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@dawriter

उलटी चप्पलें

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मुसीबत घने कोहरे सी थी। चारों ओर नक्सलियों से घिरा एक पुलिस थाना, जिसमें इंचार्ज से लेकर सिपाही तक सब नई भर्ती।

पिछले सारे पुलिसिए एक नक्सली हमले में ख़त्म हो चुके थे। सिवाए एक हवलदार के।

थाना इंचार्ज चिंतित ज़रूर था पर डरा हुआ बिलकुल भी नहीं। ज़िन्दगी भर उसने तबादले ही देखे थे। बल्कि उसे इस बात की ख़ुशी होती थी कि उसकी ईमानदारी से बड़े-बड़े मंत्री डरते थे और उसको इधर-उधर भेज देते थे।

"हरिश्चन्द जी, अंदर आओ।" उसने हवलदार को आवाज़ दी।

"जी साहब" हरिश्चन्द बावन साल का चुस्त-दुरुस्त हवलदार था। कोई सिपाही हो या सुपर साहब, हर कोई उसकी इज़्ज़त करता था। कइयों का कहना था कि वो अब तक आठ नक्सली हमलों से बच चुका था। और तो और सैकड़ों नक्सलियों को ऊपर भेजने का फक्र भी उसे हासिल था।

"हरीशचंदजी, तुम्हें नहीं लगता कि उस हमले के बाद से कुछ ज्यादा ही अशांति फ़ैल गयी है एरिया में?"

"बिलकुल लगता है साहब"

"इसकी कोई वजह सुझा सकते हो?"

"जी साहब, कोई बड़ा हमला होने वाला है।"

थाना इंचार्ज उसका मुंह ताकने लगा।
"बैठो हरिश्चन्द जी"

हरीशचंद बैठा।

"अब कहो, कैसे कह सकते हो ऐसा?"

"पिछले हमले से पहले भी ऐसे छुट-पुट गोली-बारी थी, ताकि हम गाँव वालों की सुरक्षा में ही चिंतित रहें, फिर अचानक सब ख़त्म हो गया।"

"हूँ....हमला हुआ क्यों था? कोई ख़ास वजह या आदतन?"

"साहब आदतन कौन कातिल होता है? कोई दीवाना हो तो हो, गंवार आदमी नहीं होता"

"फिर वजह क्या थी?"

"वजह घिनौनी थी। हमारे थानेदार साहब ने एक बच्चा मार दिया था।"

"क्या! ये कैसी बकवास है? कोई पुलिसिया ऐसा कर ही नहीं सकता।" साहब भड़के।

"आपके न मानने से कोई ज़िंदा नहीं होने वाला साहब, कहानी गम्भीर है"

"मैं जानना चाहता हूँ"

"मैं बताना नहीं चाहता"

साहब हड़बड़ा गए "क्यों?"

"क्योंकि आप जानना चाहते हो पर मानना नहीं चाहते"

"कमाल है, ऐसे कौन बात करता है थाना इंचार्ज से?"

"हम करते हैं साहब। और डर काहे का, और कुछ साल रहे रिटायरमेंट के, किसी की गोली खा के मरेंगे या साहब की डांट खा के, क्या फर्क पड़ेगा, पिछले तीस सालों से कोई तरक्की नहीं की गयी हमारी, क्यों? क्योंकि हम नहीं चाहते। हम खुश हैं हवलदारी करके। जहाँ लालच आड़े न आए, वहां डर पीछे हो जाता है।" हरीशचंद निर्विकार भाव से बोला। साहब मुँह बाय उसे देखता रहे। फिर खुद ही हार कर बोले "अच्छा पूरी बात बताओ क्या हुई थी?"

"पिछले साहब, देशज सिंह ने जंगलों में एक दबिश डाली थी जहाँ उन्हें शक़ था कि नक्सली बसर करते हैं। पर न हथियार मिले न नक्सली, मिली तो कुछ औरतें, उनके बच्चे और ढेर सारी शराब। उनमें से एक बच्चे के हाथ में कारतूस देख साहब भमक गये, हड़ गये के यहाँ तो नक्सली ही रहते हैं; उस बारह साल के बच्चे को जीप के पीछे दौड़ाते हुए थाने ले आए। वो लाख पूछने पर भी कुछ न बोला, बस 'छोड़ दो' की रट लगाता रहा। उसकी माँ भी दौड़ती-हाँफती पंद्रह मील का फासला तय कर देर शाम को यहाँ पहुँची। पर साहब को दया न आई, उस बच्चे को पीटने लगे। वहीं की उठाई शराब भी चढ़ा लिए, इतना पीटा की बच्चा अधमरा हो गया। सारे पुलिसिए हँसते रहे, उसकी माँ और बच्चा बिलखते रहे। सब टुन्न थे, साहब कुछ ज्यादा ही टुन्न थे इसलिए सो गए। उसकी माँ भी सो गई, बालक भी बिलखता आखिर सो ही गया।"
हरीशचंद चुप हुआ तो उसने देखा साहब मग्न होकर उसकी बात सुन रहे हैं।

