोमल ने उस लड़के को जल्दी चलने को कहा तो उसने बिना कोई और सवारी लिए कोमल को कॉलेज छोड़ा, और परीक्षा खत्म हुई तो वो बाहर ही खड़ा मिला और उस दिन कोमल को उसके घर तक छोड़ा। कोमल ने उसे और रुपये दिये तो उसने लेने से मना कर दिया तो कोमल को कुछ अजीब लगा, तो अगले दिन उसने दुसरा ऑटो ले लिया वापसी में जब कोमल दूसरे ऑटो का इंतजार कर रही थी तो वो लड़का आया तो कोमल ने मना कर दिया, तो उस लड़के ने ऑटो से निकल कर कहा दीदी आपके परीक्षा चल रही है समय मत खराब करो, मैं आपको घर तक छोड़ दूंगा, कोमल को गुस्सा आगया और कहा मुझे मत सिखाओ।

तो उस लड़के ने अपना परिचय देते हुए कहा- दीदी मेरा नाम धर्मेद है, मैं भी बहुत पढ़ना चाहता था पर मेरा स्कूल मेरे गांव से दूर था अाने -जाने का कोई साधन नहीं था इसीलिए मैं आगे नहीं पढ़ सका, पर चाहता हूँ मेरे जैसी मजबूरी किसी की ना हो इसीलिए आपको रोज कॉलेज और घर तक छोड़ता हूँ। ये सुन कोमल रोज उसी के साथ जाती थी और मन ही मन कहती।

एक सलाम धर्मेद की ऐसी सोच को।

दोस्तों ऐसे कई उदाहरण हमें अपने आस-पास देखने और सुनने को मिलते हैं सलाम उन सब की ऐसी सोच को। आपको भी ऐसे उदाहरण देखने को मिलते होंगे या आपके साथ भी ऐसा कुछ हुआ हो या आपने कुछ किया तो जरूर बताये, धन्यवाद।

Image Source: livemint



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