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@dawriter

अगले जनम मोहे बिटिया ही दीजो

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जब संयोगिता के पैर तबले की ताल पर थिरकते तो लोगों को लगता कि साक्षात नटवर ही नृत्य कर रहे हों, चेहरे की भाव भंगिमाएँ देख दर्शक मन्त्र मुग्ध हो जाते थे।सिर्फ नृत्य ही नहीं वरन सुर का वरदान दिया था उसे ईश्वर ने ,पता नहीं क्या था उसमें कि जो उससे मिलता उसी का हो जाता था।

तीन बहनों में सबसे छोटी संयोगिता, जिसके जन्म लेने पर घर में मातम मना था। दादी तो ऐसे रोयीं थी जैसे कोई मर गया हो। सबको अबकी बार बेटा चाहिए था।पापा ने तो उसे देखा भी नहीं था अब तक.माँ अपनी किस्मत को कोस रही थी और वो नन्ही सी संयोगिता इस दुनिया को अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से देख रही थी.पर कोई था जो उसके आने से बहुत खुश था। वो थीं दो मासूम बच्चियाँ अंकिता और अर्पिता, संयोगिता की बड़ी बहनें जो कभी अपनी छुटकी के माथे को सहलातीं, कभी उसकी उंगली पकड़तीं.

छुटकी के होने के 1 महीने बाद ही रक्षाबन्धन पड़ा था। आज सुबह से घर में सन्नाटा पसरा था। दादी कह रहीं थीं इसकी जगह आज मेरे पोते ने जन्म लिया होता तो घर में उत्सव मन रहा होता, इन लड़कियों की राखी को भी किसी की कलाई मिल जाती। ये अभागियाँ अब किसे बांधेंगी राखी? 8 साल की अंकिता ने दादी से पूछा दादी राखी क्यों बांधते हैं?

तब दादी ने कहा भाई बहनों की रक्षा करते हैं। उनके सब तीज-त्यौहार करते हैं,उनका ख्याल रखते हैं इसीलिए बहने उन्हें रक्षा बांधकर उनकी लम्बी आयु के लिए भगवान से प्रार्थना करती हैं। जाने अंकिता को क्या समझ आया, वो भगवान को चढ़ाई हुई राखी ले आयी और उसे संयोगिता की नन्ही कलाई में बाँध दिया और दादी से बोली भगवान मेरी छुटकी को बहुत लंबी उम्र दें। ये सब देख माँ ने अपनी तीनो बेटियों को सीने से लगा लिया, बहुत दिनों बाद उनकी आंखों से खुशी के आँसू बरस रहे थे।

समय बहुत तेजी से बीत रहा था। अंकु, अप्पू और छुटकी तीनों एक दूसरे का हाथ थामे उम्र की सीढ़ियां चढ़ती जा रही थीं।

अंकिता अर्थशास्त्र से एम. ए. कर रही थी और नेट की तैयारी भी कर रही थी। अर्पिता बी. एस. सी के द्वितीय वर्ष में थी। वो डॉक्टर बनना चाहती थी, पर दादी ने कहा जितना खर्च उसके ट्यूशन और पढाई में खर्च होगा उतने में इसकी शादी हो जाएगी। इस साल संयोगिता का हाई स्कूल था। तीनों बहनें बहुत मेहनती थीं वो नहीं चाहती थीं कि जिस तरह माँ को घर खर्च के रुपयों के लिए पापा के आगे हाथ फैलाना पड़ता है, उन्हें कभी न फैलाना पड़े। पर चाहा हुआ कुछ कहाँ होता है, पापा चाहते थे उनके कार्यमुक्त(रिटायरमेंट)होने से पहले कम से कम अंकिता और अर्पिता की शादी हो जाये।

आज अंकिता दुल्हन बनी बैठी थी, बारात दरवाजे पर आ चुकी थी। सब बारात देखने के लिए छत पर और नीचे चले गए थे, तभी संयोगिता दौड़ती हुई आयी और अंकिता के लगते हुए बोली दी वो लोग आ गए अब सब तुम्हे ले कर चले जायेंगे। अंकिता ने अपनी छुटकी को कस के पकड़ लिया, नहीं जाऊंगी छुटकी कहीं नहीं जाऊंगी तुझे छोड़कर। अर्पिता भी वहाँ आ गयी, तीनों बहने एक दूसरे को पकड़े रो रही थीं।

अंकिता खुश थी अपनी जिंदगी में, आकाश बहुत अच्छे थे उनके सहयोग से अंकिता ने अपनी पी. एच. डी शुरू कर दी थी। उसे कभी अपनी जरूरतों के लिए आकाश से माँगना नहीं पड़ता था, माँ भी बहुत खुश थीं। अंकिता के बेटे के जन्म पर दादी ने बहुत बड़ा कार्यक्रम करवाया था, कह रही थीं मेरे बेटे को आग देने वाला आ गया। अर्पिता और संयोगिता तो जैसे खुद ही माँ बन गईं थीं। दिन भर अपने नन्हें राजकुमार के आगे-पीछे घूमती रहती थीं।