"फिर क्या हुआ बताओ तो...."

"फिर सुबह हमारी नींद सबसे पहले खुली, कोई पांच बजे थे। हमने देखा बच्चा मरा पड़ा था। उसकी माँ गायब थी। सुबह दस बजे तालाब में डूबी हुई मिली।"

"हे भगवान! इतनी धांधली!! फिर इस बात पर प्रशासन ने कोई एक्शन क्यों नहीं लिया?"

"अरे साहब, एक्शन कहाँ से ले, कोई बात पता तो चले तब तो एक्शन ले। उस बच्चे को थाने के पीछे वाली मिट्टी में ही गाड़ दिया है। फिर एक हफ्ते बाद ही नक्सलियों ने भीषण हमला कर दिया, सब शहीद हो गए।"

"सिवाए तुम्हारे"

"हाँ, सिवाए हमारे। हम भी मार दिए गए होते, लेकिन उस वक़्त हम तीन लाशों के नीचे दब गए। उन्हें लगा हम भी मरे हुए हैं इसलिए....."

"पर जब ये बात किसी को पता नहीं चली तो फिर नक्सलियों को कैसे...." साहब पूरी बात भी न कर पाए कि एक सिपाही ने आकर बताया "साहब, गाँव में एक घर लूट लिया गया। औरतों के साथ भी बदफेली की गयी और....."

"पूरी बात ख़त्म करो प्रमोद, अटक क्यों रहे हो।"

"दूध पीते बच्चे के गोली मार दी गयी।"

"क्या! किसने किया ये सब?" साहब अपनी सीट से खड़े हो गए।

"वही साहब!"

"उठो हरीशचंद जी, चलो मेरे साथ। हमें अभी गांव वालों से मिलना है।"

हरीशचंद उठा ही था कि दूसरे सिपाही ने बताया कि एक बूढ़ा मिलना चाहता है साहब से।

"पहले गाँव होकर आते हैं, फिर मिल...."

"साहब, पहले मिल लीजिए, आदमी काम का न हुआ तो यहीं से भगा देंगे। काम का हुआ तो शायद कहीं जाने की ज़रुरत ही न पड़े!"

"नहीं, पहले जनसेवा, फिर फ़ालतू बातें!"

"अभी कुछ देर पहले ऐसा ही कुछ समझाया था हमने आपको। सारा फ़ोर्स अगर एकही जगह चला जायेगा तो पीछे थाना कौन संभालेगा?"

साहब को बात जंची। अब उन्हें भी हैरानी हुई कि क्यों आखिर ये हवलदार अब तक हवलदार ही रह गया।

उन्होंने अपने जूनियर को मौका ए वारदात पर ज़रूरी हिदायतों के साथ भेजा और उस बूढ़े आदमी को अंदर बुलाया।

एक झोलझाल सा आदमी अंदर आया। उसे देख कर लगता था जैसे उसे सदियों पहले बुढ़ापा आ चुका है। उसकी और साहब की आँखें मिली, साहब उसकी लाल भभूका आँखों से आँखें मिलाए न रह सके। उसने हरीशचंद की तरफ देखा। वो उसे ही घूर रहा था।

"बोलो बाबा, क्या बोलना चाहते हो?"

"मेरा नाम..."

"नाम पता रजिस्टर में लिखवाना। अभी काम बोलो"

उसने बोला।

साहब फिर चौंक उठे। फिर बोले "हम कैसे मान लें कि..."

"साहब हाथ कंगन को आरसी क्या... गिन कर देख लेना" 

"ताकि सारे नक्सली मिलकर हम सबका सफाया कर सकें?"

