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@dawriter

इंसानी भेदभाव व दुश्मनी… जिम्मेदार शायद हम खुद ।।

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हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई आपस में है भाई-भाई...

यह नारा हमें अक्सर सुनने को मिल ही जाता है,कानों में पड़ते ही एक सुकून सा दे जाता है। पूरे देश‌ में आपसी एकरूपता व प्रेम का एहसास दिला जाते है यह चंद शब्द। कहते हैं कि ईश्वर एक ही है उसी ने ही पूरे संसार की रचना की है, उसके द्वारा कभी भी भेदभाव नहीं किया गया व न ही कभी भी उसने यह सोचकर किसी जीव में प्राण डाले होंगे कि धरती पर जाकर यह इंसान भेदभाव का शिकार बनेगा क्योंकि जिस प्रकार माता-पिता के लिए अपना हर एक बच्चा ‌एक समान होता है उसी प्रकार ईश्वर के लिए भी अपना हर एक बच्चा एक समान है।

लेकिन अफसोस की बात यह है कि हम उसके द्वारा बनाए गये इस सुंदर संसार में एक साथ प्रेम व मिलन सार होकर रहने की‌ ईश्वर की इच्छा को‌ पूरा न कर पाये। हम खुद इंसान होकर दूसरे इंसान के साथ भेदभाव करने की राह पर निकल पड़े हैं, वो भेदभाव चाहे ऊँच व नीच जाति के बीच मे हो या फिर अमीर व गरीब के बीच मे हो यह कीड़ा हमारे दिमाग में घर कर चुका है कि‌‌ अगर हम ऊँची जाति या फिर अमीर हैं तो हम कदापि अपने से नीची जाति व गरीब लोगों से बात नहीं करना पसंद करेंगे ।।।।

बड़ा ही दुःखद विषय बनता जा रहा है‌ यह हम इंसानों में भेदभाव का पनपना....हमे कभी भी नीची जाति वालों के घर का पानी तक गवारा नहीं यहां तक‌ कि उनके हाथ से कोई चीज लेना तक पसंद नहीं करते

आखिर क्यों???? क्या उनके घर में एम सी डी वालों ने अलग पानी की पाइपलाइन लगा रखी है???? जिसमें दूषित पानी आता है या फिर उस पाइपलाइन में गरीबी व नीची जाति का टैग लगा दिया जाता है जिसे पीना हमें पसंद नहीं! कृपया बुरा मत माने यही वो लोग है जो ‌अपना पेट पालने के लिए ‌आपके घर का कूड़ा उठाते हैं,,शौचालय साफ करते हैं, गली की नालियाँ साफ‌ करते हैं अगर यह लोग न‌ हो तो शायद हम लोग एक भी दिन इस गंदगी में ना निकाल पाए। वे केवल‌ बदले में ‌वो‌ प्यार के बोले हुए ‌दो शब्द मांगते हैं लेकिन हमारे द्वारा अक्सर उन्हें धिककार दिया जाता है। विचार कीजिएगा अवश्य!!!!!!

अभी कल की ही बात है हमारी गली में एक फल बेचने ‌वाला आया..वह शरीफा बेच रहा था जोकि मुझे बेहद पसंद रहा है जैसे ही‌ मैं लेने के लिए बाहर गयी तो‌ मेरी पड़ोसन बोली‌ कि‌ यह‌ तो‌ मुस्लिम फल है यह क्यों खाती हो????मुझे काफी अटपटा सा लगा फिर मैं तपाक से बोली कि फल कब से हिन्दू व मुस्लिम के होने लगे???? फलों का बंटवारा कब से होने लगा????फल‌ क्या खुद कहने लगे हैं कि हम मुस्लिम फल है कृपया करके हिन्दू हमें ना खाए!!!?

खैर, मेरे सवालों का जवाब देने में वो असमर्थ रही!!!! हद है हम‌ लोगों की सोच पर और एक बात पूछना चाहूँगी कि जब हम‌ फलों में यह सोच रखते हैं तो फिर खजूर जिसे कि सर्दियों का ड्राइ फ्रूटस‌ कहा जाता है... खाते समय हमारी यह सोच कहाँ चली जाती‌ है, वो तो सबसे ज्यादा मुस्लिम देशों में ही‌ पाया जाता है वो चाहे...इराक़, ईरान, अल्जीरिया, सऊदी अरबिया हो या फिर इजिप्ट ही क्यों न हो यह सब अरेबियन राष्ट्र हैं तो मुस्लिम देशों से आयात होने पर यह मुस्लिम ‌फल बन गया तो शायद हम हिन्दुओं को इसे नहीं खाना चाहिए….लेकिन नहीं हमारे यहाँ तो खजूर सर्दियों में एक मीठे के रूप में खाना बेहद पसंद किया जाता है यहाँ तक कि घर में विवाह होने पर सगुन के फल के टोकरे मे सबसे ऊपर मीठे के रूप में रखा जाता है।

अौर‌ ‌तो ‌और हमारे ‌द्वारा जानवरों ‌का ‌भी ‌बंटवा‌रा कर दिया गया है। क्यों सही कह रही हूँ ना मैं?????

मेरे घर में पिछले आठ सालों से घर का काम करने ‌वाली एक मुस्लिम औरत है‌ इतने समय में मानो कि‌ वो हमारे घर का हिस्सा बन चुकी है समय मिलने पर हमारे साथ बैठकर खाना खाना व चाय तक पीती है, धन से नहीं लेकिन मन से हमारे हमेशा काम आने के लिए सदैव तत्पर रहती है...व अपनी ईद का त्योहार आने पर हमें मिठाई तक खिलाती है अब उसके इस प्यार को देखकर क्या हम उससे यह सोच कर नफरत करे कि वह एक मुसलमान है.

शायद बिलकुल नहीं!!!!!!

वक्त बदल चुका है अब तो हर इंसान हर त्योहार मनाने में यकीन करने लगा है वो त्योहार चाहे उसके धर्म का हो या फिर न हो…अब CADBURY कंपनी को ही देख लीजिए पिछले दो सालों से ईद को सेलिब्रेट करने के लिए अपने चॉकलेटस के गिफ्ट पैक निकालने लगा है यह बस आपसी प्यार बढ़ाने की कोशिश ही तो है..…बस अपनी अपनी सोच व समझ की बात है.

मेरी सोच तो मुझसे यही कहती है कि‌ जिस प्रकार ईश्वर एक है वो चाहे भगवान ,ईसा मसीह ,अल्लाह या फिर रब के रूप में ही क्यों न हो तो उसके द्वारा बनाये गये हम इंसान एक साथ मिल कर क्यों नही रह सकते ।।।।

छोड़ दीजिए यह जाति व धर्म का भेदभाव मिल कर जिओ व प्रेम से जिओ।।।।।।

धन्यवाद ।

मोना कपूर

 



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