वक्त बहुत तेजी से बदल रहा था, अगर कुछ नहीं बदला तो वो थी, पापा की बेटियों को बोझ समझ जल्दी से निपटाने की मानसिकता।

आज अर्पिता भी अपने ससुराल जा रही थी। बहुत रोयीं बहुत मिन्नतें की, पापा बस 2 साल और दे दीजिए। मुझे तैयारी करनी है ,पढ़ना है लेकिन वही तीन बेटियों के लाचार पिता की मजबूरी। चाह कर भी कुछ नहीं कर सकी संयोगिता अपनी दीदी के लिए। हर चीज का जिम्मेदार वो खुद को मानने लगी थी। काश वो बेटा बन कर आयी होती।

संयोगिता ग्रेजुएशन के साथ साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर रही थी। वो जानती थी कि उसकी दोनों दीदियों की तरह उसे भी बहुत समय नहीं मिलेगा। अंकु दीदी हमेशा कहती हैं, "शादी से पहले जो करना है वो कर ले छुटकी, बाद में पढ़ाई नहीं हो पाती" लेकिन उसे तो शादी ही नहीं करनी थी। वो माँ पापा को छोड़कर कहीं नही जाएगी,कभी नहीं।

समर संयोगिता का बहुत अच्छा दोस्त था। उसे कभी कभी लगता था समर के मन में कुछ और भी है दोस्ती से ज्यादा। अच्छा तो उसे भी लगता था वो, लेकिन अपने बहकते ख्यालों को वो खुद ही रोक लेती थी। उसे तो बस अपने माँ पापा का बेटा ही बनना था और फिर समर तो दूसरी जाति का भी था। पापा और दादी कभी तैयार नहीं होंगे। संयोगिता पापा को कोई मौका नहीं देना चाहती थी। उसके बेटी होने पर अफसोस करने का, वो तो सपने में भी देखती थी कि, पापा उसे गले लगा कर कह रहे हैं," छुटकी तू मेरी बेटी नहीं बेटा है"।

अर्पिता खुश नहीं थी अपनी जिंदगी में, सुमित उसे हर बात पर जलील करते थे, उसे नौकरी भी नहीं करने देते थे। कितने सपने देखे थे उसने, अपनी जिंदगी को लेकर वो सब एक एक कर टूट रहे थे। ये सब सोच सोच कर माँ बहुत परेशान रहती थीं। पापा भी दुखी थे लेकिन यही कहते थे अब वही उसका घर है, वो जैसे कहें उसे वैसे ही रहना होगा।

आज एस.एस.सी का परिणाम आने वाला है, संयोगिता ने भी दिया है इम्तिहान, सुबह से बहुत परेशान है वो। अर्पिता की परेशानियाँ बढ़ती जा रही हैं, सब कुछ ठीक होने के इन्तजार में साल निकलते जा रहे हैं। दादी के जाने के बाद पापा और उदास रहने लगे हैं। जाते जाते दादी को छुटकी से बड़ा प्यार हो गया था।सुबह शाम उसके हाथ की चाय पीतीं और कहतीं,"कुछ तो है तुझमे, क्या जादू करती है तू, तेरे हाथ का साग भी अमृत ही लगता है"।

संयोगिता सफल हो गयी अपने पहले प्रयास में ही, हालांकि यह उसकी मंजिल नहीं थी लेकिन बहुत खुश थी वो, क्योंकि आज पापा बहुत खुश थे। जिस सचिवालय में पापा बड़े बाबू थे, आज वहीं उनकी बेटी समीक्षा अधिकारी बन गयी।

अंकिता और संयोगिता अर्पिता के पास गई हैं, सुमित का व्यवहार अर्पिता के लिए दिन प्रति दिन खराब होता जा रहा है, अर्पिता की मानसिक स्थिति भी ठीक नहीं थी।

सुमित ने कहा आप दोनों मेरे घर के मामले में न पड़ें तो बेहतर होगा। अर्पिता मेरा मसला है, मैं निपटा लूँगा। संयोगिता चीख उठी,"मसला? दीदी आपका मसला है? पहले पापा की जिम्मेदारी थी, अब आपका मसला है। आप समझते क्या हैं खुद को, हालत देखी है मेरी दी की! पूरे कॉलेज में टॉप करने वाली अर्पिता अब आपका मसला है। बस बहुत हो गया, नहीं रहेगी दी अब यहाँ, चलो दी,बहुत बर्दास्त कर लिया तुमने, अब अपने घर चलो।

