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@dawriter

शुभ विवाह-II

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अचानक दरवाजा खुलने की आहट से लक्ष्मी की आँखे खुली, देखा तो कुंदन था।

आप।।

अपने आप को सम्हालते हुए क्योंकि अभी भी कुंदन से दूरी कायम थी।

वो मुझे नींद आ गई थी, उसने घ ड़ी की और देखा सुबह के छह बज रहे थे। थकान के बाद रात को तो नींद आयेगी ही न लक्ष्मी, माँ ने तुम्हें बुलाया है नीचे। कहते हुए कुंदन पूरे कमरे को ध्यान से देख रहा था, मानो महसूस कर रहा था कि ये कमरा अब उसका है भी या नही, इस कमरे में फैली खुशबू उसे परायेपन का अहसास दिला रही थी।

वो आप कल। लक्ष्मी ने कहा

क्या??? लगभग सकपाकते हुए मुझे हॉस्पिटल में थोड़ा काम है आता हूँ। ये कहकर कुंदन फिर चला गया।

उसकी सखियाँ कहती थी एक डॉक्टर से शादी हो रही है तेरी तुझे तो टाईम मिलना बडा़ मुश्किल होगा, पर ये तो बाद में होता शुरू से ही। लक्ष्मी अपनी ही उधेडबुन में रही, पहली रात ऐसी तो नही होती, कुछ बात करने का भी मौका न मिला, पर पूरी रात। न आने का मतलब, हो सकता है वो भी कही थक के सो गये हो। हॉस्पिटल में कोई इमरजेंसी हो गयी हो, पर माँ ने क्यों नही बताया, हो सकता है वो भी आई हो, मैं तो सो गयी थी। अपने ही सवालों का जवाब खुद ही दे रही थी।

इन्ही सवालों के साथ नयी नवेली दुल्हन लक्ष्मी तैयार होकर नीचे आई, मां रसोई में सबके लिए चाय बना रही थी। लक्ष्मी ने उनके पांव छुए तो माँ ने सिर पर हाथ रख कर कहा खुश रहो, अरे नयी नवेली दुल्हन को आशीर्वाद दूधो नहाओ पूतो फलो दिया जाता है ठकुराइन। बुआ सास ने कहा लक्ष्मी ने तुंरत बुआ जी के भी पैर छुए, माँ को देखा , एक अजीब सा भाव था उनके चेहरे पर, अरे मेरी लाडो जल्दी से अपनी जैसी परी या कुंदन जैसा छोरा हमे दे दे। बुआ बडे़ लाड़ से लक्ष्मी से कह रही थी।

कुंदन जैसा। हाँ.. ये कहते माँ किचन से चली गयी। शाम तक सभी मेहमान चले गए और फिर रात करीब आ रही थी। आज फिर कमरे में अकेला सन्नाटा और अकेली लक्ष्मी थी। 12 बज गए थे पर कुंदन, फिर भी नही आया था, लक्ष्मी को पता था कि इसी मंजिल के एक तरफ लाईब्रेरी है सोचा वहां हो, सीढियों से नीचे आकर देखा तो कुंदन बैठक के सोफे पे सो रहा था। किताब मुंह पर ही रख कर। सोचा पूछूं कि क्यों यहाँ सो रहे है? पर जब धीरे से किताब हटाई तो वो चेहरा जिसे उसने हमेशा से दूर से देेेखा था उसके बहुुुत करीब था, ऊचे गोरे माथे पर हवा की वजह से आते काले बाल। लक्ष्मी की इच्छा थी कि बस देेेखते ही रहे।

पर अचानक माँ की आवाज आई

लक्ष्मी इतनी रात को यहाँ

वो माँ ये।

अरे ये कुंदन न, यही सो गया।

जी

बोलो मैं उठा देती हूँ ऊपर जाकर सोना चाहिए, नींद खराब होगी उसकी पर, उठा देती हूँ। माँ ने मायूस होकर कहा

नही माँ रहने दिजिए मत करिये नींद खराब। मुझे भी नींद आ रही है मैं भी सोती हूँ।

फिर अगली सुबह

लक्ष्मी माँ ने कहा तुम्हें तुम्हारे घर लेकर जाना है कोई रस्म होती है वो करनी है तैयार हो जाओ मैं नीचे हूँ।

पर कुंदन के सामने लक्ष्मी खडी़ हो गयी।

मुझे बताईए क्या बात है?

