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@dawriter

आवाक

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लघुकथा

अवाक !
" सुनो क्यों इतनी चिन्ता कर रहे हो? सब ठीक हो जायेगा।अपना मकान कब काम आयेगा आखिर! इसे गिरवी रख कर इतने पैसे मिल जायेंगे कि आसानी से उनकी डिमाण्ड पूरी हो जायेगी।"
" क्या कह रही हो निशा! अभी दो बच्चे और हैं इनका भी तो सोचना है। "
" तब की तब देखी जायेगी आप समधी जी को फोन करो और कल शाम की मीटिंग फिक्स कर लो।"
" लेकिन अगर हम अपने सर की छत भी खो बैठे तो---"
बीच में ही बात काटकर निशा बोली ,
" शुभ - शुभ बोलिये जी ऐसा कुछ नहीं होगा।"
सुधीर को थोड़ी राहत मिली। चाहते तो वे भी थे यही लेकिन पत्नी से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे।

मीटिंग फिक्स हो गयी और अगले दिन लड़के वालों के यहां जाना तय हुआ।
अशोक जी और उनकी पत्नी अपने इकलौते बेटे की शादी में पूरी वसूली कर लेना चाहते थे। उनकी कोशिश यह थी कि कोई कसर न रह जाये।
शिशिर यह सब बिल्कुल नहीं चाहता था लेकिन संस्कारी था, अधिक विरोध नहीं कर पा रहा था। पिता के सामने कुछ बोलने की बदतमीज़ी नहीं करना चहता था।

अगले दिन लड़की वालों के स्वागत सत्कार की पूरी तैयारी की जा रही थी ।

" माँ, मै यहां बैठकर आप सबकी बातें नहीं सुन पाऊंग। तुम जानती हो मुझे यह सब बिल्कुल पसन्द नहीं है। मैं जा रहा हूं और उन के जाने के बाद ही लौट कर आऊँगा। "
अरे बेटा सुन तो सही --- " सीमा रोकती ही रह गई। शिशिर निकल गया घर से।
शाम को सुधीर और निशा उनके घर पहुंचे। चाय नाश्ता हुआ और उसके बाद मुद्दे की बात पर आ गये। गाड़ी की मांग पूरी कर दी गई थी। अब अशोक जी ने कहा, " आप इतना कर ही रहे हैं तो कहना अच्छा तो नहीं लग रहा लेकिन हम चाहते हैं कि ज़्यदा नहीं तो पांच लाख कैश का और कर दीजिये आप तो जानते ही हैं , शिशिर इकलौता बेटा है हमारा और शादी के बाद यह सारी ज़मीन - जायदाद, रुपया - पैसा आपकी बेटी का ही तो है
यह सुनकर सुधीर के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

"लेकिन आप भी तो जानते ही हैं भाई साहब कि हमारे लिये कितना मुश्किल हो जायेगा यह सब करना। "

" देखिये रिश्तों की कोई कमी नहीं है हमारे बेटे के लिये। "
" यह कैसी बात कर रहे हैं आप ! " सुधीर की आवाज़ मे भी थोड़ा गुस्सा दिखा।
बात थोडी बढ़ रही थी तभी दरवाजे पर दस्तक सुनी और थोड़ी ही देर बाद जो देखा उस पर किसी को विश्वास ही नहीं हो रहा था।

शिशिर और पूजा सामने खड़े थे। दोनो के गले में जयमाला थी। पूजा की मांग में सिन्दूर और दोनो के हाथ एक दूसरे के हाथ में।
सब अवा !

मंजु सिंह



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