अंकिता सोच रही थी दादी कहती थीं,"भाई ,बहनों की रक्षा करते हैं" आज तो मेरी छुटकी ही बचा लायी अप्पू को ।

अर्पिता की हालत देख माँ, पापा बहुत परेशान थे। आज पहली बार उन्हें अपने किये पर पछतावा हो रहा था। जाने किन ख्यालों में खोए हुए थे पाप, बाजार से सब्जी ले कर आ रहे थे और एक कार के आगे आ गए...रीढ़ की हड्डी में चोट लगी थी, डॉक्टर ने कहा अभी 6 महीने चल फिर नहीं पाएंगे।

पापा घर आ गए थे। संयोगिता के ऊपर पूरे घर की जिम्मेदारी आ गयी थी। अंकिता कुछ दिन के लिए आई थी, लेकिन बेटे की पढ़ाई खराब होने की वजह से संयोगिता ने उसे भेज दिया। अर्पिता ने खुद को बटोरना शुरू कर दिया था और संयोगिता ने सभी जिम्मेदारियों को संभालना शुरू कर दिया था। माँ उसकी शादी के लिए परेशान थीं लेकिन वो करना ही नहीं चाहती थी।

समर, संयोगिता की जिम्मेदारियों को बाँटना चाहता था लेकिन संयोगिता ने मना कर दिया। उसकी दौड़ती -भागती जिंदगी में इन अहसासों और भावनाओं के ठहराव की फुर्सत नहीं थी उसे।

रक्षा बंधन का दिन है आज, अंकिता भी अपने दोनों बेटों के साथ आयी हुई है, दोनों बहनों ने अपनी छुटकी के हाथ में राखी बाँधी। भगवान तुझे सब खुशियाँ दें कह कर अंकिता ने उसे गले लगा लिया, आज भी उसका मुलायम स्पर्श उसे 26 साल पुरानी छुटकी का अहसास दिला देता था।

बहुत दिन से संयोगिता की तबियत ठीक नहीं थी, दवाई खा-खा कर वो काम कर रही थी। दिन प्रति दिन कमजोर होती जा रही थी। कुछ महीनों से वो एक "एन जी ओ"से जुड़ गई थी जिसमे अनाथ बच्चों के लिए काम किया जाता था। उन बच्चों के साथ बहुत खुश रहती थी। एक दिन उसने माँ से कहा "मैं एक बच्ची गोद लेना चाहती हूँ "माँ रोने लगी, ऐसा क्यों कह रही हो बेटा? अभी तुम्हारी उम्र क्या हुई है, मैं तुम्हारी शादी करूँगी और तुम्हारे बच्चे को खिलाऊँगी। अब से ऐसी बात मत करना।

कैसी बात माँ ? किसी बच्चे को मैं प्यार देना चाहती हूँ तो इसमें गलत क्या है? माँ ने उसे फिर डाँट दिया तो मुस्कुरा कर माँ के गले लग गयी और बोली अच्छा चलो 4 साल बाद गोद लूंगी। अगले दिन उसकी तबियत ठीक नहीं थी लेकिन एन जी ओ से फोन आ गया कि आज उसका स्थापना दिवस है। सभी बच्चे संयोगिता दीदी से मिलना चाहते थे।

बच्चों को किसी ने बता दिया कि उनकी दीदी बहुत अच्छा नृत्य करती हैं तो वो सब संयोगिता से नृत्य करने के लिए जिद करने लगे। आज बहुत दिनों बाद संयोगिता नृत्य कर रही थी, उसका नृत्य, जैसे सम्पूर्ण सृष्टि नृत्य कर रही हो ,उसकी भाव भंगिमाएँ जैसे वो आंखों से ही बात कर रही हो। सब खो गए। अर्पिता भी उसके साथ गयी थी,उसकी आंखें बरस रही थीं। अपनी छुटकी, अपनी गुड़िया का ये रूप देख कर, तभी अचानक संयोगिता गिर गयी। सब घबरा गए,तुरन्त अस्पताल ले गए उसे,बेहोश संयोगिता को देख सारे बच्चे रो रहे थे।

"बहुत तेज बुखार था" ,इसी वजह से बेहोश हो गयी शायद, कुछ जाँच करवानी पड़ेगी। अर्पिता ने कहा, सब जाँच करवाइये डॉक्टर। इसे अक्सर बुखार हो जाता है। संयोगिता को होश आ चुका था, वो मुस्कुरा रही थी लेकिन उसकी कमजोरी उसके होठों के साथ नहीं दे रही थी। पापा अब धीरे धीरे चलने लगे थे। वो भी उसे देखने आये थे। दो दिन बीत गए लेकिन संयोगिता का बुखार उतर नहीं रहा था। अंकिता, आकाश सब आ गए थे। समर रोज हॉस्पिटल आता था, दूर खड़ा संयोगिता को देखता रहता।