"ये शब्द एक योद्धा की ज़ुबान नहीं बोल सकती।" अचानक बूढ़े की आवाज़ में दबंगई आ गयी। "अगर तुम लड़ने से घबराते हो तो हर तरफ मृत्यु है तुम्हारे लिए। कहीं मृत्यु तुम्हारी प्रतीक्षा करेगी या फिर तुम यहाँ बैठे उसकी प्रतीक्षा करोगे। अब चुनाव तुम्हारा होगा कि तुम खुद मृत्यु पर विजय पाने निकलते हो या यहीं बैठे उसका इंतज़ार करते हो।" बूढ़ा चुप हुआ तो उसकी साँसे फूल रहीं थीं।

साहब और हरीशचंद गहन चिंतन में डूब गए।
_______

सूबे का सरदार आज बहुत परेशान था। बलात्कार करने से उसे कोई परहेज नहीं थी पर दूधमुहें बच्चे को मारकर वो खुद को घिनौना महसूस कर रहा था। घनघोर रात छाई थी। उसके तकरीबन साथी सो चुके थे, या नशे में धुत्त थे। जबसे उसने पुलिसियों की एक चौकी उड़ाई थी तबसे गाँव के लोगों ने उससे हमदर्दी कम कर दी थी। चौकी उड़ाने से पहले तक तो गाँव वाले पूरी तरह उसका साथ देते थे पर अब, ख़ासकर कुछ औरतें उसकी बिलकुल नहीं सुनती थीं। इसी गुस्से में आज उस औरत को खूब मजा चखाया उसने।

उनकी साँसे तेज़ होने लगीं। पर बच्चे का चेहरा घूमते ही उसका नशा काफूर हो गया। वो जानबूझकर चौकी पर किए हमले को याद करने लगा। कैसे मिनटों में सारे थाने को शमशान बना दिया था। बस एक सिग्नल मिला था और उस थानेदार का तो सीना छलनी कर दिया था।

उसकी बेचैनी कम न हुई, वो तंबू से बाहर निकला। सब सो रहे थे या नशे में पड़े हुए थे। उसके ठिकाने के मुहाने पर दो जाबाज़ लड़के बन्दूक लिए पहरा देते थे पर आज वो भी नहीं थे।
अचानक उसकी निगाह बाहर उतरी चप्पलों पर पड़ी। उसने गुस्से से थूका, उसे उल्टी चप्पलें बिलकुल पसंद नहीं थी। उसने लात मार के उन्हें सीधा किया। अपने अड्डे से थोड़ा बाहर निकला, शायद रात जागने वाले लड़के कहीं इधर-उधर हुए हों।
लेकिन वहां भी उसे लावारिस सी दो चप्पलें मिली, उल्टी। वो मुस्कुराया, थाना बर्बाद करते वक़्त भी ऐसे ही चप्पलें थाने के बाहर मिली थी उसको। सिग्नल।

इससे पहले कि वो वापस घूमता, एक मस्कट उसके सीने पर लगा दी गयी।

"हिला तो मौत" सिपाही ने चेतावनी दी।

वो जड़ हो गया। दिमाग तेजी से आगे क्या करना है, सोचने लगा।

"साहब ये इनका सरदार है, इसे पकड़ ले चलें तो ये सब वैसे ही खत्म हो जायेंगे।"

"नहीं!" थाना इंचार्ज ने खंडन किया "कोई ज़रुरत नहीं। आज इसे थाने ले गए तो कल ये नेता बन जायेगा"

"फिर क्या करें साहब?"

"ये करो" साहब का निशाना उसकी खोपड़ी बनी।

दो घण्टे चले उस इनकाउंटर में करीब अड़तीस नक्सली मारे गए।

वहाँ कोई नहीं बचा, सिवाए एक बूढ़े नक्सली के। वो कई लाशों के नीचे दब गया था।

थानेदार ने हरीशचंद की खूब तारीफ की। सुबह के पहले पहर एक सिपाही ने हरीशचंद से पूछ ही लिया "बाउजी एक बात बताओ, जिस बूढ़े ने मुखबिरी की, वो पहले भी ये काम कर चुका है न?"

"हाँ" अपने हाथ धोते हरीशचंद ने जवाब दिया।

"उसका नाम क्या है? ये कोई नहीं जानता"

"मैं भी नहीं जानता, बस यूँ समझ कि मैं उसे विभीषण कहता हूँ, और वो मुझे विभीषण कहता है"

#सहर

#अवतार_सिरीज़



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