क्या बात है मतलब हमारी शादी को तीन दिन हो गए और दो राते आप कमरे में आए ही नही इतने असहज क्यों? हम इस से अच्छे तो दोस्त थे।

कुंदन यहाँ वहाँ देख रहा था,

क्या बात है मुझे बताईए

कोई बात नही है।

तो क्यों आप मुझसे दूर है क्या मै आपको पंसद नही हूँ,

लक्ष्मी तुम अच्छी लड़की हो,

फिर क्यों मुझे पत्नी होने का दर्जा नही दे रहे। क्या आप किसी और से प्यार करते है। जवाब दिजिए चुप क्यो है, कौन है वो लड़की , उस लड़की से शादी क्यो नही की?

मैं किसी भी लड़की से प्यार नही करता। कुंदन ने बहुत कठोर लहजे में

यदि नही करते तो क्यो फिर मेरे साथ ऐसा

मुझे जाना है लक्ष्मी। तुम्हें भी रस्म के लिए जाना है वो इंतजार कर रहे होगें।

पूरे दिन अपने ही घर में जो उसका मायेका बन चुका था, एक बनावटी मुस्कान लिए रही। माँ बाबा सब खुश और हो भी क्यो न डाँक्टर दामाद जो माँ के घुटने की पीडा़ के लिए दवाई दे रहा था, बाबा को नीदं अच्छी आये , हजामा अच्छा रहे उसके नुस्खे बता रहा था। बडे़ ही प्यार और जिम्मेदारी से छोटे भाई के कैरियर की सीख दे रहा था। एक अच्छा दामाद, एक अच्छा जीजा। तो फिर पति ऐसा क्यों। लक्ष्मी सब कुछ देख कर समझ नही पा रही थी कि उसकी किस्मत क्या चाहती है। वो हमेशा से यही चाहती थी कि उस की जिस से भी शादी हो माँ बाबू को भी अपनाये , जिस से शादी हुई उसने माँ बाबू को उसके परिवार को तो अपना लिया पर उसे नही। शाम को वापस आते समय कार में भी वो कुंदन को ही निहार रही थी, जो थोडी देर पहले अपनी बातो से पूरे परिवार का मन खुशियों से भर आया था वो बिल्कुल शांत था। समझ रहा था कि लक्ष्मी पूरे समय केवल उसे निहार रही ही है पर अनजान बने रहना चाहता था।

घर पे कार रोककर मुझे हास्पिटल में काम है आता हूँ।

आता हूँ पर आते क्यों नही मन में फिर वही अंसख्य सवाल लिए वो भारी मन से माँ के कमरे की और चल पडी़

माँ ये शादी क्यो करवाई आपने, वो मुझसे प्यार नही करते। अभी जितनी गिन के बात होती है उससे कही ज्यादा बात तो दोस्ती में हो जाती थी, पति पत्नी बन कर तो हमने अपनी दोस्ती भी खो दी।

क्या हुआ बहू।

माँ इतने दिन हो गए शादी को पर। मैं कैसे कहूँ? किस से कहूँ अपनी पीडा़? मायके गई तो माँ बाबू उनको देख के ही खुश। मैं क्या करूँ? सुनो बहू

ससुर जी की आवाज आई,

उसने अपना पल्ला संभाला।

वो शादी नही करना चाहता था, हॉस्पिटल में उसकी जान बसती है। पर शादी तो सबको करनी पड़ती है समाज क्या कहेगा, तुमसे अच्छी बहू कोई नही हो सकती। समय दो उसे ये विवाह शुभ विवाह में बदल जायेगा।

जी।

पर लक्ष्मी के कानों में कुंदन के स्वर गूँज रहे थे मैं किसी भी लड़की से प्यार नही करता, मतलब मुझसे भी नही। आज रात उसने कुंदन को लाइब्रेरी में बैचेन टहलते देखा, परेशान तो वो भी था पहले दिन से, पर क्या थी इस सबकी वजह।

 

जारी......

शुभ विवाह -I

शुभ विवाह-III(अंतिम)

Image Source: pinterest



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