आज संयोगिता की रिपोर्ट्स आ गयी थीं। आकाश और अंकिता डॉक्टर के पास बैठे थे, तब डॉक्टर ने कहा, बहुत देर हो चुकी है ,संयोगिता को ब्लड कैंसर है और वो लास्ट स्टेज में है। हम नहीं जानते वो कितने दिन इस दुनिया में है।

"सब शून्य हो गया था, जैसे निर्वात में बैठे थे दोनों।"

विश्वास से परे था सब, मेरी हँसती, खिलखिलाती छुटकी, कैसे जा सकती है हमें छोड़कर, उसे तो अभी बहुत कुछ देखना है। सजना है, संवरना है, खिलखिलाना है,थिरकना है। चीख उठी अंकिता, नहीं ऐसा नहीं हो सकता, बदहवास सी भाग रही थी संयोगिता के कमरे की तरफ।

आकाश ने संयोगिता की रिपोर्ट्स बाहर भेजी हैं, वो कुछ भी कर के संयोगिता को बचाना चाह रहे थे, अंकिता, माँ और अर्पिता जाने कौन कौन से व्रत कर रही थीं, हर कोई भगवान से चमत्कार की उम्मीद में था। पर संयोगिता एक दम शांत थी, हर वक़्त मुस्कुराती रहती।

पापा संयोगिता के कमरे में बैठे हुए थे, और वो आँख मूंदे लेटी हुई थी। आज पापा का मन बहुत घबरा रहा था, उन्हें बार बार वो दिन याद आ रहा था जब संयोगिता पैदा हुई थी। उसकी नन्ही नन्ही उंगलियों से वो उनका हाथ पकड़ लेती थी और वो उसे छुड़ा लेते थे। भगवान से कहते थे मुझे तो बेटा चाहिए था, क्यों भेजा इसे। ऐसा नहीं था कि उन्हें उस मासूम मुखड़े पर कभी प्यार नहीं आता था। लेकिन वो उसे अस्वीकार कर भगवान से नाराजगी जताना चाहते थे। आज उनकी आंखें बरस रही थीं, उन्हें याद आ रहा था, जब संयोगिता 5 साल की हुई थी तो उसने कहा था, "पापा आज मेरे जन्मदिन पर क्या दोगे आप? और उन्होंने कहा, कुछ नहीं, तुमने पैदा हो कर मुझे कौन सी खुशी दी है, जो मैं तुम्हें कुुुछ दूँ। उस दिन के बाद से उस बच्ची ने उनसे कभी कुछ नहीं मांगा, बस देती रही।

संयोगिता की नींद पापा की सिसकियों से खुल जाती है, वो अपने निर्बल उंगलियों से पापा के आँसू पोंछने लगती है, पापा उसे अपने गले से लगा लेते हैं और कहते हैं मुझे माफ़ कर दो बेटा, मेरी गलतियों की इतनी बड़ी सजा मत दो बेटा।

और संयोगिता मुस्कुराकर कहती है, मुझे अगले जन्म में भी आपकी ही बेटी बनना है 'पापा' आपके कंधे पे घूमना है, सीने से लग कर सोना है। मुझे फिर से बेटी ही बनना है 'पापा'।

हाँ बेटा, मुझे भी हर जन्म में ,तू ही चाहिए। तेरी जैसी बेटी पाकर मेरा जीवन धन्य हो गया। मैं धन्य हो गया 'बेटा' तुझे पाकर मैं धन्य हो गया।

संयोगिता पापा के कंधे पर सर रख के अपनी आंखें मूंद लेती है, आज उसके बचपन का सपना सच हो गया। बहुत खुश थी वो। इस जीवन में कोई अभिलाषा नहीं रह गयी थी और वो सो गयी हमेशा के लिए।

संयोगिता चली गयी,फूलों से सजी, फूल सी संयोगिता चली गयी हमेशा के लिए,और छोड़ गयी एक मिसाल कि बेटी कभी बेटे से कम नहीं होती।

अंकिता आज भी इन्तजार कर रही है, किसी न किसी रूप में उसकी छुटकी फिर मिलेगी उसे। उसने तो वादा किया था अगले जन्म में भी बेटी ही बन कर आएगी और अबकी अपनी छुटकी को वो कहीं नही जाने देगी।

आप सभी को मेरी कहानी कैसी लगी,जरूर बताइयेगा। इस कहानी में सब कुछ काल्पनिक नहीं है ये कहानी अगर किसी की सोच बदल सके तो इस रचना को मैं सार्थक समझूँगी।



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